home rent: देश में यूं तो कई ऐसे शहर हैं जहां लोगों की अपना घर बनाना पहली पसंद होता है। लेकिन इस सपने को पूरा करने के दौरान लोगों के पास सेलरी से बचत का एक भी रुपया न बचना सबसे बड़ी समस्या बनता है। आज के युवा वर्ग के सामने बेहतर नौकरी पाने के कारण अपने घर से दूर रहना किसी चुनौती से कम नहीं है। इसमें युवा वर्ग अपनी सैलरी का तकरीबन 53 प्रतिशत हिस्सा किराया देने में खो देता है। जिसके बाद इंसान के हाथ आमदमी अट्ठन्नी और खर्चा रूपया आता है।
लेकिन इसके बाद भी आज युवा वर्ग बेहतरीन नौकरी के कारण अपनी आधी से ज्यादा सेलरी किराए में भर रहा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर देश का ऐसा कौन सा शहर है जहां युवा वर्ग अपनी सैलरी का आधे से ज्यादा हिस्सा किराए में खो रहा है। तो चलिए बताते हैं आपको आज उस शहर के बारे में जहां नौकरी कर लोग अपनी आधी से ज्यादा सेलरी मकान मालिक को किराए में दे रहे हैं?
सैलरी आते ही किराए में जाता है पैसा
भारत एक ऐसा संपन्न देश है। जहां जीवन जीने के लिए आम सुविधाएं बेहद आसानी से मिल जाती है। लेकिन कई बार काम की तलाश में देश का युवा बड़े शहरों में घर किराए पर लेता है। लेकिन इसमें सबसे बड़ी समस्या उनको कई शहरों में सैलरी का आधा से ज्यादा हिस्सा किराया में देना पड़ रहा है। जो एक बड़ा आर्थिक संकट भी है। देश के कई बड़े शहरों में नौकरी करने वाले लोगों को अपना मासिक वेतन किराए में देने के बाद सेविंग के तौर पर 20 प्रतिशत ही बचता है। मुंबई, कोलकाता और हैदराबाद में किराये का बोझ सबसे अधिक है।
जानिए किस शहर का कितना आंकड़ा?
अर्बन लैंड इंस्टीट्यूट द्वारा साल 2025 एशिया-पैसिफिक होम अटेनबिलिटी इंडेक्स के जारी आंकड़ों पर ध्यान दिया जाए तो मुंबई में किराए पर रहने वाले लोगों की इनकम का सबसे ज्यादा 53% हिस्सा किराए में खर्च हो रहा है। इसके बाद अन्य शहरों के जारी आंकड़े पर ध्यान दिया जाए तो कोलकाता में 48% और हैदराबाद में 47% सेलरी किराए में जा रही है। दिल्ली-NCR में यह आंकड़ा 34% है तो पुणे में यह आंकड़ा 32% है। बेंगलुरु, अहमदाबाद और चेन्नई में एक शख्स पर अपनी सेलरी का सालाना 29% किराया दर्ज किया गया है।
किराये का बढ़ता बोझ बना चिंता
इस समय बड़े शहरों में आवास की तलाश के साथ परिवार के लिए जेब में वित्तीय दबाव सबसे अहम है। ऐसे में किराए में सेलरी का एक बड़ा हिस्सा जाने के बाद नौकरी पेशा वर्ग के पास जो बचता है वह प्रयाप्त नहीं है। उस बचे हुए हिस्से न ही वह खुद की और न ही अपने परिवार के दूसरे सदस्यों की जरूरतों को पूरा करने में सक्ष्म होता है। RentenPe की CEO और Co-founder सारिका शेट्टी का इस विष्य पर कहना है कि, किफायती आवास का सीधा अर्थ इस समय पूरी तरह से उलट चुका है।
लोगों को रहने के लिए घर नहीं मिलता है। और मिलता भी है तो वह किराए का होता है। जो उसकी आधी सेलरी ले लेता है। इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा अहम यहही है कि इंसान को घर बनाए रखने के लिए अपनी सेलरी को किस तरह खर्च करना है इसलिए एक योजना बनानी होगी।
ULI के आंकड़ों ने जारी किया बड़े शहरों में कितना प्रतिशत है किराया
मुंबई: 53%
कोलकाता: 48%
हैदराबाद: 47%
दिल्ली-NCR: 34%
पुणे: 32%
बेंगलुरु: 29%
अहमदाबाद: 29%
चेन्नई: 29%
सालाना 6.58 प्रतिशत हिस्सा जा रहा है किराया
अगर आंकड़ों पर ध्यान दिया जाए तो शहर के हिसाब से घर बनाने पर आने वाला खर्च परिवार की सेलरी और उसकी जेब पर आने वाले दबाव को दर्शाता है। सरकारी उपभोग संबंधी आंकड़े भी शहरी परिवरों के खर्च में किराए की अहम भूमिका को दर्शाते हैं। भारत के शहरी क्षेत्रों में मासिक सेलरी का एक बड़ा हिस्सा शख्स किराए में लगा रहा है। किराए की सालाना राशि का कुल योग किया जाए तो प्रत्येक बड़े शहर में तकरीबन 6.58 प्रतिशत हिस्सा किराया में जाया हो रहा है।
इसमें गैर-खाद्य खर्च का भी काफी ज्यादा महत्वपूर्ण है। सिर्फ किराये और इनकम का हिसाब लगाया जाए तो किसी परिवार की पूरी वित्तीय स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता। इसमें इनकम के साथ-साथ परिवार के लोगों की संख्या, प्रत्येक व्यक्ति पर होने वाले खर्च के बाद जो बचता है वह काफी ज्यादा महत्वपूर्ण है।
किराये का भुगतान वित्तीय क्षमता का संकेत
किफायती दाम पर एक बेहतरीन आवास का मिलना भुगतान के आंकड़े का गणित बैठाता है। लेकिन आय का आधा हिस्सा की व्यय होना सारा गणित खराब कर देता है। ऐसे में किराए के भुगतान में देरी आने के कारण यह दवाब कई बार डबल भी हो जाता है।
सीधे तो पर इसे इस बात से समझा जा सकता है कि हर शख्स हर माह 40,000-50,000 किराया अपनी सेलरी से दे रहा है, यह एक मौजूदा वित्तीय दायित्व है। अगर वह समय पर इसे भुगतान करता है, तो यह उसके वित्तीय व्यवहार पर अधिक दबाब डालता है। लेकिन इस तरह के संकेत पारंपरिक क्रेडिट आकलन के विकल्प को दर्शाते हैं।
किराया देकर कितनी बचन
NK Realtors के असोसिएट डायरेक्टर समुज्ज्वल घोष का इस मामले पर कहना है कि आवास में बचत का आकलन इस आधार पर भी किया जाना चाहिए कि किराया देने के बाद पिरवार के पास कितना पैसा बचा। अगर किराया 30% या उससे ज्यादा खर्च किया जाएगा। इसका असर परिवार के जीवन स्तर, वित्तीय सुरक्षा और भविष्य की आकांक्षाओं पर दिखेगा।
ऐसे में इंसान को घर लेने से पहले अपनी इनकम का पूरा गणित सिर्फ किराये को देखना ही नहीं है। घर की स्थिति, आने-जाने का समय, बुनियादी ढांचा और परिवार की प्राथमिकताओं को भी ध्यान में रखना बेहद जरूरी है।
आ रही है वित्तीय समस्या
शहरी क्षेत्रों में किराए पर रहने वाले लोगों में घर की मांग इस समय ज्यादा ही बढ़ गई है। ऐस में एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी कि किसी परिवार के पास सालाना आय से अलग कितना बच रहा है। किराया चुकाने के बाद बचने वाली आय और परिवार के दूसरे खर्च भी आवास की वास्तविक किफायत को तय करते हैं। तभी किराये का बोझ वित्तीय क्षमता को समझने के लिए अतिरिक्त नजरिया दे सकते हैं।
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