Moral Policing in India: 'लड़की हो, लड़ सकती हो… हमारी बेटियां बेटों से कम नहीं हैं' जैसे नारों को दोहराने वाला समाज, आखिर उस वक्त अपनी सोच क्यों बदल लेता है जब कोई लड़की किसी लड़के के साथ नजर आती है? हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, खुद को आधुनिक और प्रगतिशील समाज कहते हैं, अपने आप को विश्व गुरु होने का भी खूब दंभ भरते हैं,लेकिन आज भी किसी लड़की का किसी लड़के के साथ सड़क पर दिखना, पार्क में बैठना या बाइक पर जाना कुछ लोगों के लिए इतना बड़ा सवाल बन जाता है कि लोग लड़की के साथ जोर-जबरदस्ती पर उतर आते हैं। क्या किसी अजनबी को किसी की निजी जिंदगी और चरित्र पर फैसला सुनाने का अधिकार है? जवाब है बिल्कुल नहीं।

लेकिन इसके बावजूद हाल के दिनों में ऐसी कई घटनाएं सामने आईं, जहां कुछ लोगों ने खुद को समाज का ठेकेदार समझकर साथ घूम रहे लड़के-लड़की को घेरा, उनके साथ अभद्रता की, मारपीट की और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। सवाल यही है कि आखिर भीड़ को कानून हाथ में लेने का हक किसने दिया? लड़किया चांद तक पहुंच गईं, लेकिन चांद निकले के बाद घर से बाहर नहीं निकल सकती हैं।

जमुई, ढेंकनाल और दिल्ली... तीन घटनाएं, एक जैसी सोच

बिहार के जमुई की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। एक नाबालिग लड़की बार-बार लोगों से जाने देने की गुहार लगाती रही, लेकिन उसके साथ बदसलूकी होती रही।इसके बाद ओडिशा के ढेंकनाल में मंदिर जा रहे एक युवक-युवती को रास्ते में रोककर कथित तौर पर मारपीट और छेड़छाड़ की गई।दिल्ली के कालकाजी इलाके में भी मंदिर दर्शन के बाद पार्क में बैठे किशोर-किशोरी के साथ अपराध की घटना सामने आई।तीनों मामलों की परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन एक सवाल समान है-क्या किसी लड़का-लड़की का साथ होना किसी को हिंसा या अपमान करने का अधिकार देता है?

लड़कियों पर नियम आखिर कब तक?

हमारे समाज में अक्सर बेटियों को सुरक्षा के नाम पर कई तरह की हिदायतें दी जाती हैं जल्दी घर लौटो, अकेले मत निकलो, सोच-समझकर कपड़े पहनो और लड़कों के साथ ज्यादा मत दिखो। लेकिन सवाल यह है कि क्या उतनी ही गंभीरता से बेटों को भी जिम्मेदारी सिखाई जाती है? उन्हें यह क्यों नहीं बताया जाता कि किसी लड़की को घूरना गलत है, उसकी 'ना' का सम्मान करना जरूरी है और किसी की निजी जिंदगी में दखल देना गलत है? आखिर समाज सिर्फ लड़कियों पर नियम लगाने के बजाय लड़कों को भी सम्मान और जिम्मेदारी की सीख कब देगा।

मॉरल पुलिसिंग आखिर है क्या?

मॉरल पुलिसिंग वह स्थिति है, जब कुछ लोग बिना किसी कानूनी अधिकार के दूसरों के पहनावे, दोस्ती, रिश्तों या निजी फैसलों पर फैसला सुनाने लगते हैं। असहमति जताना हर किसी का अधिकार है, लेकिन किसी को रोकना, डराना, मारना या अपमानित करना कानून के दायरे में अलग मामला है।अगर कोई वास्तविक अपराध हो रहा है, तो कार्रवाई पुलिस और कानून का काम है, न कि भीड़ का।

जान लीजिए आंकड़े

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले लगातार बड़ी संख्या में दर्ज होते रहे हैं। वहीं सार्वजनिक जगहों पर छेड़छाड़ और स्टॉकिंग जैसी घटनाएं भी गंभीर चिंता का विषय बनी हुई हैं। विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि ऐसे कई मामलों की शिकायत दर्ज ही नहीं हो पाती।

असली लड़ाई सोच की है

किसी लड़की का सड़क पर होना उसके चरित्र का प्रमाण नहीं है। किसी लड़के के साथ दिखना अपराध नहीं है। किसी पार्क में बैठना कानून तोड़ना नहीं है।समाज सुरक्षित तब नहीं बनेगा, जब बेटियों की आजादी सीमित कर दी जाएगी। समाज तब सुरक्षित होगा, जब हर व्यक्ति दूसरे की गरिमा, सहमति और कानून की सीमाओं का सम्मान करेगा।और एक बात उन लोगों के लिए भी, जो ऐसी घटनाओं का वीडियो बनाकर देखते रहते हैं किसी की बेबसी मनोरंजन नहीं होती। कई बार चुप्पी भी गलत को बढ़ावा देती है।