भारत में पेट्रोलियम रिजर्व सिर्फ 5.33 मिलियन मीट्रिक टन का है। लेकिन यह 8 दिन में ही खर्च हो जाता है। ऑयल कंपनियों के स्टॉक को इसमें जोड़ा जाए तो देश के पास 74 दिन का ही पेट्रोल भंडार है।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 26 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में खाद्य, ईंधन, उर्वरक और वित्त से जुड़े जोखिमों को 4F संकट के रूप में रेखांकित किया।

उन्होंने कहा यह ऐसी चेन है जिसमें एक चीज महंगी होती है तो दूसरी की कीमतों में इजाफा होना तय है। जिसका सीधा असर जेब पर पड़ता है।

भारत अभी पूरी तरह संकट में नहीं है, लेकिन हवा का रुख कभी भी गंभीर परिणाम ला सकता है। तो चलिए बताते है 4F के बारे में जानते हैं और भारत के पास इससे बचने के क्या उपाय है?

क्या है 4F की चेन?

जब दो या दो से ज्यादा देशों के बीच युद्ध की स्थिति या तनाव बनता है तो तेल और गैस की सप्लाई रूक जाती है। जिसे बचाने के लिए उसका स्टॉक मंहगा कर दिया जाता है। क्योंकि उर्वरक निर्माण में गैस का इस्तेमाल होता है। इसलिए उर्वरक भी महंगा होता है।

उर्वरक महंगा होता है तो खेती में पैदा होने वाला अनाज महंगा होता है। दुनिया में जब अनिश्चितता बढ़ेगी तो निवेशक सुरक्षित जगह अपना पैसा लगाता है। ऐसे में जो देश विकास कर रहा होता है उसे कर्ज लेना महंगा पड़ जाता है। सीधे तौर पर कहा जा सकता है कि एक यानी चिंगारी से 4 जगह आग लगा जाती है।

भारत की क्या है हालत?

खाना : अगस्त 2026 तक भारत में खाने को लेकर दर्ज की गई महंगाई 5.95 प्रतिशत थी। अगस्त में प्याज 43 प्रतिशत महंगा, जुलाई में टमाटर 31.92 प्रतिशत था।

इस साल मानसून में 10 प्रतिशत कम बारिश हुई। अल नीनो की स्थिति ने इसे लेकर काफी चिंता बढ़ा दी। साल 2026-27 के लिए सरकार ने अनाज उत्पादन का लक्ष्य घटाकर 373 मिलियन टन किया। यह पिछले साल से 2.63 मिलियन टन कम है।

राहत की बात यह रही कि 28 मई 2026 तक सरकारी गोदामों में गेहूं का भंडार 513 लाख मीट्रिक टन था। 1 जुलाई के लिए बफर स्टॉक 275.80 लाख मीट्रिक टन रह गया। यानी भंडार जरूरत से डबल।

ईंधन: भारत जरूरत के हिसाब से 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल और 50 प्रतिशत गैस आयात करता है। साल 2026 अप्रैल में ईंधन और बिजली की कीमतें सालाना 24.71 प्रतिशत बढ़ी।

भारत का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व सिर्फ 5.33 मिलियन मीट्रिक टन है, जो 8 दिन के लिए ही है। लेकिन इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी अपने पास 90 दिन का स्टॉक रखने की सलाह देती है।

इसके लिए सरकार ओडिशा के चंडीखोल में 4 मिलियन टन और कर्नाटक के पडूर में 2.5 मिलियन टन का नया भंडार बना रही है।

उर्वरक : भारत अपनी DAP का 60 प्रतिशत आयात करता है और पोटाश पूरी तरह आयात पर निर्भर है। मार्च 2026 में 24.6 प्रतिशत उर्वरक उत्पादन गिर गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में साल 2026 के फरवरी से अप्रैल के बीच उर्वरक की कीमतें 66 प्रतिशत बढ़ीं।

सरकार ने तैयारी भी कर ली है। खरीफ 2026 से पहले देश में 199.65 लाख मीट्रिक टन उर्वरक का स्टॉक है, जो मौसमी मांग का 51 प्रतिशत से ज्यादा है, जबकि सामान्य बफर स्टॉक 33% का होता है। 2026-27 के बजट में उर्वरक सब्सिडी के लिए 1.71 लाख करोड़ रुपये रखे गए हैं।

पैसा: यहां भारत सबसे मजबूत है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अगस्त 2026 के अंत में 740.80 बिलियन डॉलर पहुंच गया। यह 11 महीने के आयात को कवर करने के लिए काफी है।

RBI की रिपोर्ट में भारतीय बैंकों की हालत मजबूत है। NPA कम है और तनाव परीक्षण में बैंक विपरीत हालात झेलने में सक्षम हैं। RBI गवर्नर ने खुद कहा है कि भारत की मैक्रोइकॉनॉमिक बुनियाद कई दूसरे देशों से बेहतर है।

कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से होती है मंहगाई

अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी तो परिवहन और खेती की लागत बढ़ेगी। जिसका असर खाद्य पदार्थ की कीमतों में दिखेगा। दूसरी तरफ, प्राकृतिक गैस की कीमतों में तेजी से उर्वरक उत्पादन महंगा हो सकता है।

क्योंकि खाद्य और ईंधन की कीमतें बढ़ती हैं, तो महंगाई पर नियंत्रण और सरकारी वित्तीय प्रबंधन की चुनौती भी बढ़ जाती है। यही वजह है कि 4F संकट को केवल महंगाई या ऊर्जा संकट के तौर पर नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के आपस में जुड़े जोखिमों के रूप में देखा जाता है

दुनिया के किसी हिस्से में युद्ध, सूखा, बाढ़ या समुद्री व्यापार में रुकावट आने पर अनाज और खाद्य तेलों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने के साथ उन देशों पर भी दबाव पड़ता है, जो अपनी जरूरत का कुछ हिस्सा आयात करते हैं।

भारत में खाद्य सुरक्षा की चुनौती दोहरी है। एक तरफ भारत में बड़ी आबादी को सस्ते रेट में अनाज उपलब्ध कराना है, तो वहीं दूसरी तरफ किसानों को सही दाम और खेती के जरूरी संसाधन भी देने हैं।

28 मई 2026 को जारी किए सरकारी आंकड़ों पर ध्यान दिया जाए तो भारत का गेहूं स्टॉक 513 लाख मीट्रिक टन और चावल का स्टॉक 397 लाख मीट्रिक टन था। यह आंकडा बफर स्टॉक मानकों से ज्यादा था। जिसमें सार्वजनिक वितरण प्रणाली और बाजार में सरकार की मदद भी शामिल है।

भारत की रणनीति क्या हो सकती है?

बफर स्टॉक मजबूत रखना: गेहूं और चावल का पर्याप्त भंडार बनाए रखना, ताकि आपात स्थिति में आपूर्ति प्रभावित न हो।
फसल विविधीकरण: दालों और तिलहनों का घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता घटाना।

खाद्य महंगाई पर नजर: जरूरत पड़ने पर भंडार, आयात-निर्यात नीति और बाजार में आपूर्ति के जरिए कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश करना।

जलवायु अनुकूल खेती: सूखा, बाढ़ और अनियमित मानसून के जोखिम से निपटने के लिए सिंचाई, बेहतर बीज और कृषि तकनीक को बढ़ावा देना।

हालांकि, केवल अनाज का पर्याप्त भंडार होना ही पूरी खाद्य सुरक्षा नहीं है। खाद्य तेलों, दालों और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतें भी आम परिवारों के बजट को प्रभावित करती हैं।

भारत के सामने कौन-से विकल्प हैं?

तेल आयात के स्रोत बढ़ाना: कुछ चुनिंदा देशों पर निर्भरता कम करके अलग-अलग देशों से आपूर्ति सुनिश्चित करना।

रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बढ़ाना: आपात स्थिति में कुछ समय तक आपूर्ति बनाए रखने के लिए कच्चे तेल का सुरक्षित भंडार विकसित करना।

नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों और जैव ईंधन के इस्तेमाल से तेल की मांग कम करना।

घरेलू उत्पादन और रिफाइनिंग मजबूत करना: आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता के जोखिम को समझते हुए घरेलू ऊर्जा संसाधनों और रिफाइनिंग क्षमता में निवेश करना।

ऊर्जा की बचत: सार्वजनिक परिवहन, ऊर्जा-कुशल तकनीक और बेहतर लॉजिस्टिक्स के जरिए ईंधन की खपत घटाना।

तो डरना चाहिए या नहीं?

ऐसे में भारत को डरने की जरूरत नहीं है। लेकिन लापरवाही भी नहीं बरतनी होगी। एस.जयशंकर की चेतावनी भारत के लिए ही नहीं बल्कि ग्लोबल साउथ के लिए थी। भारत के पास अनाज का भंडार, उर्वरक का स्टॉक है और विदेशी मुद्रा का पहाड़ है।

इसके बावजूद भी विदेशी स्थिति भी निर्भर करती है। अगर हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव तेज होता है तो ब्लैक सी से अनाज की आवाजाही रुक सकती है। या अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरक की कीमतों में वृद्धि भारत में मंहगाई बढ़ा सकती है।

यहां भारत के सामने चिंता की बात यह है कि 90 प्रतिशत कच्चा तेल भारत आयात करता है। स्ट्रैटेजिक रिजर्व सिर्फ 8 दिन का है। अगर सप्लाई में रुकावट आई तो देश में मंहगाई तय है।

सरकार ने मई 2026 में नागरिकों से ईंधन बचाने की अपील की। इसका मतलब है कि चिंता का स्तर अभी भी झूल रहा है। 4F संकट अपने आप हल करने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता, इसके लिए वैश्विक स्तर पर नियम और सुरक्षा कवच बनाने होंगे.