नई दिल्ली: वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) एसवाई कुरैशी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और फैसलों में पारदर्शिता की मांग की है।
एसवाई कुरैशी ने कहा कि अगर चुनाव आयोग में किसी फैसले को बहुमत की मंजूरी के बिना लिया गया है, तो वह फैसला कानूनी रूप से सही नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग जैसी लोकतांत्रिक संस्था में फैसले तय प्रक्रिया के अनुसार होने चाहिए।
'1993 में बदला गया था चुनाव आयोग का ढांचा'
ANI से बातचीत में एसवाई कुरैशी ने कहा कि 1993 में चुनाव आयोग को बहु-सदस्यीय संस्था बनाया गया था। इससे पहले केवल एक मुख्य चुनाव आयुक्त होते थे, लेकिन बाद में व्यवस्था बदली गई ताकि फैसले सामूहिक रूप से लिए जाएं।
उन्होंने कहा कि तीन सदस्यीय आयोग में सभी सदस्यों के अधिकार समान हैं और किसी भी फैसले के लिए सर्वसम्मति या फिर बहुमत का पालन किया जाना जरूरी है।
SIR प्रक्रिया पर उठे सवालों का किया जिक्र
एसवाई कुरैशी ने इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें दावा किया गया था कि दो चुनाव आयुक्तों ने SIR प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर कई बार आपत्ति दर्ज कराई थी।
उन्होंने कहा कि अगर किसी फैसले में सभी सदस्यों को साथ नहीं लिया गया और बहुमत की प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो ऐसे फैसलों की समीक्षा की जानी चाहिए।
सार्वजनिक करने की मांग
पूर्व CEC ने चुनाव आयोग से पिछले डेढ़ साल में लिए गए सभी फैसलों की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की।
उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि कितने फैसले सर्वसम्मति से लिए गए, कितने बहुमत से और किन फैसलों में मतभेद रहे। उनके अनुसार, जनता को चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के बारे में जानने का अधिकार है।
चुनाव आयोग ने पहले दी थी सफाई
वहीं, चुनाव आयोग ने SIR से जुड़े विवाद पर कहा है कि उसके सभी आदेश संविधान के अनुच्छेद 324 और तय कानूनी प्रक्रिया के तहत जारी किए जाते हैं।
आयोग ने कहा कि किसी भी बहु-सदस्यीय संस्था में आंतरिक चर्चा और अलग-अलग राय आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। ECI ने यह भी कहा कि बड़े फैसले आयोग की सहमति से लिए गए हैं।
CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग उठा चुका विपक्ष
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दल पहले भी कार्रवाई की मांग कर चुके हैं। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने अप्रैल 2026 में दावा किया था कि विपक्ष के कई राज्यसभा सांसदों ने CEC को हटाने के लिए प्रस्ताव दिया था। हालांकि, लोकसभा और राज्यसभा स्तर पर यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका।
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