नई दिल्ली : भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि BRICS को एक ‘जीवंत नालंदा विश्वविद्यालय’ के रूप में विकसित होना चाहिए, जहां अलग-अलग देशों की न्यायिक व्यवस्थाएं एक-दूसरे के अनुभवों और विचारों से सीख सकें।

सुप्रीम कोर्ट में आयोजित BRICS मुख्य न्यायाधीश फोरम के दूसरे दिन संबोधित करते हुए CJI ने कहा कि प्राचीन नालंदा में विभिन्न सभ्यताओं के विद्वान एक साथ आकर विचारों पर चर्चा और बहस करते थे। उन्होंने कहा कि नालंदा की खासियत यह थी कि वहां विचारों में असहमति के बावजूद संवाद और विमर्श के लिए खुला वातावरण मिलता था।

उन्होंने कहा कि BRICS को भी विभिन्न न्यायिक प्रणालियों और परंपराओं के बीच सीधे संवाद और सहयोग का मंच बनना चाहिए। “BRICS को भी जीवंत नालंदा विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाना चाहिए,” उन्होंने कहा।

समय पर न्याय आर्थिक विकास की नींव

CJI सूर्यकांत ने समयबद्ध और भरोसेमंद न्याय को आर्थिक विकास, तकनीक, विवाद समाधान और सतत ऊर्जा के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने न्याय व्यवस्था की तुलना इमारत की ‘भार वहन करने वाली दीवार’ से की और कहा कि यह भले दिखाई न दे, लेकिन इसके बिना व्यवस्था टिक नहीं सकती।

उन्होंने कहा कि विवादों के तेजी और निष्पक्ष तरीके से निपटारे को लेकर अनिश्चितता विदेशी निवेशकों के लिए जोखिम बढ़ाती है। तेज और भरोसेमंद न्याय व्यवस्था इस छिपी लागत को कम कर सकती है।

चार प्रमुख मुद्दों पर चर्चा

BRICS मुख्य न्यायाधीश फोरम में चार प्रमुख विषयों पर चर्चा हुई:

1. मध्यस्थता और अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक विवाद।
2.  सीमा पार मध्यस्थता निर्णयों को लागू करने की चुनौतियां।
3. न्यायपालिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल।
4. न्यायिक नेतृत्व और सतत विकास।

AI से जुड़े सत्र में न्यायिक प्रशासन में डिजिटल तकनीक, AI आधारित केस लिस्टिंग और प्रबंधन जैसे विषयों पर चर्चा हुई। साथ ही इस बात पर जोर दिया गया कि न्यायिक फैसलों में मानवीय विवेक की भूमिका बनी रहनी चाहिए।

पर्यावरण से जुड़े सत्र में सौर और पवन ऊर्जा सहित टिकाऊ ऊर्जा की ओर बढ़ते देशों के संदर्भ में न्यायपालिका की भूमिका पर चर्चा हुई। इसमें जंगल, वन्यजीव और जल संसाधनों से जुड़े विवाद भी शामिल रहे।

फोरम में BRICS देशों के अलावा बेलारूस, बोलीविया, कजाकिस्तान, मलेशिया, थाईलैंड, युगांडा और उज्बेकिस्तान जैसे साझेदार देशों के न्यायिक प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया।

CJI ने प्रतिनिधियों से नालंदा की भावना के अनुरूप खुले मन, तार्किकता और गंभीरता के साथ विचार-विमर्श करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि न्यायिक संवाद और अनुभवों के आदान-प्रदान से देशों के बीच सहयोग को और मजबूत किया जा सकता है।

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