झारखंड: झारखंड में इन दिनों रैट फीवर यानी लेप्टोस्पायरोसिस को लेकर चिंता बढ़ रही है। मानसून के दौरान बारिश, जलभराव और दूषित पानी के संपर्क के कारण इस संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में लोगों के मन में सवाल है कि रैट फीवर आखिर कितना खतरनाक है और इससे कैसे बचा जा सकता है?
रैट फीवर क्या है?
रैट फीवर को मेडिकल भाषा में लेप्टोस्पायरोसिस कहा जाता है। यह Leptospira नाम के बैक्टीरिया से होने वाला संक्रमण है। संक्रमित चूहों और दूसरे जानवरों के पेशाब से दूषित पानी या मिट्टी के संपर्क में आने पर इंसान संक्रमित हो सकता है।
बारिश में क्यों बढ़ता है खतरा?
मानसून में जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति में दूषित पानी के संपर्क में आने की संभावना बढ़ जाती है। अगर इस पानी में संक्रमित जानवरों का पेशाब मिला हो तो बैक्टीरिया शरीर में प्रवेश कर सकता है। त्वचा पर मौजूद कट या घाव से संक्रमण का खतरा ज्यादा रहता है।
क्या इंसान से इंसान फैलता है?
रैट फीवर आमतौर पर फ्लू या कोरोना की तरह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आसानी से नहीं फैलता। संक्रमण का मुख्य कारण संक्रमित जानवरों के पेशाब से दूषित पानी या मिट्टी के संपर्क में आना है।
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ये लक्षण दिखें तो रहें सतर्क
रैट फीवर के शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे हो सकते हैं।
* तेज बुखार और ठंड लगना
* सिरदर्द
* मांसपेशियों में तेज दर्द
* कमजोरी और थकान
* उल्टी या दस्त
* आंखों का लाल होना
* पेट दर्द
गंभीर स्थिति में पीलिया, किडनी की समस्या, लिवर को नुकसान या सांस लेने में परेशानी हो सकती है।
बचाव कैसे करें?
बारिश के मौसम में गंदे या जलभराव वाले पानी में जाने से बचें। अगर किसी वजह से ऐसे पानी के संपर्क में आना पड़े तो जूते या गमबूट पहनें और शरीर पर मौजूद कट या घाव को ढककर रखें। बाहर से आने के बाद हाथ-पैर और शरीर को अच्छी तरह साफ करें।
अगर तेज बुखार के साथ मांसपेशियों में दर्द, आंखों का लाल होना या पीलिया जैसे लक्षण दिखाई दें और हाल में दूषित पानी के संपर्क में आए हों, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
रैट फीवर को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन मानसून में इसके जोखिम को नजरअंदाज भी नहीं करना चाहिए। समय पर पहचान और इलाज से गंभीर complications से बचा जा सकता है।
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