Dedicated Freight Corridor: भारत की अर्थव्यवस्था में सड़क और रेलवे से होने वाली माल ढुलाई की भूमिका बहुत बड़ी है। लेकिन लंबे समय तक मालगाड़ियों को उसी ट्रैक पर चलना पड़ता था, जिस पर यात्री ट्रेनें दौड़ती थीं। इसका असर सिर्फ माल पहुंचने की रफ्तार पर नहीं पड़ता था, बल्कि यात्री ट्रेनों की टाइमिंग और रेलवे की क्षमता पर भी दिखाई देता था।
इसी समस्या को दूर करने के लिए शुरू की गई डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) परियोजना अब अपने एक बड़े मुकाम पर पहुंच गई है। करीब दो दशक के इंतजार के बाद देश का 2,843 किलोमीटर लंबा डेडिकेटेड फ्रेट रेल नेटवर्क पूरा हो गया है। 8 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के बचे हुए तीन सेक्शन का उद्घाटन किया।करीब 20,700 करोड़ रुपये की लागत वाले इन हिस्सों के पूरा होने के साथ भारत के प्रमुख फ्रेट कॉरिडोर नेटवर्क का काम पूरा हो गया है। इसका असर सिर्फ रेलवे तक सीमित नहीं रहने वाला। माल ढुलाई की रफ्तार, लॉजिस्टिक्स की लागत और देश के एक्सपोर्ट-इंपोर्ट सिस्टम पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
आखिर Dedicated Freight Corridor क्या है?
नाम से ही साफ है कि डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर यानी ऐसी रेल लाइन, जिसे मुख्य रूप से मालगाड़ियों के लिए तैयार किया गया है।इस नेटवर्क को हाई-कैपेसिटी और इलेक्ट्रिफाइड रेल लाइन के रूप में विकसित किया गया है। इसका मकसद मालगाड़ियों को यात्री ट्रेनों से अलग रास्ता देना है, ताकि माल की आवाजाही ज्यादा तेजी और नियमित तरीके से हो सके।पूरे नेटवर्क की लंबाई 2,843 किलोमीटर है। इसे दो बड़े हिस्सों में बांटा गया है।
- Western Dedicated Freight Corridor (WDFC): 1,506 किलोमीटर
- Eastern Dedicated Freight Corridor (EDFC): 1,337 किलोमीटर
यानी देश के पश्चिमी हिस्से से लेकर उत्तर भारत और पूर्वी भारत तक माल ढुलाई के लिए एक अलग रेल नेटवर्क तैयार किया गया है।
कहां से कहां तक जाता है यह कॉरिडोर?
DFC की सबसे बड़ी खासियत इसका विशाल नेटवर्क है।वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर उत्तर प्रदेश के दादरी से शुरू होकर महाराष्ट्र के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी (JNPA) तक जाता है। इसका महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि यह देश के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों को पश्चिमी तट के बड़े पोर्ट से जोड़ता है।
वहीं ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पंजाब के लुधियाना से बिहार के सोननगर तक फैला है। इस रूट के जरिए उत्तर भारत के औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों से माल को देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।दोनों कॉरिडोर मिलकर भारत के बड़े माल ढुलाई नेटवर्क की रीढ़ तैयार करते हैं।
20 साल क्यों लगा पूरा होने में?
DFC कोई छोटी रेल परियोजना नहीं थी। यह देश के अलग-अलग औद्योगिक क्षेत्रों, रेलवे नेटवर्क और बंदरगाहों को जोड़ने वाला विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है।इसे तैयार करने में जमीन, ट्रैक निर्माण, विद्युतीकरण, बड़े पुल, सिग्नलिंग और दूसरे तकनीकी काम शामिल थे। अलग-अलग हिस्सों को चरणबद्ध तरीके से चालू किया गया और अब वेस्टर्न कॉरिडोर के बचे हुए सेक्शन के उद्घाटन के साथ पूरा नेटवर्क ऑपरेशनल हो गया है।यही वजह है कि इस परियोजना को केवल एक नई रेल लाइन के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि भारत के लॉजिस्टिक्स सिस्टम में बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
मालगाड़ियों की रफ्तार में आएगा बड़ा बदलाव
DFC का सबसे सीधा फायदा मालगाड़ियों को मिलने वाला है।पुराने सिस्टम में मालगाड़ियों को यात्री ट्रेनों के साथ ट्रैक साझा करना पड़ता था। यात्री ट्रेनों को प्राथमिकता मिलने के कारण कई बार मालगाड़ियों को स्टेशन या दूसरे स्थानों पर इंतजार करना पड़ता था।अलग ट्रैक मिलने से यह दबाव काफी कम होता है। DFC पर मालगाड़ियों की औसत रफ्तार पुराने सिस्टम की तुलना में करीब दोगुनी होने की बात कही जा रही है।इसका मतलब यह है कि जिस माल को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में पहले काफी समय लगता था, वही दूरी अब कम समय में पूरी की जा सकती है।
बिजनेस के लिए क्यों बड़ा गेमचेंजर है DFC?
सोचिए किसी फैक्ट्री में तैयार हुआ सामान बंदरगाह तक पहुंचना है। अगर रास्ते में मालगाड़ी को बार-बार यात्री ट्रेनों के लिए रुकना पड़े, तो डिलीवरी का समय बढ़ेगा और लॉजिस्टिक्स की लागत भी बढ़ेगी।DFC इस पूरी प्रक्रिया को ज्यादा व्यवस्थित बनाने में मदद करेगा।मैन्युफैक्चरिंग यूनिट, इंडस्ट्रियल क्लस्टर और पोर्ट के बीच माल की आवाजाही तेज होने से कंपनियों को सप्लाई चेन मैनेज करने में फायदा मिल सकता है। खासकर उन उद्योगों के लिए यह महत्वपूर्ण है, जिनका कारोबार बड़े पैमाने पर कच्चे माल और तैयार उत्पाद की आवाजाही पर निर्भर करता है।
एक्सपोर्ट-इंपोर्ट को कैसे मिलेगा फायदा?
भारत के कई बड़े बंदरगाह पश्चिमी तट पर हैं। ऐसे में देश के अंदरूनी हिस्सों से तैयार माल या औद्योगिक उत्पादों को पोर्ट तक पहुंचाना लॉजिस्टिक्स का अहम हिस्सा है।WDFC इस कनेक्टिविटी को मजबूत करता है। माल तेजी से पोर्ट तक पहुंचेगा तो कंटेनर और कार्गो की आवाजाही को बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सकेगा।दूसरी तरफ आयात के जरिए देश में आने वाला सामान भी पोर्ट से अलग-अलग औद्योगिक और उपभोक्ता बाजारों तक भेजने में इस नेटवर्क का इस्तेमाल किया जा सकता है।यानी DFC का असर रेलवे से निकलकर पूरी सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।
यात्री ट्रेनों को भी होगा फायदा
DFC का फायदा सिर्फ मालगाड़ी और कारोबार तक सीमित नहीं है।पहले यात्री और मालगाड़ियां कई जगह एक ही रेल नेटवर्क का इस्तेमाल करती थीं। ऐसे में मालगाड़ियों को रास्ता देने के लिए यात्री ट्रेनों के संचालन पर भी असर पड़ सकता था।अब मालगाड़ियों के लिए अलग कॉरिडोर होने से मौजूदा रेलवे नेटवर्क पर दबाव कम होगा। इससे यात्री ट्रेनों के संचालन के लिए ज्यादा क्षमता उपलब्ध हो सकती है।यानी जिस परियोजना को माल ढुलाई के लिए बनाया गया है, उसका अप्रत्यक्ष फायदा यात्री रेल यात्रियों को भी मिल सकता है।
रोज चल रही हैं 430 से ज्यादा मालगाड़ियां
DFC नेटवर्क पर मालगाड़ियों की आवाजाही लगातार बढ़ रही है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक ईस्टर्न और वेस्टर्न दोनों कॉरिडोर पर रोजाना 430 से ज्यादा मालगाड़ियां चल रही हैं।जैसे-जैसे इस नेटवर्क का इस्तेमाल बढ़ेगा, रेलवे की फ्रेट क्षमता भी बढ़ने की उम्मीद है। इसका मतलब है कि भविष्य में ज्यादा मात्रा में माल को सड़क से रेलवे की तरफ शिफ्ट करना संभव हो सकता है।यह बदलाव देश के लॉजिस्टिक्स खर्च को कम करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या आम लोगों को भी इसका फायदा मिलेगा?
DFC का असर आम आदमी को सीधे टिकट या किराये के रूप में नजर नहीं आएगा, लेकिन इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव काफी बड़ा हो सकता है।माल की ढुलाई तेज और व्यवस्थित होने पर कंपनियों के ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स खर्च में कमी आ सकती है। लंबे समय में इसका फायदा सप्लाई चेन की दक्षता और सामान की उपलब्धता पर पड़ सकता है।इसके अलावा यात्री ट्रेनों के लिए मौजूदा रेलवे नेटवर्क की क्षमता बढ़ने से ट्रेन संचालन को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
₹20,700 करोड़ का खर्च क्यों महत्वपूर्ण है?
वेस्टर्न DFC के बचे हुए हिस्सों को पूरा करने में करीब 20,700 करोड़ रुपये का खर्च बताया गया है। इतनी बड़ी रकम का निवेश इस बात को दिखाता है कि सरकार माल ढुलाई के इंफ्रास्ट्रक्चर को देश की आर्थिक ग्रोथ से जोड़कर देख रही है।DFC का उद्देश्य केवल तेज मालगाड़ी चलाना नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा लक्ष्य भारत के लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को ज्यादा तेज, भरोसेमंद और प्रतिस्पर्धी बनाना है।अगर उद्योगों तक कच्चा माल तेजी से पहुंचे और तैयार सामान कम समय में बाजार या पोर्ट तक पहुंच सके, तो इसका फायदा मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट दोनों को मिल सकता है।
DFC को क्यों कहा जा रहा है देश की 'लाइफलाइन'?
किसी अर्थव्यवस्था में माल की आवाजाही जितनी तेज और सस्ती होती है, कारोबार के लिए उतना ही बेहतर माहौल बनता है। DFC इसी कड़ी को मजबूत करने की कोशिश है।एक तरफ यह बंदरगाहों को औद्योगिक क्षेत्रों से जोड़ता है, दूसरी तरफ रेलवे के पुराने नेटवर्क से मालगाड़ियों का दबाव कम करता है। इसके साथ ही यात्री ट्रेनों के संचालन के लिए अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध कराने में मदद करता है।इसलिए 2,843 किलोमीटर का यह नेटवर्क सिर्फ पटरियों का जाल नहीं है। आने वाले वर्षों में यह भारत की लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।