नई दिल्ली: देश के हवाई अड्डों के संचालन में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने की योजना एक बार फिर चर्चा में है। भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) के हवाई अड्डों को सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत निजी कंपनियों को सौंपने की योजना के अंतर्गत 11 एयरपोर्ट शामिल होने की खबर है। प्रस्ताव के मुताबिक, इनका संचालन लंबी अवधि यानी 50 साल तक निजी कंपनियों को दिया जा सकता है।

हालांकि, एयरपोर्ट की सूची, निविदा प्रक्रिया और योजना की अंतिम मंजूरी से जुड़ी जानकारी की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। इसलिए इसे सभी 11 एयरपोर्ट के निजीकरण का अंतिम फैसला मानना सही नहीं होगा।

क्या है सरकार की योजना?

हवाई अड्डों के विकास और संचालन में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के लिए PPP मॉडल का इस्तेमाल किया जाता है। इस व्यवस्था में निजी कंपनी तय शर्तों के तहत एयरपोर्ट का संचालन, रखरखाव और यात्री सुविधाओं में सुधार कर सकती है।

लंबी अवधि के लिए संचालन का अधिकार देने से कंपनियों को बुनियादी ढांचे में निवेश करने का समय मिलता है। वहीं, सरकार और AAI के लिए राजस्व बढ़ाने तथा हवाई अड्डों के विकास के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

50 साल की लीज का क्या होगा मतलब?

यदि किसी एयरपोर्ट का संचालन 50 साल के लिए निजी कंपनी को दिया जाता है, तो इसका अर्थ यह जरूरी नहीं कि एयरपोर्ट की जमीन और संपत्ति का मालिकाना हक भी कंपनी को बेच दिया गया हो। वास्तविक अधिकार और जिम्मेदारियां संबंधित अनुबंध की शर्तों पर निर्भर करती हैं।

इस व्यवस्था में निजी कंपनियां यात्रियों की सुविधाएं बेहतर बनाने, टर्मिनल का विकास करने और परिचालन क्षमता बढ़ाने में भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि, शुल्क, सेवा की गुणवत्ता और यात्रियों के हितों से जुड़े नियम भी महत्वपूर्ण होंगे।

यात्रियों पर क्या पड़ेगा असर?

निजी भागीदारी से एयरपोर्ट पर सुविधाओं, साफ-सफाई, प्रबंधन और यात्री सेवाओं में सुधार की संभावना रहती है। लेकिन इसका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां कितना निवेश करती हैं और नियामक संस्थाएं सेवाओं की निगरानी कैसे करती हैं।

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