RBI Repo Rate Hike: महंगाई के बढ़ते दबाव के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) दिसंबर में एक बार फिर रेपो रेट बढ़ा सकता है। Crisil के चीफ इकोनॉमिस्ट धर्मकीर्ति जोशी ने बुधवार को ANI से बातचीत में इस संभावना को मजबूत बताया है।
जोशी के मुताबिक, दिसंबर की मौद्रिक नीति बैठक में RBI के सामने रेपो रेट को यथावत रखने या बढ़ाने के विकल्प हो सकते हैं। उनके आकलन के अनुसार, फिलहाल ब्याज दर में कटौती की संभावना नहीं दिख रही है।
RBI ने 25 बेसिस प्वाइंट बढ़ाया रेपो रेट
जोशी का यह बयान RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) द्वारा रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी के बाद आया है। इस बढ़ोतरी के साथ पॉलिसी रेपो रेट 5.50 फीसदी हो गया है।
चीफ इकोनॉमिस्ट के अनुसार
Crisil के चीफ इकोनॉमिस्ट ने कहा कि RBI का यह फैसला उनकी संस्था के अनुमान के अनुरूप है। उन्होंने बताया कि Crisil ने पहले ही 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया था। इसके साथ ही मौद्रिक नीति के रुख में भी बदलाव की उम्मीद थी, जो उनके मुताबिक इस फैसले में देखने को मिला।
वेस्ट एशिया संकट और महंगे इनपुट ने बढ़ाई चिंता
जोशी ने कहा कि पिछली मौद्रिक नीति बैठक के बाद महंगाई से जुड़े जोखिम बढ़े हैं। वेस्ट एशिया में संघर्ष तेज होने, मानसून से जुड़े जोखिम और इनपुट लागत बढ़ने से महंगाई पर दबाव बढ़ा है।उनके मुताबिक, जब बाजार में घरेलू मांग मजबूत रहती है और कंपनियों की लागत बढ़ती है तो कारोबारी इसका बोझ ग्राहकों पर डाल सकते हैं। इससे महंगाई सिर्फ कुछ क्षेत्रों तक सीमित न रहकर व्यापक रूप ले सकती है।
खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर भी नजर
Crisil के मुताबिक खाद्य महंगाई भी आने वाले समय में एक बड़ी चिंता बनी रह सकती है। खासतौर पर अगर El Niño की स्थिति मजबूत होती है और इसका असर फसलों पर पड़ता है तो खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।जोशी ने कहा कि मौसम से जुड़े किसी बड़े झटके का असर फसल उत्पादन और महंगाई दोनों पर पड़ सकता है।
GDP ग्रोथ 7 फीसदी के आसपास रहने का अनुमान
महंगाई के जोखिम के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार फिलहाल मजबूत रहने का अनुमान है। Crisil को उम्मीद है कि मौजूदा वित्त वर्ष में भारत की GDP ग्रोथ करीब 7 फीसदी रह सकती है।यह अनुमान RBI के संशोधित 7.1 फीसदी के अनुमान के करीब है।
पहली आर्थिक छमाही
जोशी के मुताबिक, वित्त वर्ष की पहली छमाही में आर्थिक गतिविधियां मजबूत रह सकती हैं, लेकिन दूसरी छमाही में रफ्तार कुछ कम होने की संभावना है। महंगाई, वेस्ट एशिया संकट और मानसून के असर का ज्यादा पता दूसरी छमाही में चल सकता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कुछ सुरक्षा कवच
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर जोशी ने कहा कि कृषि क्षेत्र पहले की तुलना में ज्यादा विविध हुआ है। पशुपालन, पोल्ट्री और मछली पालन जैसे क्षेत्रों से ग्रामीण आय को बारिश से जुड़े झटकों के दौरान कुछ सहारा मिल सकता है।
सिंचाई व्यवस्था
उन्होंने सिंचाई व्यवस्था के विस्तार को भी एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच बताया। उनके अनुसार देश में सिंचित क्षेत्र अब करीब 59 फीसदी तक पहुंच गया है, जो करीब एक दशक पहले 49 फीसदी था।हालांकि, अगर मानसून से जुड़ा झटका बहुत बड़ा होता है तो ग्रामीण खपत पर इसका असर पड़ सकता है। ऐसे में सिंचाई और कृषि से जुड़े दूसरे क्षेत्रों का सहारा इस प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकता है।
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