Pitru Paksha 2026: पितृ पक्ष को हिंदू धर्म में पूर्वजों को याद करने और उनके निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने का समय माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन दिनों श्रद्धा से किए गए कर्मों से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

श्राद्ध कर्म पूरा होने के बाद ब्राह्मण को भोजन कराने की परंपरा है। इसके अलावा गाय, कौवे, कुत्ते और चींटियों को भी भोजन देने की मान्यता है। लेकिन श्राद्ध के भोजन को लेकर कुछ खास नियम भी बताए गए हैं।धार्मिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि श्राद्ध का भोजन ऐसे व्यक्ति को कराया जाना चाहिए जो इसके योग्य माना जाता हो।

किन लोगों को श्राद्ध का भोजन नहीं कराने की मान्यता है?

मार्कण्डेय पुराण के संदर्भ में बताया जाता है कि गलत आचरण में शामिल लोगों को श्राद्ध का भोजन कराने से बचना चाहिए। इसमें छल-कपट, चोरी, हिंसा या दूसरे अनुचित कामों में शामिल व्यक्ति बताए गए हैं।इसी तरह जो व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को नुकसान पहुंचाता है, उसे भी श्राद्ध के भोजन के लिए उचित नहीं माना गया है।धार्मिक मान्यताओं में माता-पिता का सम्मान न करने वाले और गुरु, बुजुर्गों तथा बड़ों का आदर न करने वाले लोगों को भी श्राद्ध भोजन के लिए अपात्र बताया गया है।

जरूरतमंद को भोजन कराना माना जाता है शुभ

ऐसा नहीं है कि श्राद्ध का भोजन केवल ब्राह्मण या पुजारी को ही कराया जा सकता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जरूरतमंद और भूखे व्यक्ति को भोजन कराना भी पुण्य का काम माना गया है।अगर श्राद्ध के दिन कोई साधु, संत, तपस्वी या अतिथि अचानक घर पर आ जाए तो उसे भी भोजन कराने की परंपरा बताई गई है। इसके अलावा परिवार के सदस्य, रिश्तेदार और पड़ोसी भी श्राद्ध का प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं।

कब खत्म होगा पितृ पक्ष?

इस साल पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से हुई थी। इसी दिन पूर्णिमा श्राद्ध किया गया। इसके बाद 27 सितंबर को प्रतिपदा, 28 सितंबर को द्वितीया और 29 सितंबर को तृतीया श्राद्ध हुआ।30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध, जबकि 1 अक्टूबर को षष्ठी श्राद्ध किया गया। 2 अक्टूबर को सप्तमी श्राद्ध मनाया जा रहा है। पितृ पक्ष का समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा।

Disclaimer: इस लेख में बताई गई बातें धार्मिक मान्यताओं और उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों पर आधारित हैं। अलग-अलग परंपराओं और क्षेत्रों में इनके नियम अलग हो सकते हैं। इसे किसी प्रमाणित धार्मिक या वैज्ञानिक तथ्य के रूप में न लें।