भारत अपनी समुद्री ताकत बढ़ाने की तैयारी में है। जानकारी के मुताबिक भारतीय नौसेना के लिए 3 और कलवरी क्लास सबमरीन बनाने की योजना पर विचार किया जा रहा है। इन पनडुब्बियों को मुंबई के मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) में फ्रांस की कंपनी नेवल ग्रुप की मदद से बनाया जा सकता है। इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत करीब 33,000 करोड़ रुपये बताई जा रही है, लेकिन सवाल सिर्फ 3 नई पनडुब्बियां बनाने का नहीं है। असली सवाल यह है कि अगर यह योजना आगे बढ़ती है, तो इससे भारत की ताकत कितनी बढ़ेगी और दुनिया के दूसरे देशों पर इसका क्या असर पड़ेगा?

भारत की समुद्री ताकत को मिलेगा सहारा

फिलहाल भारतीय नौसेना के पास 6 कलवरी क्लास सबमरीन हैं। ये डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां हैं, जो समुद्र के भीतर दुश्मन के जहाजों और दूसरी पनडुब्बियों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर हमला करने में सक्षम हैं। भारत के सामने एक बड़ी चुनौती अपनी पुरानी होती पनडुब्बियों की जगह नई पनडुब्बियां लाने की है। अगर 3 और कलवरी क्लास सबमरीन बनाने की योजना को मंजूरी मिलती है, तो इससे नौसेना की मौजूदा ताकत बनाए रखने में मदद मिल सकती है। सीधी भाषा में कहें तो भारत सिर्फ अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश नहीं कर रहा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि समुद्र में उसकी सुरक्षा कमजोर न पड़े।

चीन और पाकिस्तान पर क्या होगा असर?

भारत के लिए चीन और पाकिस्तान की समुद्री गतिविधियां लंबे समय से अहम रही हैं। चीन लगातार अपनी नौसेना को आधुनिक बना रहा है, वहीं पाकिस्तान भी चीन की मदद से हंगोर क्लास की आधुनिक पनडुब्बियां हासिल कर रहा है। इन पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे वे सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों के मुकाबले ज्यादा समय तक पानी के भीतर रह सकती हैं।

ऐसे में भारत के लिए अपनी पनडुब्बियों की संख्या के साथ-साथ उनकी तकनीक और युद्धक क्षमता को बेहतर बनाना भी जरूरी है। अगर भारत की नई पनडुब्बियां योजना के मुताबिक तैयार होती हैं, तो इससे हिंद महासागर में उसकी निगरानी और समुद्री सुरक्षा की क्षमता को मजबूती मिल सकती है। इससे चीन और पाकिस्तान को भारत की समुद्री ताकत को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बनानी होगी। हालांकि, केवल 3 नई पनडुब्बियों के आने से ताकत का पूरा संतुलन बदल जाएगा, ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। असली फर्क इस बात से पड़ेगा कि इन पनडुब्बियों में कौन-से हथियार, सेंसर और तकनीक शामिल होती हैं और वे कितनी प्रभावी तरीके से काम करती हैं।

दुनिया पर क्या पड़ेगा असर?

भारत की बढ़ती समुद्री ताकत का असर सिर्फ चीन और पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा। हिंद महासागर दुनिया के सबसे अहम समुद्री इलाकों में से एक है। यहां से अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा की सप्लाई के लिए इस्तेमाल होने वाले कई महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते गुजरते हैं। भारत के पास जितनी बेहतर समुद्री निगरानी और रक्षा क्षमता होगी, उतना ही वह अपने समुद्री हितों की रक्षा कर सकेगा। इससे समुद्री रास्तों की सुरक्षा, व्यापारिक जहाजों की आवाजाही और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

इसके अलावा, हिंद महासागर में भारत की मजबूत मौजूदगी से उसे क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में अपनी बात रखने की ज्यादा क्षमता मिलेगी। अमेरिका, फ्रांस, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ समुद्री सुरक्षा में सहयोग के लिहाज से भी भारत की भूमिका अहम बनी रह सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत की ताकत बढ़ने से दूसरे देश तुरंत अपनी रणनीति बदल देंगे। इसका असर धीरे-धीरे दिखेगा और यह चीन समेत दूसरे देशों की नौसैनिक तैयारियों पर भी निर्भर करेगा।

भारत की रक्षा इंडस्ट्री को भी मिलेगा फायदा

इस प्रोजेक्ट का एक बड़ा फायदा देश के भीतर भी हो सकता है। अगर इन पनडुब्बियों का निर्माण मझगांव डॉक में होता है, तो भारतीय शिपयार्ड और उससे जुड़ी कंपनियों को काम मिलेगा। इससे इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों और रक्षा उपकरण बनाने वाली कंपनियों को फायदा हो सकता है, साथ ही, पनडुब्बी निर्माण से जुड़ा अनुभव देश में बना रहेगा और भविष्य की परियोजनाओं के लिए तकनीकी क्षमता विकसित करने में मदद मिलेगी। हालांकि, विदेशी तकनीक के सहयोग से बनने वाली पनडुब्बियों का मतलब अपने आप पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाना नहीं है। इसके लिए भारत को धीरे-धीरे ज्यादा तकनीक, उपकरण और निर्माण क्षमता देश के भीतर विकसित करनी होगी।

प्रोजेक्ट 75(I) से कैसे अलग है यह योजना?

भारत 6 आधुनिक पनडुब्बियां बनाने के लिए प्रोजेक्ट 75(I) पर भी काम कर रहा है। इस परियोजना में जर्मनी की कंपनी थाइसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) के साथ सहयोग की योजना है। इसमें AIP तकनीक वाली पनडुब्बियां बनाने पर जोर है, ताकि वे लंबे समय तक पानी के भीतर रह सकें। तीन अतिरिक्त कलवरी क्लास पनडुब्बियों की योजना का मकसद मौजूदा पनडुब्बी बेड़े को मजबूत करना है, जबकि प्रोजेक्ट 75(I) ज्यादा आधुनिक क्षमताओं वाली पनडुब्बियां हासिल करने की दिशा में एक अलग कदम है। दोनों परियोजनाएं आगे बढ़ती हैं, तो भारत को अपनी मौजूदा ताकत बनाए रखने और भविष्य की जरूरतों के लिए नई तकनीक हासिल करने में मदद मिल सकती है।

ये भी पढ़ें- Explainer: न नौकरी की जानकारी...न कमाई का आंकड़ा; आखिर कैसे चलता है कॉकरोच जनता पार्टी का खर्च?

आखिर भारत को क्या होगा हासिल ?

तीन और कलवरी क्लास पनडुब्बियां बनाने की योजना भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए अहम हो सकती है। इससे नौसेना की मौजूदा क्षमता को सहारा मिलेगा, देश के रक्षा उद्योग को काम मिलेगा और हिंद महासागर में भारत की मौजूदगी मजबूत करने में मदद मिल सकती है। दुनिया के लिहाज से इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि भारत हिंद महासागर में अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों की रक्षा करने के लिए ज्यादा तैयार हो सकेगा। चीन और पाकिस्तान को भी भारत की समुद्री क्षमताओं को अपनी योजनाओं में शामिल करना होगा।