Demolition of Saharanpur Mosque: जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित एक प्राचीन मस्जिद के ध्वस्तीकरण पर गहरा दुख और अफसोस व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि सुबह लगभग 5 बजे की गई इस कार्रवाई ने एक बार फिर संविधान में निहित समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और कानून के समान संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मौलाना मदनी के अनुसार, यदि संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है तो कानून के क्रियान्वयन में अलग-अलग मापदंड नहीं होने चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर एक ही कानून को लागू करने में दोहरा रवैया क्यों दिखाई देता है।
कार्रवाई को संविधान और कानून से जोड़ा
मौलाना मदनी ने कहा कि सहारनपुर की घटना केवल एक धार्मिक स्थल के ध्वस्तीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कानून के शासन, संविधान की सर्वोच्चता, धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासन की निष्पक्ष भूमिका से जुड़ा संवेदनशील विषय है।
उन्होंने दावा किया कि 1991 का पूजा स्थल अधिनियम अभी प्रभावी है और कार्रवाई को लेकर उससे जुड़े कानूनी सवाल उठते हैं। उन्होंने वक्फ कानून और वक्फ बाई यूजर से संबंधित प्रावधानों का भी उल्लेख किया। साथ ही उन्होंने कहा कि संबंधित मस्जिद के वक्फ बोर्ड में पंजीकरण और संपत्ति के पुराने दस्तावेजों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
ऐतिहासिक दस्तावेजों पर भी उठाए सवाल
मौलाना मदनी ने कहा कि मस्जिद कमेटी की ओर से अदालत के समक्ष पुराने दस्तावेज पेश किए गए थे। कमेटी के अनुसार, मस्जिद का अस्तित्व कलेक्ट्रेट की वर्तमान इमारत से पहले का है और इसके समर्थन में पुराने नगरपालिका एवं राजस्व अभिलेख सहित 1911 से संबंधित दस्तावेज भी प्रस्तुत किए गए थे। उन्होंने सवाल किया कि यदि किसी धार्मिक स्थल के ऐतिहासिक अस्तित्व और लंबे समय से धार्मिक उपयोग से संबंधित दस्तावेज अदालत के सामने मौजूद हों, तो उन तथ्यों पर पूरी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
"समान कानून और समान न्याय" की मांग
मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि यदि सरकारी जमीन, अतिक्रमण या अवैध निर्माण कार्रवाई का आधार है तो यही मापदंड सभी धर्मों और समुदायों के धार्मिक स्थलों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। उनके मुताबिक, किसी एक समुदाय के धार्मिक स्थल पर विशेष सख्ती का आरोप न्याय और प्रशासनिक निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े करता है। उन्होंने कहा कि भारत किसी एक धर्म या वर्ग का देश नहीं है, बल्कि सभी धर्मों और आस्थाओं के लोगों का साझा वतन है। संविधान ने किसी नागरिक को प्रथम या द्वितीय श्रेणी का दर्जा नहीं दिया है।
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"हम विशेष रियायत नहीं, समान न्याय मांग रहे हैं"
मौलाना मदनी ने अंत में कहा कि उनकी मांग किसी विशेष रियायत की नहीं, बल्कि समान न्याय की है। उन्होंने सवाल किया कि जो कानून एक मस्जिद के लिए लागू होता है, वही कानून दूसरे धार्मिक स्थलों पर भी समान रूप से क्यों नहीं लागू किया जाता। उन्होंने कहा कि यदि संविधान और कानून सभी नागरिकों के लिए हैं, तो उनका संरक्षण भी बिना किसी भेदभाव के समान रूप से होना चाहिए।
Reported By: एम अतहर उद्दीन मुन्ने भारती