बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के जल बंटवारे को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद अब खत्म हो गया है। नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक में दोनों राज्यों के बीच जल बंटवारे को लेकर समझौता हुआ। इसके साथ ही बिहार की महत्वपूर्ण इंद्रपुरी जलाशय परियोजना के आगे बढ़ने का रास्ता भी साफ हो गया है।

1973 के समझौते से जुड़ी है विवाद की कहानी
सोन नदी के पानी के बंटवारे की कहानी करीब 53 साल पुरानी है। साल 1973 में बाणसागर समझौते के तहत तत्कालीन अविभाजित बिहार के लिए सोन नदी के पानी का हिस्सा तय किया गया था। उस समय झारखंड अलग राज्य नहीं था। साल 2000 में बिहार से अलग होकर झारखंड नया राज्य बना। इसके बाद सोन नदी के पानी में हिस्सेदारी को लेकर दोनों राज्यों के बीच मतभेद सामने आने लगे। झारखंड अपने क्षेत्र में सोन नदी के जलग्रहण क्षेत्र और सहायक नदियों का हवाला देते हुए उचित हिस्सेदारी की मांग करता रहा, जबकि बिहार पुराने समझौते के आधार पर अपने हिस्से की बात करता रहा।

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अब हुआ जल बंटवारे पर समझौता
नए समझौते में सोन नदी के 7.75 मिलियन एकड़ फीट (MAF) पानी के बंटवारे को लेकर सहमति बनी है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक बिहार को करीब 5.75 MAF और झारखंड को 2 MAF पानी देने की व्यवस्था पर सहमति बनी है। इस समझौते को दोनों राज्यों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे लंबे समय से चले आ रहे जल विवाद का समाधान हुआ है और भविष्य में पानी के इस्तेमाल को लेकर टकराव की संभावना कम होगी।

इंद्रपुरी जलाशय परियोजना को मिलेगी रफ्तार
इस समझौते का सबसे बड़ा फायदा बिहार की इंद्रपुरी जलाशय परियोजना को मिलने की उम्मीद है। सोन नदी पर प्रस्तावित इस परियोजना को लंबे समय से जल बंटवारे और सहमति से जुड़ी अड़चनों का सामना करना पड़ रहा था। अब दोनों राज्यों के बीच सहमति बनने के बाद परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। इससे सोन नदी के पानी का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकेगा और बिहार के कई इलाकों में सिंचाई की सुविधा बढ़ने की उम्मीद है।

किसानों को क्या होगा फायदा?
सोन नदी का पानी बिहार के कई कृषि क्षेत्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। जल बंटवारे पर स्पष्ट समझौता होने से सिंचाई व्यवस्था को बेहतर करने में मदद मिल सकती है। परियोजना के आगे बढ़ने से खेती के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ने और किसानों को इसका फायदा मिलने की उम्मीद है। वहीं झारखंड को भी अपने हिस्से के पानी के इस्तेमाल की स्पष्ट व्यवस्था मिलेगी।

53 साल और 26 साल में क्या अंतर है?
इस खबर में 53 साल और 26 साल दोनों आंकड़े सामने आ रहे हैं। दरअसल, जल बंटवारे की मूल पृष्ठभूमि 1973 के बाणसागर समझौते से जुड़ी है, इसलिए इसे 53 साल पुरानी कहानी कहा जा रहा है। वहीं बिहार और झारखंड के अलग-अलग राज्य बनने के बाद दोनों के बीच हिस्सेदारी को लेकर विवाद करीब 26 साल से चला आ रहा था।

अब दोनों राज्यों के बीच समझौता होने के बाद इस लंबे विवाद के समाधान की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। इससे न केवल जल संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की उम्मीद है, बल्कि सिंचाई, किसानों और क्षेत्रीय विकास को भी फायदा मिल सकता है।

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