बिजनेस
मिडिल ईस्ट में शांति समझौते से भारतीय कंपनियों को नई उम्मीद, निर्यात बढ़ाने की तैयारी
मिडिल ईस्ट में हाल ही में हुए शांति समझौते के बाद भारतीय कंपनियां एक बार फिर इस महत्वपूर्ण बाजार में बढ़ती मांग का लाभ उठाने की तैयारी कर रही हैं। पिछले कई महीनों से क्षेत्र में जारी संघर्ष के कारण व्यापार,सप्लाई चेन और निर्यात गतिविधियां प्रभावित हुई थीं।
मिडिल ईस्ट में हाल ही में हुए शांति समझौते के बाद भारतीय कंपनियां एक बार फिर इस महत्वपूर्ण बाजार में बढ़ती मांग का लाभ उठाने की तैयारी कर रही हैं। पिछले कई महीनों से क्षेत्र में जारी संघर्ष के कारण व्यापार,सप्लाई चेन और निर्यात गतिविधियां प्रभावित हुई थीं। अब हालात सामान्य होने के संकेत मिल रहे हैं,जिसके चलते भारतीय कंपनियों ने उत्पादन क्षमता बढ़ाने और निर्यात गतिविधियों को तेज करने की दिशा में कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।
FMCG क्षेत्र की कई प्रमुख कंपनियां खाड़ी देशों के लिए उठाया कदम
FMCG क्षेत्र की कई प्रमुख कंपनियां खाड़ी देशों के लिए अपने उत्पादन में बढ़ोतरी की योजना बना रही हैं। संघर्ष के दौरान मिडिल ईस्ट के लिए उत्पादन क्षमता का उपयोग घटकर 45 से 50 प्रतिशत तक रह गया था। अब खाद्य तेल निर्माता AWL एग्री बिजनेस, पारले प्रोडक्ट्स और डाबर जैसी कंपनियां अपनी क्षमता उपयोग को 90 प्रतिशत से अधिक तक ले जाने की तैयारी कर रही हैं। उद्योग जगत का मानना है कि मालभाड़े में कमी आने और सप्लाई चेन के सामान्य होने से निर्यात लागत घटेगी, जिसका लाभ कंपनियों और उपभोक्ताओं दोनों को मिलेगा।
निर्माण उपकरण क्षेत्र को इस बदलाव से बड़ी उम्मीदें
ऑटोमोबाइल और निर्माण उपकरण क्षेत्र को भी इस बदलाव से बड़ी उम्मीदें हैं। मारुति सुजुकी,जिसका कुल निर्यात में मिडिल ईस्ट का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, अब इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत करने की योजना बना रही है। वहीं जेसीबी इंडिया को युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्निर्माण कार्यों से नई मांग मिलने की उम्मीद है। सड़कों, भवनों और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए निर्माण उपकरणों की आवश्यकता बढ़ने की संभावना है।
भारतीय निर्यात क्षेत्र को नई गति मिलने की उम्मीद
मिडिल ईस्ट भारतीय कंपनियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण विदेशी बाजारों में से एक बना हुआ है। डाबर, हैवेल्स और मारिको जैसी कंपनियों की आय में इस क्षेत्र का योगदान है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि सप्लाई चेन के सामान्य होने, शिपिंग लागत में कमी और मांग में सुधार से आने वाले महीनों में भारतीय कंपनियों के राजस्व और मुनाफे दोनों में वृद्धि देखने को मिल सकती है। इससे भारतीय निर्यात क्षेत्र को नई गति मिलने की उम्मीद है।
युद्ध के दौरान मालभाड़े के खर्च पर दिखा था असर
AWL एग्री बिजनेस के अनुसार युद्ध के दौरान मालभाड़े में प्रति टन लगभग 100 डॉलर तक का अतिरिक्त खर्च जुड़ गया था। इसके कारण खाद्य उत्पादों की कीमतों पर दबाव बढ़ा। अब परिवहन लागत सामान्य होने पर आटा,खाद्य तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में 5 से 9 प्रतिशत तक कमी आने की संभावना है। इससे ईरान, इराक और सऊदी अरब जैसे बाजारों में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ सकती है।
Written By: Geeta Sharma
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