बीजिंग (चीन): चीन ने जातीय एकता को मजबूत करने के उद्देश्य से नया कानून लागू किया है, लेकिन इस कानून को लेकर उइगर समुदाय के अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ‘जातीय एकता और प्रगति संवर्धन कानून’ (Ethnic Unity and Progress Promotion Law) 1 जुलाई से लागू हुआ है, जिसे चीन की शीर्ष विधायिका ने मार्च में मंजूरी दी थी।

चीनी सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य देश के 56 जातीय समूहों के बीच समानता बढ़ाना, भेदभाव कम करना और विकास को बढ़ावा देना है। बीजिंग इसे राष्ट्रीय एकता और स्थिरता को मजबूत करने वाला कदम बता रहा है।

हालांकि, उइगर अधिकारों से जुड़े संगठनों का कहना है कि इस कानून से अल्पसंख्यक समुदायों पर अपनी भाषा, संस्कृति और धार्मिक पहचान को छोड़कर मुख्यधारा की पहचान अपनाने का दबाव बढ़ सकता है।

शिनजियांग में उइगरों को लेकर पहले से विवाद

यह कानून ऐसे समय आया है जब चीन के शिनजियांग क्षेत्र में उइगर मुस्लिम समुदाय को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों ने चीन पर धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और राजनीतिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने के आरोप लगाए हैं।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने 2022 में शिनजियांग में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों की बात कही थी और कुछ मामलों को मानवता के खिलाफ अपराध की श्रेणी में आने की संभावना जताई थी। हालांकि, चीन ने इन आरोपों को लगातार खारिज किया है।

बीजिंग का कहना है कि शिनजियांग में उसकी नीतियां आतंकवाद, अलगाववाद और कट्टरपंथ से निपटने के लिए हैं। चीनी सरकार क्षेत्र में आर्थिक विकास, बेहतर बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक सेवाओं को अपनी नीतियों की सफलता के रूप में पेश करती है।

भाषा को लेकर बढ़ी चिंता

नए कानून में चीनी भाषा के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया है, जबकि अल्पसंख्यक भाषाओं की सुरक्षा की बात भी कही गई है। चीन का तर्क है कि एक साझा भाषा राष्ट्रीय एकता और आपसी संवाद को मजबूत करती है।

वहीं आलोचकों का कहना है कि शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में मानक चीनी भाषा के बढ़ते प्रभाव से उइगर भाषा और संस्कृति कमजोर हो सकती है। उइगर समुदाय के लिए भाषा उनकी ऐतिहासिक पहचान, साहित्य और परंपराओं से जुड़ी हुई है।

धार्मिक स्वतंत्रता पर भी सवाल

उइगर समुदाय मुख्य रूप से मुस्लिम है। रिपोर्ट के अनुसार, शिनजियांग में धार्मिक गतिविधियों, धार्मिक शिक्षा और पूजा-पद्धतियों पर पहले से ही कड़े नियंत्रण की शिकायतें सामने आती रही हैं।

मानवाधिकार समूहों को आशंका है कि नए कानून के तहत जातीय एकता की व्यापक परिभाषा का इस्तेमाल सांस्कृतिक या धार्मिक गतिविधियों पर अतिरिक्त निगरानी के लिए किया जा सकता है।

विदेशों में रहने वाले उइगरों पर भी असर की आशंका

उइगर कार्यकर्ताओं और विदेशों में रहने वाले समुदाय के लोगों ने भी इस कानून को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यह कानून चीन की जातीय नीतियों की आलोचना करने वाले लोगों पर दबाव बढ़ा सकता है।

इस वजह से यह मामला केवल चीन की घरेलू नीति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार बहस का हिस्सा बन गया है।

चीन का पक्ष

चीन सरकार का कहना है कि नया कानून सभी जातीय समूहों के अधिकारों की रक्षा करता है और इसका उद्देश्य विकास, समानता और स्थिरता को बढ़ावा देना है। बीजिंग के अनुसार, सभी समुदाय अपनी परंपराओं और संस्कृति को बनाए रखते हुए चीन की साझा पहचान का हिस्सा बन सकते हैं।

वहीं आलोचकों का कहना है कि असली परीक्षा कानून के लागू होने के तरीके से होगी। उनका कहना है कि यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या उइगर समुदाय अपनी भाषा, धर्म और संस्कृति को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ा पाएगा या नहीं।

अंतरराष्ट्रीय नजरें कानून के अमल पर

अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर होगी कि चीन इस कानून को किस तरह लागू करता है। जहां चीन इसे राष्ट्रीय एकता और विकास का कदम बता रहा है, वहीं आलोचक इसे सांस्कृतिक पहचान और अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए संभावित चुनौती मान रहे हैं।

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