उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रहा हैं। खासकर पूर्वांचल की कई विधानसभा सीटों पर भूमिहार मतदाताओं की मौजूदगी राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। यही वजह है कि चुनाव आते ही इन सीटों पर जातीय समीकरण, उम्मीदवारों की सामाजिक पकड़ और पुराने चुनावी नतीजों की चर्चा तेज हो जाती है। वाराणसी की पिंडरा और गाजीपुर की मुहम्मदाबाद जैसी सीटें इसी लिहाज से खास मानी जाती हैं।

पिंडरा में भूमिहार वोट अहम, लेकिन मुकाबला सिर्फ जाति के भरोसे नहीं
वाराणसी की पिंडरा विधानसभा सीट पूर्वांचल की चर्चित सीटों में शामिल है। यहां भूमिहार मतदाताओं की अच्छी मौजूदगी बताई जाती है। अलग-अलग चुनावी आंकड़ों और आकलनों में भूमिहार मतदाताओं की संख्या अलग-अलग बताई गई है। अमर उजाला के चुनावी आंकड़ों में पिंडरा में करीब 45 हजार भूमिहार मतदाताओं का अनुमान दिया गया है। वहीं अन्य रिपोर्टों में भूमिहार-ब्राह्मण मतदाताओं को मिलाकर करीब 60 हजार का आंकड़ा बताया गया है।

लेकिन पिंडरा का चुनावी गणित केवल भूमिहार वोट पर निर्भर नहीं है। यहां कुर्मी-पटेल, दलित, यादव, मुस्लिम और दूसरे सामाजिक समूह भी नतीजे तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि किसी एक समुदाय को पूरी सीट का निर्णायक वोट बैंक मानना सही नहीं होगा।

अजय राय से जुड़ा है पिंडरा का पुराना राजनीतिक इतिहास
पिंडरा का राजनीतिक इतिहास भी काफी दिलचस्प रहा है। इस सीट को पहले कोलअसला के नाम से जाना जाता था। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय इस क्षेत्र से कई बार विधायक रह चुके हैं। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्हें बीजेपी के डॉ. अवधेश सिंह से हार का सामना करना पड़ा। अब 2027 के चुनाव को लेकर अजय राय ने एक बार फिर पिंडरा से चुनाव लड़ने की बात कही है, जिससे सीट की राजनीतिक अहमियत और बढ़ गई है।

मुहम्मदाबाद भी पूर्वांचल की अहम सीट
गाजीपुर की मुहम्मदाबाद विधानसभा सीट भी पूर्वांचल की चर्चित सीटों में गिनी जाती है। यहां भी लंबे समय से जातीय और स्थानीय राजनीतिक समीकरण चुनावी नतीजों को प्रभावित करते रहे हैं। भूमिहार समाज की राजनीतिक मौजूदगी के कारण इस सीट पर भी चुनाव के दौरान समुदाय आधारित समीकरणों की चर्चा होती है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी भी विधानसभा सीट पर चुनाव का परिणाम केवल एक जाति के वोट से तय नहीं होता। राजनीतिक दलों की रणनीति, उम्मीदवार की लोकप्रियता, स्थानीय मुद्दे, महिला मतदाता, युवा वोट और अलग-अलग समुदायों का समर्थन मिलकर अंतिम नतीजा तय करते हैं।

पूर्वांचल में क्यों महत्वपूर्ण है भूमिहार वोट?
पूर्वांचल की राजनीति में भूमिहार समाज की राजनीतिक सक्रियता लंबे समय से दिखाई देती रही है। वाराणसी, गाजीपुर, बलिया, मऊ और आसपास के क्षेत्रों में कई विधानसभा सीटों पर भूमिहार मतदाता चुनावी समीकरण का हिस्सा हैं। यही कारण है कि विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टियां उम्मीदवारों के चयन में सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखती हैं। किसी सीट पर यदि भूमिहार मतदाता बड़ी संख्या में हैं तो वहां उनके बीच पकड़ बनाने की कोशिश सभी प्रमुख दल करते हैं।

2027 के चुनाव में क्या बदलेगा समीकरण?
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं। पिंडरा जैसी सीटों पर पुराने राजनीतिक समीकरणों के साथ नए मुद्दे भी चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं। पिंडरा में इस समय बीजेपी के अवधेश सिंह लगातार दो चुनाव जीत चुके हैं, जबकि अजय राय अपने पुराने राजनीतिक आधार को वापस पाने की कोशिश में हैं। ऐसे में आने वाले चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि भूमिहार, ब्राह्मण, कुर्मी-पटेल, दलित, यादव और मुस्लिम मतदाताओं का रुख किस तरफ जाता है। यही सामाजिक समीकरण पूर्वांचल की कई सीटों पर मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना सकता है।

यानी पिंडरा और मुहम्मदाबाद में भूमिहार वोट जरूर महत्वपूर्ण है, लेकिन जीत का रास्ता सिर्फ एक जाति से होकर नहीं गुजरता। 2027 में उम्मीदवार, पार्टी, स्थानीय मुद्दे और अलग-अलग सामाजिक समूहों का गठजोड़ ही असली चुनावी तस्वीर तय करेगा।

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