नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने छात्र आंदोलनों से निपटने के लिए बल प्रयोग की आलोचना करते हुए कहा कि छात्रों की समस्याओं और मांगों को सहानुभूति के साथ सुना जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि “डंडे का इस्तेमाल किसी समस्या का समाधान नहीं है।
समस्या का समाधान संवाद और समझदारी से निकलेगा
21वें FICCI हायर एजुकेशन समिट के दौरान पत्रकारों से बातचीत करते हुए मनोहर जोशी ने कहा कि छात्रों की जायज मांगों को गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ सुना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि कोई समस्या है तो उसका समाधान संवाद और समझदारी से निकाला जाना चाहिए, न कि बल प्रयोग से।
जोशी ने छात्रों की तुलना परिवार के बच्चों से की
जोशी ने छात्रों की तुलना परिवार के बच्चों से करते हुए कहा कि जब कोई बच्चा अपनी शिकायत लेकर माता-पिता के पास जाता है तो उसे समझाया जाता है, उसकी बात सुनी जाती है। उसी तरह छात्रों के साथ भी व्यवहार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि छात्रों को दबाने या डराने से समस्याएं और बढ़ सकती हैं। इससे पहले भी उन्होंने परीक्षा प्रणाली से जुड़े आंदोलनों के दौरान छात्रों की चिंताओं को “वास्तविक” बताते हुए कहा था कि उन्हें कानून-व्यवस्था का मुद्दा मानकर बल प्रयोग से नहीं दबाया जाना चाहिए।
जोशी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर भी टिप्पणी की
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि नीति अभी शुरुआती चरण में है और इसका पूर्ण प्रभाव जानने के लिए और समय लगना चाहिए। इसलिए अभी इसकी सफलता या असफलता का अंतिम आकलन करना जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद, संवेदनशीलता और विश्वास के माध्यम से ही समस्याओं का समाधान संभव है तथा छात्रों की आवाज को सुनना सरकार और संस्थाओं की जिम्मेदारी है।
"लोगों की, लोगों के लिए और लोगों द्वारा बनाई गई सरकारें
मुरली मनोहर जोशी ने वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में गड़बड़ियों के आरोपों को लेकर CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की विपक्ष की मांग से जुड़े सवाल पर कहा कि, "लोगों की, लोगों के लिए और लोगों द्वारा बनाई गई सरकारें धरती से खत्म नहीं होंगी, बशर्ते चुनाव निष्पक्ष हों, सरकारें अकाउंटेबल हों और ब्यूरोक्रेसी ट्रांसपेरेंट हो।" उन्होंने कहा कि, "विपक्ष जवाबदेह और जिम्मेदार है। पूरी बात संविधान के दायरे में होनी चाहिए और अगर संविधान का उल्लंघन होता है तो सुप्रीम कोर्ट को इसकी जांच करनी चाहिए। यही वह सिद्धांत है जिस पर लोकतंत्र को काम करना चाहिए।"
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