Gulal Nagari in UP: होली आते ही रंगों और गुलाल की रौनक हर तरफ दिखाई देने लगती है। लाल, गुलाबी, पीले और हरे रंगों से सराबोर इस त्योहार में गुलाल सिर्फ रंग नहीं, बल्कि खुशियों, प्रेम और भाईचारे का प्रतीक होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश का एक जिला ऐसा भी है, जिसे लोग प्यार से 'गुलाल नगरी' के नाम से जानते हैं? अगर नहीं, तो आइए जानते हैं उस जिले के बारे में, जहां बनने वाला अबीर-गुलाल देश के कई हिस्सों में अपनी खास पहचान रखता है।
क्या है गुलाल और क्यों है इतना खास?
गुलाल एक रंगीन और अक्सर सुगंधित पाउडर होता है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से होली के त्योहार पर किया जाता है। इसे कई जगह अबीर के नाम से भी जाना जाता है। गुलाल लाल, गुलाबी, पीले, हरे और कई अन्य रंगों में मिलता है। होली के दौरान लोग एक-दूसरे को रंग और गुलाल लगाकर खुशियां बांटते हैं। भारतीय संस्कृति में यह प्रेम, सौहार्द और उत्सव का प्रतीक माना जाता है।
आखिर क्यों कहा जाता है यूपी के इस जिले को गुलाल नगरी?
बता दें कि इस जिले में बड़े पैमाने पर अबीर और गुलाल का निर्माण किया जाता है। यहां के कई परिवार और कारोबारी लंबे समय से इस उद्योग से जुड़े हुए हैं। होली के सीजन में उत्पादन और मांग दोनों बढ़ जाती हैं और यहां से तैयार गुलाल विभिन्न राज्यों तक पहुंचता है। गुलाल उद्योग ने इस जिले को सिर्फ एक अलग सांस्कृतिक पहचान ही नहीं दी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और कारोबार के अवसर भी पैदा किए हैं। इसी खास पहचान के कारण इस जिले को 'गुलाल नगरी' कहा जाता है।
कैसे बनता है प्राकृतिक गुलाल?
पारंपरिक और हर्बल गुलाल बनाने के लिए अरारोट, स्टार्च या चावल के बारीक आटे जैसे आधार पदार्थों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके बाद प्राकृतिक स्रोतों से रंग तैयार किए जाते हैं। पीला रंग हल्दी या गेंदे के फूलों से, लाल और गुलाबी रंग चुकंदर जैसे प्राकृतिक स्रोतों से वहीं हरा रंग पालक और अन्य हरी पत्तियों से बनाया जाता है, प्राकृतिक और हर्बल गुलाल को त्वचा के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प के तौर पर देखा जाता है।
यूपी का कौन सा जिला है 'गुलाल नगरी'?
उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले को 'गुलाल नगरी' के नाम से जाना जाता है। हाथरस लंबे समय से अबीर और गुलाल के निर्माण के लिए प्रसिद्ध रहा है। यहां तैयार होने वाला गुलाल देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जाता है। दशकों से इस इलाके में गुलाल बनाने का काम होता आ रहा है और यही वजह है कि हाथरस की पहचान धीरे-धीरे गुलाल उद्योग से जुड़ गई। आज भी होली के रंगों की चर्चा होती है तो हाथरस का नाम खास तौर पर लिया जाता है।
देशभर में पहुंचती है हाथरस की रंगों वाली पहचान
हाथरस की 'गुलाल नगरी' वाली पहचान सिर्फ होली तक सीमित नहीं है। यह शहर अपने पारंपरिक उद्योग और रंगों के कारोबार के कारण भी जाना जाता है। दशकों से चली आ रही इस परंपरा ने हाथरस को उत्तर प्रदेश के उन जिलों में शामिल कर दिया है, जिनकी एक खास औद्योगिक और सांस्कृतिक पहचान है। यानी होली के रंगों की बात हो और हाथरस का नाम न आए, ऐसा मुश्किल है। रंगों की खुशबू और गुलाल की उड़ती फुहारों के साथ हाथरस आज भी अपनी 'गुलाल नगरी' वाली पहचान को जिंदा रखे हुए है।
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