विवेकानंद, महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा प्रतिपादित एवं व्यवहार में लाए गए सार्वभौमिकतावाद की अभिव्यक्ति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात् ‘सारी दुनिया एक परिवार है’ के विचार में होती है। जयप्रकाश नारायण (जेपी) इस विचार से आगे बढ़कर विश्व शांति के लिए जीवनपर्यंत प्रयासरत रहे। एक शांति कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने बिना किसी राजकीय पद या शासकीय अधिकार के विश्व नेता का दर्जा प्राप्त किया। यह वास्तव में एक अद्भुत और विरल उपलब्धि थी।
इस संदर्भ में एक प्रसंग उल्लेखनीय है। अमेरिका यात्रा के दौरान 28 मार्च 1968 को अमेरिकी विदेश मंत्री डीन रस्क ने वाशिंगटन में उनका स्वागत करते हुए कहा, “मैं जानता हूं कि आपका दर्जा क्या है। आप स्वतंत्रता के महान उपासक हैं और लोकतंत्र के एक प्रतिष्ठित रक्षक और संरक्षक हैं।” दोनों के बीच एक घंटे से अधिक समय तक बातचीत हुई। संभवतः यह पहला अवसर था, जब किसी अमेरिकी उच्चाधिकारी ने किसी गैर-सरकारी विदेशी व्यक्ति के साथ औपचारिक बैठक की थी। जेपी अपने जीवन के अंतिम समय तक विश्व नेताओं के संपर्क में रहे और उनसे संवाद करते रहे।
जेपी के अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण का विकास
महज 20 वर्ष की आयु में, 1922 में, जेपी उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए थे। असहयोग आंदोलन के दौरान पढ़ाई छोड़ने के बाद उन्होंने ब्रिटिश शासन द्वारा संचालित किसी भी संस्था में न पढ़ने की प्रतिज्ञा की थी। उन्होंने बर्कले, आयोवा और विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालयों में अध्ययन किया। समाजशास्त्र में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद 1929 में वे स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए भारत लौटे। ये सात वर्ष उनके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण के निर्माण में महत्वपूर्ण साबित हुए।
उस समय तक वे कट्टर मार्क्सवादी बन चुके थे और उनकी विचारधारा में मार्क्सवाद की प्रधानता थी। वे महान क्रांतिकारी एम. एन. रॉय से प्रभावित थे, जिन्होंने मैक्सिकन कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के ताशकंद समूह की स्थापना में भूमिका निभाई थी। हालांकि, बाद में दोनों नेताओं ने कम्युनिज्म से दूरी बना ली।
जेपी लेनिन को महान क्रांतिकारी मानते थे, लेकिन स्टालिन की नीतियों के विरोधी थे। भारत में उन्होंने देखा कि कम्युनिस्ट राष्ट्रीय आंदोलन का समर्थन करने के बजाय उससे दूरी बनाए हुए थे। उन्होंने उनसे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष छेड़ने का आग्रह किया, लेकिन इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।
जेपी पूरी तरह स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति समर्पित हो गए। 1934 में उन्होंने कांग्रेस के भीतर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 1936 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Why Socialism लिखी। इस दौरान वे यूरोप और एशिया के समाजवादी नेताओं, श्रमिक नेताओं तथा शिक्षाविदों के संपर्क में आए।
मार्च 1940 में जमशेदपुर में युद्ध-विरोधी भाषण देने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अदालत में उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रिटिश सरकार को भारत को युद्ध में घसीटने और नाजीवाद को समाप्त करने के बजाय नाजियों को नियंत्रित करने के नाम पर भारतीय संसाधनों का उपयोग करने का कोई अधिकार नहीं था। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश नीति का विरोध करना उनका कर्तव्य था और वे इसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार थे।
जेल, अंतरराष्ट्रीय संपर्क और लोकतांत्रिक समाजवाद
जब जेपी जेल में थे, तब ब्रिटिश लेबर पार्टी के उनके मित्र फेनर ब्रॉकवे और सोमन मित्रा ने लंदन में उनकी रिहाई की मांग को लेकर जुलूस निकाला। फेनर ब्रॉकवे क्रिप्स मिशन (1942) के सदस्य थे। इस मिशन की अध्यक्षता लेबर पार्टी के नेता और चर्चिल की युद्ध कैबिनेट के सदस्य सर स्टैफर्ड क्रिप्स ने की थी।
कहा जाता है कि 1975 में आपातकाल के दौरान जब जेपी चंडीगढ़ में बंदी थे, तब लॉर्ड ब्रॉकवे ने उन्हें एक पत्र के माध्यम से संपर्क किया था। इस पत्र को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देखा और स्वीकृति भी दी थी। यह प्रयास दोनों नेताओं के बीच समझौते की दिशा में एक कदम माना गया। हालांकि, कुछ ही दिनों बाद जेपी की तबीयत गंभीर रूप से बिगड़ गई और उन्हें बंबई, वर्तमान मुंबई, के जसलोक अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया।
इसके बाद उस कमरे की गहन तलाशी ली गई, लेकिन वह पत्र आश्चर्यजनक रूप से गायब था। इस रहस्यमय पत्र-प्रकरण ने यह संकेत दिया कि सत्ता के शीर्ष पर कुछ प्रभावशाली लोग इस मेल-मिलाप को सफल नहीं होने देना चाहते थे।
वास्तव में, जेपी ने अपने छात्र जीवन से ही वैश्विक दृष्टिकोण विकसित करना शुरू कर दिया था। वे दुनिया भर में होने वाली उन घटनाओं पर गहरी नजर रखते थे, जो अंतरराष्ट्रीय संबंधों और राजनीति को प्रभावित कर सकती थीं। जेल में रहते हुए भी वे अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़े रहते थे। अंतरराष्ट्रीयतावाद उनके चिंतन का अभिन्न अंग था।
मार्क्सवादी दौर में वे यूरोपीय समाजवाद, ब्रिटिश फेबियन समाजवाद और वस्तुनिष्ठ समाजवाद के आलोचक थे। हालांकि, सोवियत संघ के अनुभवों ने उनकी सोच को बदल दिया और 1948 तक वे लोकतांत्रिक समाजवाद की ओर आकर्षित हो गए।
सोवियत अधिनायकवाद से उन्होंने सीखा कि केवल पूंजीवाद की अनुपस्थिति से समाजवाद सुनिश्चित नहीं होता। 1948 में, जब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने कांग्रेस से औपचारिक रूप से अलग होकर स्वतंत्र सोशलिस्ट पार्टी का रूप ले लिया, तब पार्टी के महासचिव की वार्षिक रिपोर्ट में जेपी ने उद्देश्यों की पवित्रता के लिए साधनों की पवित्रता को आवश्यक बताया।
उन्होंने चेकोस्लोवाकिया में सोवियत हस्तक्षेप का उल्लेख किया। उस समय के राजनीतिक घटनाक्रम में राष्ट्रपति एडवर्ड बेनेस को इस्तीफा देना पड़ा और विदेश मंत्री जान मासारिक की मृत्यु हुई, जिसे आत्महत्या बताया गया था।
सोवियत संघ से मोहभंग और विश्व राजनीति पर नजर
जेपी ने अपनी जेल डायरी Inside Lahore Fort में 12 अप्रैल 1944 को कमिन्टर्न (कम्युनिस्ट इंटरनेशनल) के विघटन पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने लिखा कि इससे सोवियत विदेश विभाग को असहज स्थिति का सामना करना पड़ा था।
उन्होंने लिखा, “यह एक और बोल्शेविक परंपरा का अंत था। स्टालिन के लिए इसे समाप्त करना आसान था, क्योंकि कमिन्टर्न के विलुप्त होने का अर्थ यह नहीं था कि पांचवां स्तंभ (Fifth Column) भी समाप्त हो गया।”
‘मार्शल स्टालिन’ शीर्षक के अंतर्गत उन्होंने लिखा कि रूसी क्रांति की वर्षगांठ पर स्टालिन का भाषण, घोषित रूप से समाजवादी राज्य के प्रमुख का भाषण होते हुए भी, किसी साम्राज्यवादी या पूंजीवादी नेता के वक्तव्य जैसा प्रतीत होता था। उनके शब्दों में, “मार्क्स और लेनिन ने युद्ध की प्रकृति और शांति के साधनों के बारे में जो सिखाया था, वह सब भुला दिया गया और दुनिया के सर्वहारा से विश्वासघात हुआ।”
इस डायरी में उन्होंने कई स्थानों पर रूस और सोवियत संघ के प्रति निराशा और खिन्नता व्यक्त की। दूसरी ओर, वे द्वितीय विश्वयुद्ध की घटनाओं की जानकारी प्राप्त करने के लिए अत्यंत उत्सुक रहते थे और अपने विचार साझा करना चाहते थे। उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समाचार-पत्रों तथा पत्रिकाओं के अतिरिक्त मित्रों द्वारा भेजी गई नई पुस्तकें भी उपलब्ध होती थीं। उनके नोट्स इस बात का प्रमाण हैं कि जेल में रहते हुए भी वे अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और महत्वपूर्ण वैश्विक हस्तियों के बारे में गहरी जानकारी रखते थे।
जेपी के सोशलिस्ट इंटरनेशनल, वर्ल्ड पीस ब्रिगेड और एशियाई समाजवादी सम्मेलन (Asian Socialist Conference) जैसे वैश्विक संगठनों से घनिष्ठ संबंध थे। अवसर मिलने पर वे इन संगठनों की बैठकों में भाग लेते और अपने विचार साझा करते थे। वे इंडियन-अमेरिकन एसोसिएशन तथा एशियन रिलेशन्स कॉन्फ्रेंस से भी जुड़े रहे।
1948 में इस्राइल की स्थापना हुई। सोशलिस्ट इंटरनेशनल और भारत के समाजवादियों ने इस्राइल को अंतरराष्ट्रीय मान्यता देने और उसके साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने की मांग की। 1950 में भारतीय समाजवादियों का एक प्रतिनिधिमंडल इस्राइल गया और वहां की कृषि विकास योजनाओं का अध्ययन किया। 1958 में जेपी स्वयं भी इस्राइल गए। वहां वे ‘किब्बुत्ज’ व्यवस्था से गहरे प्रभावित हुए, जिसके अंतर्गत सामुदायिक जीवन और सहकारी खेती को बढ़ावा दिया जाता था।
एशियाई समाजवाद, तिब्बत और चीन के प्रति जेपी का रुख
पहला एशियाई समाजवादी सम्मेलन 1953 में रंगून में आयोजित हुआ था। जेपी ने समाजवादी विचारधारा से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा की और जमीनी स्तर पर शांतिपूर्ण जन-संगठन की आवश्यकता पर बल दिया। दूसरा सम्मेलन 1959 में बंबई, वर्तमान मुंबई, में आयोजित हुआ। यहां उन्होंने एशियाई देशों की भौगोलिक परिस्थितियों, सामाजिक आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं के अनुरूप समाजवाद की नई दृष्टि विकसित करने पर जोर दिया।
इसी वर्ष चीन की सेना ने तिब्बत पर अपना नियंत्रण मजबूत किया। यह घटनाक्रम दुनिया, विशेषकर एशिया और भारत के लिए एक बड़ा झटका था। जेपी ने चीनी कार्रवाई का जोरदार विरोध किया और तिब्बत के प्रश्न पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुलाने की पहल की।
उन्होंने चीन की आलोचना करते हुए कहा कि इस बौद्ध देश पर बलपूर्वक नियंत्रण स्थापित करना स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय के अधिकारों का हनन है। उनका मानना था कि तिब्बत को भी स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय का वही अधिकार प्राप्त होना चाहिए, जो किसी भी राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण है।
जेपी ने इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स और इंडो-तिब्बत फ्रेंडशिप एसोसिएशन जैसे मंचों पर तिब्बत का मुद्दा उठाया। वे नेहरू की तिब्बत नीति से असहमत थे और चीन की संप्रभुता को स्वीकार करने के भारत सरकार के रुख की आलोचना करते थे।
1962 में चीन ने भारत पर हमला किया और अक्साई चिन क्षेत्र पर अपना कब्जा बनाए रखा। यह भारत के लिए गंभीर सैन्य और राजनीतिक झटका था। इसके बावजूद नेहरू ने तिब्बत के संबंध में अपनी नीति में बड़ा बदलाव नहीं किया।
1963 में जेपी ने नेहरू से संयुक्त राष्ट्र महासभा में तिब्बत का मुद्दा उठाने का आग्रह किया, लेकिन नेहरू ने उनकी बात नहीं मानी। इसके बाद जेपी ने उन्हें एक कठोर पत्र लिखा। उन्होंने कहा कि पुरानी नीति पर चलते रहना निराशाजनक था। उनके अनुसार, नेहरू की तिब्बत नीति नैतिक रूप से गलत थी और इससे न केवल तिब्बत, बल्कि भारत के हितों को भी नुकसान पहुंच सकता था।
जेपी का मानना था कि विवादित क्षेत्र पर अपने दावे को बनाए रखते हुए भारत को चीन के साथ किसी व्यावहारिक समझौते पर विचार करना चाहिए। उनके प्रस्ताव में चीन को तिब्बत से शिनजियांग तक नागरिक आवागमन के लिए रास्ता देने और बदले में भारत के लिए सामरिक रूप से महत्वपूर्ण चुंबी घाटी के प्रश्न पर बातचीत करने का विचार शामिल था। हालांकि, नेहरू सरकार ने उनके सुझावों पर ध्यान नहीं दिया।
फरवरी 1963 में जेपी ने नेहरू से अपने मित्र चांग कुओ-सिन से मिलने की अनुमति देने का आग्रह किया। चांग कुओ-सिन हांगकांग के प्रकाशक थे और अफ्रीका-एशिया काउंसिल के माध्यम से जेपी के संपर्क में आए थे। नेहरू ने इस मुलाकात के लिए सहमति दे दी।
रेमन मैगसेसे पुरस्कार और जेपी की वैश्विक दृष्टि
लोकसेवा के क्षेत्र में असाधारण योगदान के लिए जेपी को प्रतिष्ठित रेमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1965 में मनीला, फिलीपींस में दिए गए उनके भाषण से दुनिया भर में गरीबी और उत्पीड़न का सामना कर रहे लोगों के प्रति उनकी गहरी चिंता और प्रतिबद्धता स्पष्ट होती है।
अपने भाषण में उन्होंने पुरस्कार को व्यक्तिगत सम्मान के बजाय उन विचारों की मान्यता बताया, जिनका वे जीवनभर अनुसरण करते रहे थे। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उनके और उनके साथियों के लिए नए भारत के निर्माण में प्रोत्साहन का स्रोत बनेगा।
जेपी ने भारत और फिलीपींस के बीच मित्रता को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उनके अनुसार, दोनों देशों के बीच संबंधों को और निकट लाने में ऐसे पुरस्कार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते थे।
उन्होंने एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के उन देशों की चुनौतियों पर चर्चा की, जिन्होंने हाल के वर्षों में स्वतंत्रता प्राप्त की थी। उपनिवेशवाद के कारण उनका स्वाभाविक विकास बाधित हुआ था और अब वे विकसित देशों की बराबरी करने तथा अपनी सामाजिक व्यवस्था को मजबूत बनाने का प्रयास कर रहे थे।
उनके सामने मुख्यतः दो मॉडल थे-पश्चिमी पूंजीवादी मॉडल और रूसी अथवा चीनी कम्युनिस्ट मॉडल। जेपी का मानना था कि दोनों में कुछ ऐसे तत्व थे, जिन्हें अपनाया जा सकता था, लेकिन दोनों की कई बुनियादी विशेषताएं अस्वीकार करने योग्य थीं।
पश्चिमी मॉडल में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सहमति से शासन और कानून के शासन जैसे मूल्य महत्वपूर्ण थे। वहीं, कम्युनिज्म में श्रमिकों के प्रति चिंता और आर्थिक समानता बढ़ाने की प्रेरणा थी। जेपी के अनुसार, विकासशील देशों को इन मूल्यों से सीखना चाहिए।
लेकिन पश्चिमी मॉडल का व्यक्तिवाद और प्रतिस्पर्धा कमजोर वर्गों को अधिक कठिन परिस्थितियों में धकेल सकते थे। भौतिक आवश्यकताओं और उपभोग में लगातार वृद्धि पर जोर देने से सामाजिक असंतुलन पैदा होता था। उपयोगितावादी और व्यावसायिक मूल्यों की प्रधानता के कारण काम, अवकाश, निवास और प्रसन्नता के बीच संतुलन की उपेक्षा होती थी।
तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने समुदायों को कमजोर किया, शहरी और ग्रामीण जीवन के बीच दूरी बढ़ाई तथा मनुष्य को प्रकृति से अलग-थलग कर दिया। परिणामस्वरूप, मनुष्य और समाज का विकास असंतुलित हो गया।
दूसरी ओर, जेपी कम्युनिस्ट मॉडल को भी मानव और सामाजिक विकास के लिए विकृत मानते थे। उनके अनुसार, यह मॉडल मानव आत्मा की प्रधानता को नकारता था। पार्टी और राज्य की शक्ति को सर्वोच्च बनाकर व्यक्ति को उनके अधीन कर दिया जाता था, जिससे समाज एक विशाल कारागार जैसा बन सकता था।
इसलिए जेपी का सुझाव था कि नए देश दोनों मॉडलों को पूरी तरह अपनाने या अस्वीकार करने के बजाय उनमें से उन्हीं तत्वों को चुनें, जो मनुष्य और समाज के संतुलित आध्यात्मिक तथा भौतिक विकास के अनुकूल हों।
उनका मानना था कि विज्ञान का विकास मानव समाजों को अपने भविष्य को सचेत रूप से गढ़ने की क्षमता प्रदान करता है। लेकिन पूर्वाग्रहों, संकीर्ण इच्छाओं, तात्कालिक चिंताओं, मिथकों और विचारधाराओं के कारण लोग अक्सर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने से पीछे रह जाते हैं।
नए स्वतंत्र देशों के सामने दो बड़ी चुनौतियां थीं। पहली, उनकी विशाल आबादी अशिक्षा के कारण विज्ञान और तकनीक का पूरा लाभ नहीं उठा सकती थी। दूसरी, उनकी आर्थिक पिछड़ेपन और गरीबी के कारण विकास की चिंता इतनी अधिक थी कि सामाजिक और मानवीय विकास पीछे छूट जाता था।
जेपी का तर्क था कि यदि आर्थिक विकास का उद्देश्य केवल औद्योगिक और सैन्य शक्ति बढ़ाना न होकर व्यापक जनकल्याण होता, तो विकास की गति और भी तेज हो सकती थी।
उन्होंने यह भी कहा कि नए देशों के सामने लोकतंत्र, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, औद्योगिकीकरण और आधुनिकीकरण जैसे आदर्श तो थे, लेकिन अपने भविष्य की स्पष्ट तस्वीर का अभाव था। उनके अनुसार, समाज के पुनर्निर्माण का मूल प्रश्न मूल्यों का प्रश्न है। सही मूल्यों के आधार पर ही भविष्य की दिशा तय की जा सकती है और समाज के व्यापक समर्थन के साथ परिवर्तन लाया जा सकता है।
प्राग स्प्रिंग और साम्यवाद के प्रति जेपी की आलोचना
1968 में जेपी ने यूरोप और अमेरिका की 70 दिनों की यात्रा की। उसी वर्ष 20 और 21 अगस्त को सोवियत संघ तथा वारसा संधि के देशों की सेनाओं ने चेकोस्लोवाकिया में हस्तक्षेप किया और अलेक्जेंडर दुबचेक के नेतृत्व में चल रहे उदारीकरण आंदोलन, जिसे ‘प्राग स्प्रिंग’ कहा जाता है, को कुचल दिया। इसके बाद सोवियत नियंत्रण के तहत ‘सामान्यीकरण’ की प्रक्रिया शुरू हुई।
यह समाचार सुनकर जेपी अत्यंत दुखी हुए। उनकी पत्नी प्रभावती देवी ने अपनी डायरी में लिखा कि जेपी की आंखों में आंसू आ गए थे। उनके लिए यह केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक मानवीय त्रासदी थी।
उनका मानना था कि सोवियत टैंक उन लोगों की स्वतंत्रता की आकांक्षाओं को कुचलने के लिए भेजे गए थे, जो ‘मानव मुख वाले समाजवाद’ (Socialism with a Human Face) की दिशा में प्रयासरत थे।
जेपी के अनुसार, साम्यवादी क्रांति को भले ही साम्राज्यवाद-विरोधी बताया जाता रहा हो, लेकिन दशकों बाद भी साम्यवादी सत्ता का साम्राज्यवादी स्वरूप समाप्त नहीं हुआ था। साम्यवादियों के साथ उनके मतभेद केवल राष्ट्र के प्रति निष्ठा तक सीमित नहीं थे, बल्कि साधनों और उद्देश्यों से भी जुड़े थे। वे मानते थे कि अधिनायकवाद के माध्यम से वास्तविक स्वतंत्रता और समानता स्थापित नहीं की जा सकती।
जेपी, मॉरिस जोन्स और भारतीय लोकतंत्र
ब्रिटिश राजनीति विज्ञानी और लंदन विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर डब्ल्यू. एच. मॉरिस जोन्स भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के सजग पर्यवेक्षक थे। अपनी पुस्तक The Government and Politics of India (1964) में उन्होंने आशंका जताई थी कि नेहरू के बाद कांग्रेस भारतीय समाज में विघटन की प्रक्रिया को रोकने में कठिनाई का सामना कर सकती है।
उनका मानना था कि ऐसी जटिल परिस्थिति में जयप्रकाश नारायण भारतीय राजनीति को दिशा दे सकते हैं, भले ही वे सक्रिय सत्ता की राजनीति से बाहर हों। नैतिकता के पैमाने पर वे जेपी को अत्यंत आदर्शवादी और गांधी के बाद सबसे अधिक सम्मानित नेताओं में से एक मानते थे।
जोन्स के अनुसार, जेपी का बहुआयामी व्यक्तित्व और नेतृत्व कौशल उन्हें भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग के बीच विशेष सम्मान दिलाता था। उन्होंने यह भी कहा था कि जेपी एक अधीर आत्मा थे और यदि उन्हें अपना देश संकट में दिखाई दिया, तो वे सक्रिय राजनीति में लौटने से नहीं हिचकिचाएंगे।
जेपी के लेखन और भाषणों के माध्यम से भारतीय राजनीति के ज्वलंत मुद्दों पर उनके हस्तक्षेप को देखते हुए जोन्स का यह आकलन महत्वपूर्ण था। लगभग नौ वर्ष बाद यह आकलन काफी हद तक सही साबित हुआ। जेपी ने 1970 के दशक में तानाशाही प्रवृत्तियों के विरुद्ध जनांदोलन का नेतृत्व किया और आपातकाल के बाद भारत में लोकतंत्र की बहाली के प्रमुख प्रतीक बने।
हालांकि, मॉरिस जोन्स पहले जेपी की प्रसिद्ध अवधारणा A Plea for Reconstruction of Indian Polity की तीखी आलोचना कर चुके थे। उन्होंने 25 जून 1960 को The Economic Weekly में ‘The Unhappy Utopia—JP in Wonderland’ शीर्षक से लेख लिखा था।
जेपी के समर्थन में प्रसिद्ध अमेरिकी समाजशास्त्री विलियम कारपेंटर सामने आए। उन्होंने 4 फरवरी 1961 के अंक में लिखा कि जेपी एक वैकल्पिक व्यवस्था प्रस्तुत करते हैं। यह व्यवस्था लोगों को अधिक आदर्श लोकतांत्रिक नागरिक बना पाएगी या नहीं, इसका निर्णय केवल अनुमान से नहीं किया जा सकता; इसे व्यवहार में लागू करके ही परखा जा सकता है। इसी अंक में मॉरिस जोन्स ने प्रत्युत्तर दिया और अपने तर्कों पर कायम रहे।
भारतीय राजनीति के पुनर्निर्माण की अवधारणा
जेपी की पुस्तक A Plea for Reconstruction of Indian Polity का संबंध उनके और जवाहरलाल नेहरू के बीच 1957 में हुए पत्राचार से था। यह पत्राचार भारत में संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को लेकर हुआ था। नेहरू ने जेपी को चुनौती दी थी कि यदि उन्हें संसदीय प्रणाली अनुपयुक्त लगती है, तो वे उसका कोई बेहतर लोकतांत्रिक विकल्प प्रस्तुत करें।
जेपी का मानना था कि संसदीय व्यवस्था आम जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर रही थी। उनके अनुसार, यह सत्ता के केंद्रीकरण, भ्रष्टाचार और कुशासन से प्रभावित थी तथा सबसे बढ़कर नैतिक स्तर पर भी विफल हो रही थी।
नेहरू ने संसदीय लोकतंत्र का बचाव करते हुए कहा कि कुछ कमियों के बावजूद यह भारत के लिए उपलब्ध सर्वोत्तम व्यवस्था थी और व्यापक रूप से ठीक काम कर रही थी।
1957 में जेपी ने यूरोप और अमेरिका की यात्रा कर वहां की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि वहां भी लोकतांत्रिक समाजवाद के नाम पर शासन की शक्ति का केंद्रीकरण हो रहा था। नौकरशाही का लोकतंत्रीकरण एक बड़ी चुनौती था और जनकेंद्रित, विकेंद्रीकृत शासन की स्थापना में बाधा बन रहा था।
जेपी ऐसी व्यवस्था चाहते थे, जिसमें शासन अधिकतम सीमा तक जनता द्वारा संचालित और नियंत्रित हो। यह व्यवस्था राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र को भी मजबूत करे।
उन्होंने प्राचीन स्वायत्त ग्राम गणराज्यों और स्वशासन की उन व्यवस्थाओं का अध्ययन किया, जो औपनिवेशिक शासन से पहले अस्तित्व में थीं। ग्राम पंचायतें ऐसी व्यवस्थाओं का उदाहरण थीं। श्री अरबिंदो के भारतीय संस्कृति संबंधी विचारों और विकेंद्रीकरण पर आधारित चिंतन ने भी जेपी को वैकल्पिक शासन व्यवस्था की कल्पना करने में सहायता की।
उनके अनुसार, शासन प्रणाली विकेंद्रीकृत, जनकेंद्रित और मानवीय मूल्यों की रक्षा करने वाली होनी चाहिए।
इसी दृष्टिकोण से उनकी प्रसिद्ध अवधारणा A Plea for Reconstruction of Indian Polity सामने आई। उन्होंने यह दस्तावेज देश-विदेश के कई प्रमुख व्यक्तियों को भेजा, जिनमें जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी, जे. बी. कृपलानी, डॉ. राधाकृष्णन, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, देवर भाई और गंगाशरण सिंह आदि शामिल थे। यह दस्तावेज जनसंघ सहित विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं को भी भेजा गया।
विश्व शांति के लिए जेपी के प्रयास
भारत की आजादी के बाद जब जेपी ने स्वयं को दलगत राजनीति से दूर कर लिया, तब उन्होंने विश्व मामलों को समझने और उनमें हस्तक्षेप करने के लिए अधिक समय देना शुरू किया। समाजवादी विचारधारा से जुड़े अनेक वैश्विक नेता उन्हें जानते थे और उनके साथ पत्राचार करते थे।
उस दौर में एशिया और अफ्रीका के कई देश स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे थे, कुछ तानाशाही से जूझ रहे थे और दुनिया शीत युद्ध की गिरफ्त में थी।
1960 में ‘वार रेजिस्टेंस इंटरनेशनल’ की त्रैवार्षिक परिषद का आयोजन मदुरै के गांधीग्राम में हुआ। जेपी ने इसमें उत्साहपूर्वक भाग लिया। उनकी प्रेरणा और ‘शांति सेना’ के साथ काम करने के अनुभव, जिसमें चंबल घाटी की बागी समस्या भी शामिल थी, के आधार पर अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में शांतिपूर्ण मध्यस्थता के लिए एक अंतरराष्ट्रीय शांति बल की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया गया।
इसके दो वर्ष बाद लेबनान में ‘वर्ल्ड पीस ब्रिगेड’ की स्थापना हुई और जेपी इसके तीन अध्यक्षों में से एक चुने गए। इस संस्था ने रोडेशिया, जो बाद में जिम्बाब्वे बना, की स्वतंत्रता के समर्थन में अफ्रीका में लंबी पदयात्रा आयोजित की। इसने दिल्ली से पेइचिंग तक मैत्री यात्रा भी आयोजित की थी, लेकिन बर्मा, वर्तमान म्यांमार, ने अपने क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति नहीं दी।
इससे पहले भी जेपी ने स्पेन के शांतिवादी नेता सल्वाडोर दे मद्रियागा के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना को बिना हथियारों के काम करने का सुझाव दिया था। हालांकि, इस प्रस्ताव को लागू नहीं किया गया।
जेपी विश्व शांति के प्रति गहरी निष्ठा रखते थे। जब भी कोई अंतरराष्ट्रीय संकट उत्पन्न होता, वे अपनी पूरी क्षमता से उसके समाधान के प्रयासों में जुट जाते थे। भारत सरकार ने भी उनकी सेवाओं का उपयोग किया।
1971 में, जब पाकिस्तानी सेना ने बंगाली जनता पर अत्याचार किए और भारत को बड़े पैमाने पर शरणार्थियों की समस्या का सामना करना पड़ा, तब इंदिरा गांधी सरकार ने उन्हें 47 दिनों की विश्व यात्रा पर भेजा, ताकि वे इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटा सकें।
जेपी 1962 में स्थापित ‘इंडो-पाक रिकंसिलिएशन कमेटी’ के संस्थापक अध्यक्ष भी थे। भारत और पाकिस्तान के बीच स्थायी शांति स्थापित करने के उनके प्रयासों को 1965 के युद्ध से गहरा आघात पहुंचा।
अपने किसी औपचारिक सरकारी पद के बिना भी जेपी का विश्व शांति में योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और चिरस्मरणीय था। उन्होंने वर्ल्ड पीस ब्रिगेड के माध्यम से जाम्बिया की स्वतंत्रता के समर्थन में भी भूमिका निभाई।
जब केनेथ कौंडा जाम्बिया के राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने जेपी को तार भेजकर आभार व्यक्त किया। उन्होंने लिखा कि वर्ल्ड पीस ब्रिगेड के साथ जेपी की उपस्थिति का जबरदस्त प्रभाव पड़ा और उनकी सहायता से दोनों देशों के संबंध अधिक घनिष्ठ हुए।
इसी प्रकार, जेपी ने तंजानिया के राष्ट्रपति जूलियस न्येरेरे की पार्टी TANU से जुड़े अफ्रीकी और भारतीय समुदायों के बीच मतभेदों को सुलझाने में भी सहायता की। उन्होंने दार-एस-सलाम में उपनिवेशवाद से संबंधित एक समिति के समक्ष गवाही दी और संयुक्त राष्ट्र में प्रभावशाली ढंग से अपनी बात रखी।
अमेरिका के गांधी संस्थान के पूर्व निदेशक और विश्व शांति के लिए लगातार काम करने वाले चार्ल्स वॉकर ने उचित ही कहा था कि जेपी भारत की ओर से बोल सकते थे, क्योंकि उनके लिए समस्त मानवता ही अंतिम उद्देश्य थी।
मानवता, आध्यात्मिकता और स्थायी शांति का संदेश
शीत युद्ध के दौरान दुनिया में बढ़ते राज्यवाद और सैन्यवाद को जेपी विश्व शांति के लिए गंभीर खतरा मानते थे। परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को लेकर भी वे चिंतित रहते थे, क्योंकि इससे संपूर्ण मानवता का विनाश हो सकता था।
उन्हें इस बात की भी चिंता थी कि यदि भौतिक समृद्धि को ही मानव जीवन का अंतिम उद्देश्य मान लिया गया, तो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूल्यों का महत्व समाप्त हो जाएगा। उनका मानना था कि विज्ञान आधारित भौतिक विकास के साथ मनुष्य का आध्यात्मिक विकास भी आवश्यक है। ऐसा न होने पर मानव जाति का भविष्य संकट में पड़ सकता है।
वे समाजवाद के भौतिक उद्देश्यों के साथ उसके आध्यात्मिक उद्देश्यों को भी जरूरी मानते थे। उनके लिए मानवीय जीवन के आध्यात्मिक मूल्य सर्वोपरि थे और यही मूल्य विज्ञान के उपयोग को सही दिशा दे सकते थे।
गहराई से देखें, तो स्वतंत्रता, समानता, शांति, लोकतंत्र, सत्ता का विकेंद्रीकरण, समाज की उन्नति के लिए सहकारिता और सामूहिक प्रयास, राज्यशक्ति के ऊपर लोकशक्ति की प्रधानता तथा मानव समाज में प्रेम, करुणा और अहिंसा की प्रतिष्ठा-ये सभी ऐसे सूत्र थे, जो किसी व्यक्ति को स्थानीय नागरिक के साथ-साथ विश्व नागरिक भी बनाते हैं।
राष्ट्रों के बीच मैत्री और समानता की भावना भी इन्हीं मूल्यों पर आधारित है। जेपी के अनुसार, इन्हीं के माध्यम से दुनिया में स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
इसलिए, जब जेपी के निधन पर संयुक्त राष्ट्र ने अपने झंडे को आधा झुकाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी, तो यह कोई असामान्य संकेत नहीं था, बल्कि एक महान विश्व नेता के प्रति उचित सम्मान था।
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