भारत में किफायती कारों की बात हो तो मारुति सुजुकी का नाम प्रमुख कंपनियों में आता है। अलग-अलग कीमत और जरूरत के हिसाब से वाहन उपलब्ध कराने की वजह से कंपनी की कारे देशभर में बड़ी संख्या में इस्तेमाल की जाती हैं। अब पेट्रोल, डीजल और सीएनजी के बाद मारुति सुजुकी वैकल्पिक और स्वच्छ ईंधन की दिशा में भी काम कर रही है।
कंपनी ने हरियाणा के मानेसर स्थित अपने मैन्युफैक्चरिंग प्लांट में 300 किलोवाट क्षमता वाला ग्रीन हाइड्रोजन पायलट प्लांट शुरू किया है। इस प्रोजेक्ट के जरिए कंपनी हाइड्रोजन के उत्पादन और औद्योगिक इस्तेमाल से जुड़ी तकनीक को समझने के साथ-साथ भविष्य के मोबिलिटी समाधानों के लिए भी जरूरी डेटा जुटा रही है। आइए जानते हैं इस प्रोजेक्ट से जुड़ी चार अहम बातें।
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रोजाना करीब 60 किलोग्राम ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन
मानेसर में लगाए गए इस पायलट प्लांट की स्थापित क्षमता 300 किलोवाट है। यहां सौर ऊर्जा की मदद से पानी को इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया के जरिए विभाजित कर ग्रीन हाइड्रोजन तैयार की जाती है।
कंपनी के अनुसार, यह सुविधा प्रतिदिन लगभग 60 किलोग्राम हाई-प्योरिटी हाइड्रोजन बनाने में सक्षम है। नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल होने के कारण इस प्रक्रिया का उद्देश्य पारंपरिक जीवाश्म ईंधन की तुलना में कार्बन उत्सर्जन को कम करना है।
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मानेसर प्लांट में ही होगा शुरुआती इस्तेमाल
फिलहाल तैयार की जा रही ग्रीन हाइड्रोजन का इस्तेमाल मारुति सुजुकी अपने मानेसर मैन्युफैक्चरिंग प्लांट के अंदर ही करेगी। शुरुआती तौर पर इसे हीट-ट्रीटमेंट, मैन्युफैक्चरिंग फर्नेस और कुछ कंपोनेंट्स से जुड़ी औद्योगिक प्रक्रियाओं में उपयोग किया जाएगा।
इन कार्यों में पारंपरिक रूप से प्राकृतिक गैस जैसे ईंधन का इस्तेमाल होता है। ऐसे में कुछ प्रक्रियाओं में ग्रीन हाइड्रोजन को अपनाने से प्राकृतिक गैस पर निर्भरता और प्रत्यक्ष कार्बन उत्सर्जन को कम करने की दिशा में मदद मिल सकती है।
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भविष्य की हाइड्रोजन कारों के लिए भी अहम प्रयोग
यह प्रोजेक्ट केवल फैक्ट्री में स्वच्छ ईंधन के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। पायलट प्लांट के जरिए मारुति सुजुकी हाइड्रोजन की उत्पादन लागत, भंडारण, सप्लाई और वास्तविक औद्योगिक उपयोग से जुड़े अनुभव हासिल कर सकती है।
इसी तरह का व्यावहारिक अनुभव भविष्य में हाइड्रोजन आधारित वाहनों के विकास में भी उपयोगी हो सकता है। कंपनी के रिसर्च एंड डेवलपमेंट प्रयासों के तहत हाइड्रोजन फ्यूल-सेल इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और हाइड्रोजन आधारित इंटरनल-कंबशन इंजन जैसी तकनीकों पर आगे काम करने के लिए यह प्रोजेक्ट महत्वपूर्ण आधार तैयार कर सकता है।
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2050 तक कार्बन न्यूट्रैलिटी का लक्ष्य
सुजुकी मोटर कॉरपोरेशन ने वर्ष 2050 तक अपने वैश्विक परिचालन और उत्पादों से जुड़े कार्बन उत्सर्जन को शून्य करने की दिशा में दीर्घकालिक लक्ष्य तय किया है। मानेसर में शुरू किया गया ग्रीन हाइड्रोजन पायलट प्रोजेक्ट इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
इसके अलावा, यह पहल भारत में स्वच्छ ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन को बढ़ावा देने वाली नीतिगत दिशा के अनुरूप भी है। आने वाले वर्षों में अगर हाइड्रोजन का उत्पादन, स्टोरेज और इस्तेमाल अधिक किफायती और व्यावहारिक होता है, तो इसका इस्तेमाल उद्योगों के साथ-साथ परिवहन क्षेत्र में भी बढ़ सकता है।
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क्या है इसका बड़ा फायदा?
मारुति सुजुकी का यह पायलट प्रोजेक्ट अभी शुरुआती स्तर पर है, लेकिन इससे कंपनी को ग्रीन हाइड्रोजन के व्यावहारिक इस्तेमाल का अनुभव मिलेगा। खास तौर पर मैन्युफैक्चरिंग में जीवाश्म ईंधन की जगह स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों को अपनाने की संभावनाओं को समझने में यह परियोजना मदद कर सकती है, साथ ही, इससे भविष्य में हाइड्रोजन आधारित वाहनों के लिए जरूरी तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर को समझने का रास्ता भी तैयार हो सकता है। हालांकि, बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन को अपनाने के लिए उत्पादन लागत, स्टोरेज, वितरण और रिफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी चुनौतियों का समाधान जरूरी होगा।