Sandila Assembly Seat Election 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की सरगर्मी तेज हो चुकी है और चुनावी हवा बहने लगी है। इसी चुनावी माहौल के बीच TNP News के खास कार्यक्रम '27 की सत्ता' की टीम जमीनी हकीकत जानने पहुंची है हरदोई जिले की चर्चित संडीला विधानसभा सीट पर। हमारी 'ग्राउंड जीरो' रिपोर्ट में जानिए कि संडीला की जनता का क्या मिजाज है, उन्होंने बीते सालों में क्या खोया और क्या पाया, और यहां के लोगों ने आगामी चुनाव को लेकर क्या खास राय रखी है।

हरदोई जिले में स्थित संडीला सिर्फ एक तहसील मुख्यालय नहीं, बल्कि लंबे समय से कृषि, व्यापार और उद्योग के लिहाज से महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। हरदोई और लखनऊ के बीच इसकी भौगोलिक स्थिति, सड़क और रेल कनेक्टिविटी तथा औद्योगिक क्षेत्र में बड़े निवेश ने संडीला को आसपास के कई कस्बों से अलग पहचान दी है। अगर राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो संडीला विधानसभा सीट का इतिहास काफी दिलचस्प रहा है। अलग-अलग दौर में यहां कांग्रेस, भारतीय जनसंघ, भाजपा, बसपा, सपा और निर्दलीय उम्मीदवारों को जीत मिलती रही। हालांकि 2014 के बाद हुए लोकसभा चुनावों और 2017 तथा 2022 के विधानसभा चुनावों के आंकड़े भाजपा के मजबूत प्रदर्शन को दिखाते हैं।

1952 से शुरू हुआ संडीला का चुनावी सफर

संडीला का विधानसभा चुनावी इतिहास उत्तर प्रदेश के शुरुआती विधानसभा चुनावों से जुड़ा है। 1952 में यह सीट संडीला-कम-बिलग्राम साउथ ईस्ट के नाम से जानी जाती थी और उस समय यह दो सदस्यीय विधानसभा क्षेत्र था। 1957 में भी यह दो सदस्यीय और अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट रही। इसके बाद 1962 से संडीला एक सदस्यीय विधानसभा क्षेत्र बन गया। समय के साथ परिसीमन के कारण इसकी सीमाओं में कई बदलाव हुए। 2008 के परिसीमन में विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्गठन हुआ और संडीला का वर्तमान स्वरूप सामने आया। 1962 के बाद हुए 16 विधानसभा चुनावों में भाजपा और उसकी पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ को मिलाकर छह जीत मिली हैं। कांग्रेस और बसपा ने तीन-तीन बार, निर्दलीय उम्मीदवारों ने दो बार, जबकि जनता दल और समाजवादी पार्टी ने एक-एक बार इस सीट पर जीत दर्ज की।

2012 में सपा की जीत, 2017 में भाजपा का बड़ा बदलाव

2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के कुंवर महाबीर सिंह ने जीत दर्ज की। उन्होंने उस समय के बसपा विधायक अब्दुल मन्नान को 19,134 वोटों के अंतर से हराया था।अब्दुल मन्नान इससे पहले 1996, 2002 और 2007 में लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीत चुके थे। लेकिन 2012 में उनका जीत का सिलसिला टूट गया।इसके बाद 2017 में संडीला के चुनावी समीकरण में बड़ा बदलाव दिखाई दिया। भाजपा के राज कुमार अग्रवाल ने चुनाव जीता। उन्होंने सपा से आए अब्दुल मन्नान को 20,403 वोटों के अंतर से हराया।खास बात यह रही कि 2012 में भाजपा का वोट शेयर केवल 0.79 प्रतिशत था, जो 2017 में बढ़कर 45.49 प्रतिशत हो गया। यानी पांच साल के भीतर सीट पर भाजपा के प्रदर्शन में बड़ा बदलाव आया।

2022 में भाजपा ने बढ़ाया जीत का अंतर

2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अलका सिंह अर्कवंशी को उम्मीदवार बनाया। उन्होंने 1,01,730 वोट हासिल किए और जीत दर्ज की।वहीं अब्दुल मन्नान ने सपा छोड़कर बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और उन्हें 64,627 वोट मिले। इस तरह अलका सिंह ने 37,103 वोटों के अंतर से जीत हासिल की।इस चुनाव के साथ अब्दुल मन्नान की लगातार तीन विधानसभा चुनावों में हार हो गई। दूसरी तरफ भाजपा ने 2017 के मुकाबले 2022 में अपनी जीत का अंतर और बढ़ाया।

2014 के बाद लोकसभा चुनावों में भी भाजपा की बढ़त

संडीला विधानसभा क्षेत्र में लोकसभा चुनावों के दौरान भी पिछले कुछ चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन में बदलाव देखने को मिला।2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा यहां चौथे स्थान पर रही थी। बसपा ने सपा पर 7,175 वोटों की बढ़त बनाई थी।2014 में तस्वीर बदली। भाजपा ने संडीला विधानसभा क्षेत्र में बसपा पर 7,346 वोटों की बढ़त हासिल की। 2019 में यह बढ़त बढ़कर 32,225 वोट हो गई।2024 के लोकसभा चुनाव में सपा भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी रही। भाजपा उम्मीदवार अशोक कुमार रावत को संडीला विधानसभा क्षेत्र में 99,721 वोट मिले, जबकि सपा उम्मीदवार संगीता राजवंशी को 74,117 वोट मिले। इस तरह भाजपा को यहां 25,604 वोटों की बढ़त मिली।

संडीला में बढ़ रही है मतदाताओं की संख्या

संडीला विधानसभा क्षेत्र में पिछले वर्षों के दौरान पंजीकृत मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी है।

  • 2012: 3,08,852 मतदाता
  • 2017: 3,34,078
  • 2019: 3,38,357
  • 2022: 3,41,279
  • 2024: 3,52,674

हालांकि मतदान प्रतिशत में उतार-चढ़ाव रहा है। 2012 में विधानसभा चुनाव में मतदान 63.14 प्रतिशत था, जो 2017 में 59.46 प्रतिशत रह गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में यह 55.56 प्रतिशत रहा। 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान बढ़कर 59.94 प्रतिशत हुआ, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यह फिर घटकर 54.89 प्रतिशत रह गया।

कैसी है संडीला की सामाजिक संरचना

सामाजिक संरचना की बात करें तो संडीला हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अनुसूचित जाति के मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 26.68 प्रतिशत और मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 18.50 प्रतिशत है। अनुसूचित जाति की आबादी में पासी और जाटव समेत कई समुदाय शामिल हैं। वहीं कुर्मी, लोधी और अन्य पिछड़े वर्गों के साथ ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य सवर्ण समुदाय भी क्षेत्र में मौजूद हैं।संडीला मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्र है। करीब 88.03 प्रतिशत मतदाता ग्रामीण इलाकों में रहते हैं, जबकि लगभग 11.97 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्र से जुड़ी है।

ऋषि शांडिल्य से जुड़ी है शहर के नाम की मान्यता

संडीला के इतिहास को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं। एक स्थानीय और प्रचलित मान्यता के अनुसार इस क्षेत्र का संबंध ऋषि शांडिल्य से है। हरदोई जिला प्रशासन की जानकारी में भी यह मान्यता मिलती है कि संडीला को ऋषि शांडिल्य ने बसाया था।हालांकि कुछ पुराने ऐतिहासिक विवरण अलग कहानी बताते हैं। एक विवरण के अनुसार शहर का पुराना नाम सीतल पुरवा था और बाद में 14वीं शताब्दी के अंतिम दौर में यह सैयद मखदूम अलाउद्दीन के नियंत्रण में आया। इसी परंपरा में संडीला नाम को उनके द्वारा कहे गए शब्द ‘सनद अल्लाह’ से जोड़कर देखा जाता है।इसलिए संडीला के नाम और स्थापना को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक एवं स्थानीय परंपराएं मिलती हैं।

उद्योगों ने बदली संडीला की आर्थिक पहचान

संडीला की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक कृषि, व्यापार और छोटे उद्योगों पर निर्भर रही। शहर के प्रसिद्ध लड्डू भी इसकी स्थानीय पहचान का हिस्सा रहे हैं और संडीला रेलवे स्टेशन से भी इनका नाम जुड़ा रहा है।20वीं शताब्दी में औद्योगिक गतिविधियों ने यहां गति पकड़ी। चीनी, कपड़ा, धातु और वनस्पति तेल से जुड़ी इकाइयों ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया।उत्तर प्रदेश राज्य वस्त्र निगम की संडीला स्पिनिंग मिल्स वर्ष 2001 में बंद हो गई थी। इसके बाद भी क्षेत्र में नए औद्योगिक निवेश आए। आईटीसी, हल्दीराम्स, बर्जर पेंट्स, ब्रिटिश पेंट्स और वरुण बेवरेजेज जैसी कंपनियों की विनिर्माण गतिविधियों ने संडीला की औद्योगिक पहचान को मजबूत किया है।

लखनऊ और हरदोई के बीच होने का मिला फायदा

संडीला की भौगोलिक स्थिति भी इसके आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण रही है। यह लखनऊ से करीब 54 किलोमीटर, हरदोई से 58 किलोमीटर, सीतापुर से 64 किलोमीटर, उन्नाव से 67 किलोमीटर और कानपुर से लगभग 80 किलोमीटर दूर है।संडीला रेलवे स्टेशन लखनऊ-हरदोई रेल मार्ग पर स्थित है। इससे लखनऊ के साथ-साथ रोहिलखंड क्षेत्र की ओर भी रेल संपर्क मिलता है।सड़क और रेल दोनों माध्यमों से कनेक्टिविटी होने के कारण औद्योगिक इकाइयों तक कच्चे माल, तैयार माल और श्रमिकों की आवाजाही अपेक्षाकृत आसान हुई है। यही वजह है कि संडीला में औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार के साथ शहर का आर्थिक महत्व भी बढ़ा है।

2027 से पहले संडीला की राजनीति पर नजर

पिछले चुनावों के आंकड़ों को देखें तो 2014 के बाद संडीला विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का प्रदर्शन मजबूत रहा है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने जीत दर्ज की, जबकि 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भी संडीला क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवारों को बढ़त मिली।हालांकि चुनावी परिणाम कई कारकों पर निर्भर करते हैं। उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे, संगठन, गठबंधन और मतदाताओं का चुनावी रुख आने वाले चुनाव में भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संडीला में राजनीतिक समीकरणों को समझने के लिए नए उम्मीदवारों, गठबंधनों और स्थानीय मुद्दों पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।

यहां देखें पूरा वीडियो-