UP Election 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भारतीय जनता पार्टी के सामने टिकट बंटवारे को लेकर बड़ी चुनौती खड़ी होती नजर आ रही है। पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि आगामी चुनाव में उन नेताओं को मौका दिया जाए जिन्होंने मुश्किल समय में साथ दिया या फिर उन पुराने कार्यकर्ताओं को तरजीह दी जाए जो लंबे समय से संगठन के लिए काम कर रहे हैं।

दरअसल, 2024 के राज्यसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी से अलग होकर बीजेपी के समर्थन में आए सात विधायक अब 2027 विधानसभा चुनाव में पार्टी के टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं। वहीं दूसरी तरफ इन्हीं सीटों पर बीजेपी के पुराने नेता और संभावित उम्मीदवार भी अपनी दावेदारी मजबूत कर रहे हैं।ऐसे में पार्टी नेतृत्व के सामने नए नेताओं को साधने और पुराने कैडर को नाराज होने से बचाने की चुनौती है।

इन 7 विधानसभा सीटों पर फंसा टिकट का पेच

सपा से बीजेपी के करीब आए नेताओं और बीजेपी के पुराने दावेदारों के बीच कई सीटों पर राजनीतिक मुकाबला दिलचस्प हो गया है।

गौरीगंज (अमेठी)

यहां विधायक राकेश प्रताप सिंह की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है। वहीं बीजेपी के पुराने नेता चंद्र प्रकाश मिश्रा 'मटियारी' भी टिकट के लिए सक्रिय हैं।

गोसाईगंज (अयोध्या)

अभय सिंह के सामने पूर्व विधायक खब्बू तिवारी का गुट अपनी दावेदारी पेश कर रहा है।

बिसौली (बदायूं)

आशुतोष मौर्य की दावेदारी के बीच बीजेपी नेता कुशाग्र सागर भी टिकट की रेस में बताए जा रहे हैं।

कालपी (जालौन)

विनोद चतुर्वेदी के साथ निषाद पार्टी से जुड़े छोटे सिंह का नाम भी राजनीतिक समीकरणों में अहम माना जा रहा है।

जलालपुर (अंबेडकर नगर)

राकेश पांडे और उनके बेटे रितेश पांडे के अलावा बीजेपी के पुराने स्थानीय नेताओं की नजर भी इस सीट पर है।

ऊंचाहार (रायबरेली)

मनोज कुमार पांडे की दावेदारी के बीच बीजेपी ने अमरपाल मौर्य को अलग जिम्मेदारी दी है, जिससे यहां समीकरण कुछ अलग दिखाई दे रहे हैं।

चायल (कौशांबी)

पूजा पाल की स्थिति अन्य सीटों से अलग है। संगठन में जिम्मेदारी मिलने और ओबीसी वोट बैंक में पकड़ के कारण पार्टी के लिए उनका महत्व बढ़ गया है।

बागियों को टिकट मिला तो पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी का खतरा

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, बीजेपी के लिए यह सिर्फ चुनावी जीत का सवाल नहीं है, बल्कि संगठन के अंदर संतुलन बनाए रखने की भी परीक्षा है।
अगर पार्टी सपा से आए विधायकों को टिकट देती है तो इससे सहयोगी नेताओं को भरोसा मिलेगा कि पार्टी उनके साथ खड़ी है। लेकिन लंबे समय से पार्टी के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं में नाराजगी पैदा होने का खतरा भी रहेगा।वहीं अगर बागी नेताओं को टिकट नहीं मिलता है तो उनके राजनीतिक भविष्य और बीजेपी के साथ उनके रिश्तों पर सवाल उठ सकते हैं।

जातीय समीकरण और संगठन दोनों पर नजर

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में चुनावी टिकट सिर्फ जीत-हार के आधार पर तय नहीं होते, बल्कि जातीय समीकरण, क्षेत्रीय प्रभाव और संगठन की मजबूती भी अहम भूमिका निभाते हैं।2027 के चुनाव से पहले बीजेपी को ऐसा फैसला लेना होगा जिससे नए नेताओं को भी साधा जा सके और पुराने कार्यकर्ताओं का भरोसा भी कायम रहे।