यवतमाल (महाराष्ट्र): राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को धर्म और विकास को लेकर अपने विचार रखे। महाराष्ट्र के यवतमाल में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ, रीति-रिवाज या खान-पान की आदतों तक सीमित नहीं है।

उन्होंने कहा कि धर्म सत्य (Satya), करुणा (Karuna), तपस्या (Tapascharya) और आंतरिक-बाहरी पवित्रता (Antarbahya Pavitrata) जैसे चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित है।

‘समाज का उत्थान सबसे कमजोर व्यक्ति से शुरू होना चाहिए’

मोहन भागवत ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन (Integral Humanism) का उल्लेख करते हुए कहा कि वास्तविक सामाजिक कल्याण की शुरुआत समाज के सबसे कमजोर वर्ग के उत्थान से होनी चाहिए।

उन्होंने अंत्योदय (Antyodaya) की अवधारणा पर जोर देते हुए कहा कि किसी देश की मजबूती इस बात से तय होती है कि समाज के अंतिम व्यक्ति की स्थिति कैसी है।

‘जीवन केवल अपने लिए नहीं, सभी के लिए है’

भागवत ने कहा कि व्यक्ति का जीवन केवल उसके अपने सुख के लिए नहीं होता, बल्कि समाज के कल्याण के लिए भी होता है। उन्होंने त्याग और सेवा को सामूहिक प्रगति का आधार बताया। उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ त्याग करता है, तो उसका लाभ समाज के बड़े हिस्से तक पहुंचता है।

विकास को लेकर रखी व्यापक सोच

RSS प्रमुख ने विकास की पारंपरिक अवधारणाओं पर चर्चा करते हुए कहा कि विकास केवल अधिकतम लोगों के लाभ तक सीमित नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वास्तविक विकास में इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षियों और प्रकृति का कल्याण भी शामिल होना चाहिए और प्रगति ऐसी होनी चाहिए जिससे पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर कार्यक्रम

यह कार्यक्रम पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया था। इस दौरान मोहन भागवत ने उनके विचारों और समाज सेवा के योगदान को याद किया।

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