Krishna Janmashtami 2026 : इस साल की श्री कृष्ण जन्माष्टमी आपको द्वापर युग की याद दिला देगी। क्योंकि इस बार श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर दुर्लभ संयोग बन रहा है। पंचाग के हिसाब से 4 सितंबर 2026 को शुक्रवार के दिन श्री कृष्ण जन्माष्टमी है। इसी दिन मध्यरात्रि में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का खास संयोग 15 साल बाद बन रहा है। चंद्रमा वृषभ राशि में उपस्थित रहेगा। इस समय को बेहद शुभ भी माना जा रहा है। इस खास संयोग में ही द्वापर युग में अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में नटखट कान्हा का जन्म हुआ था। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त निशीथ काल यानी रात करीब 11:57 बजे से 12:43 बजे तक रहेगा।

जानिए अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का खास समय और शुभ संयोग

इस वर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी 4 सितबंर की रात 2.25 बजे शुरु होकर 5 सितंबर की रात 12.13 बजे तक रहने वाली है। 4 सितंबर की रात 12.29 बजे से रोहिणी नक्षत्र का संयोग बनेगा। जो 5 सितंबर की रात 11.04 बजे तक रहेगा। निशीथ काल में पूजा का शुभ समय देर रात 11.56 बजे से 12.42 बजे तक रहने वाला है। यह समय दिल्ली और यूपी के आस-पास के क्षेत्रों के लिए है।

मथुरा में भी खास संयोग पर होगी विशेष पूजा

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक भाद्रपद की अष्टमी तिथि पर रोहिणी नक्षत्र का दुर्लभ संयोग बना था। इसी खास संयोग में प्रभु श्रीकृष्ण जन्मे थे। मथुरा के मंदिरों में कल खास संयोग बनने के कारण विशेष पूजन का आयोजन किया गया है। मथुरा के वृंदावन समेत पूरे ब्रज में नंदोत्सव की खास धूम, रंग बिरंगी लाइटों से साज सज्जा, झांकिया देखने को मिलेगी।

जन्माष्टमी पर ही होती है बांके बिहारी की मंगला आरती

जन्माष्टमी का दिन अपने आप में बेहद खास इसलिए भी है क्योंकि इसी दिन बांके बिहारी की मंगला आरती सालभर में केवल एक बार यानी जन्माष्टमी पर की जाती है। इसके पीछे भी खास परंपरा है। क्योंकि बांके बिहारी बाल स्वरूप में विराजमान है। इसलिए उनकी दिनचर्या बाकी दिनों में अलग होती है। उनकी रोज की आरती में घंटी और ताली नहीं बजाई जाती। क्योंकि कहा जाता है ऐसा करने से बालक डर जाता है। और बांके बिहारी बाल स्वरूप है। हालांकि यह धार्मिक मान्यता है।

3 जन्मों के धुलेंगे पाप 


शास्त्रों के हिसाब से सटीक संयोग अर्धरात्रि में प्रमुख ग्रह-नक्षत्र के साथ आ रहे हैं। शास्त्रों में इसका विशेष फल बताया गया है। जो इस प्रकार है-

’अर्द्धरात्रे तु रोहिण्यां यदा कृष्णाष्टमी भवेत्.
तस्यामभ्यर्चनं शौरिहन्ति पापों त्रिजन्मजम्.’

यानी इस बार खास संयोग बनने के कारण श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर व्रत करने वाले के 3 जन्मों के पाप धुल जाते हैं। निर्णय सिंधु ग्रथ की मुताबित सतयुग, त्रेता और द्वापर युग में विद्वान इसी नक्षत्र के आधार पर व्रत करते हैं। क्योंकि नारायण का अवतार की श्री कृष्ण है जो पालनहार है। इस दिन व्रत करने से श्रद्धालुओं को पोषण भगवान खुद करते हैं।

क्या भोग लगाए?

इस दिन बाल गोपाल को माखन मिश्री का भोग लगाया जाता है। मिठाई और पकवान में खास तौर पर घेवर, पेड़ा खीर, रबड़ी और पंचमेवा के लड्डू प्रभु को भोग में अप्रित किए जाते हैं।

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