“बिजनेस केवल कुछ घंटे दफ्तर या काम की जगह पर बिताने से नहीं बनता। इसके पीछे सोच, सपने, कल्पना और उन्हें हकीकत में बदलने की मेहनत होती है।” यह विचार लाला श्री राम के थे, उस दूरदर्शी उद्योगपति के, जिनकी पहल ने आगे चलकर देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में से एक की नींव रखी। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) के शताब्दी समारोह में छात्रों को संबोधित किया। इस मौके पर स्वाभाविक रूप से चर्चा उस शख्सियत की भी हुई, जिसने इस संस्थान की कल्पना को आकार दिया था। आज लाला श्री राम का नाम शिक्षा और उद्योग, दोनों क्षेत्रों में सम्मान के साथ लिया जाता है। हालांकि जिस मुकाम पर वे पहुंचे, वहां तक का रास्ता संघर्ष, असफलताओं और लंबे धैर्य से होकर गुजरा था।
शुरुआत में मिली असफलताएं
27 अप्रैल 1884 को राम नवमी के दिन जन्मे लाला श्री राम की शुरुआती शिक्षा दिल्ली के चांदनी चौक स्थित एक म्युनिसिपल स्कूल में हुई, उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की और कुछ समय हिंदू कॉलेज में भी पढ़ाई की, लेकिन पढ़ाई पूरी करने के बजाय उनका झुकाव धीरे-धीरे कारोबार की ओर बढ़ने लगा। व्यापार में उनका शुरुआती अनुभव बहुत उत्साहजनक नहीं रहा। स्टेशनरी की दुकान और कॉटन-गिनिंग फैक्ट्री से जुड़े प्रयास सफल नहीं हो सके। इसके बाद उन्होंने रावलपिंडी में एक कॉन्ट्रैक्टर के यहां मुनीम के तौर पर काम किया। उनकी जिंदगी में बड़ा मोड़ तब आया, जब करीब 25 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने परिवार की कंपनी दिल्ली क्लॉथ एंड जनरल मिल्स (DCM) का रुख किया। शुरुआत में उनके पिता उन्हें कंपनी में कोई खास जिम्मेदारी देने के पक्ष में नहीं थे, उन्हें न तो पद मिला और न ही वेतन, लेकिन यही जगह आगे चलकर उनके कारोबारी जीवन की सबसे बड़ी प्रयोगशाला साबित हुई।
बारीकियों को समझने की आदत बनी ताकत
लाला श्री राम की सफलता के पीछे कोई अचानक लिया गया बड़ा फैसला नहीं था, उनकी असली ताकत थी। कारोबार की हर छोटी बात को खुद समझना और लगातार जमीन पर मौजूद रहना, उनका दिन मिल के गेट से शुरू होता। वहां से वे अकाउंट्स विभाग का काम देखते और फिर फैक्ट्री के भीतर जाकर उत्पादन की प्रक्रिया पर नजर रखते। काम खत्म होने के बाद भी उनका कारोबारी निरीक्षण जारी रहता। रास्ते में वे कपड़ों की दुकानों पर रुकते और दुकानदारों या सेल्समैन से बाजार की मांग के बारे में जानकारी लेते, यानी वे कारोबार को केवल आंकड़ों और रिपोर्टों से नहीं समझते थे। वे उत्पाद, उत्पादन, बाजार और ग्राहक हर स्तर को करीब से जानने की कोशिश करते थे। इसी गहरी समझ ने उन्हें धीरे-धीरे अपने प्रतिस्पर्धियों से अलग कर दिया।
प्रथम विश्व युद्ध ने बदली कारोबारी तस्वीर
लाला श्री राम की रणनीतिक समझ का सबसे बड़ा उदाहरण प्रथम विश्व युद्ध के दौर में देखने को मिला। उस समय DCM के कुछ छोटे निवेशक कंपनी के भविष्य को लेकर निराश थे और अपने शेयर बेच रहे थे। श्री राम ने इस स्थिति को एक अवसर के रूप में देखा, उन्होंने धीरे-धीरे उन निवेशकों से शेयर खरीदना शुरू कर दिया, जबकि कंपनी के ब्रिटिश निदेशक इस गतिविधि को लेकर उतने सक्रिय नहीं थे। इसी दौरान उन्होंने अपने पिता को सेना के लिए टेंट तैयार करने का एक बड़ा कॉन्ट्रैक्ट लेने के लिए तैयार किया। इस कारोबार से हुई कमाई का इस्तेमाल उन्होंने DCM में और हिस्सेदारी खरीदने के लिए किया। युद्ध समाप्त होने तक हालात काफी बदल चुके थे। श्री राम के परिवार के पास कंपनी में सबसे बड़ी हिस्सेदारी आ गई थी। यह सिर्फ एक कारोबारी उपलब्धि नहीं थी, बल्कि उस रणनीतिक सोच का परिणाम था जिसमें उन्होंने मुश्किल परिस्थितियों के भीतर भी संभावनाएं तलाशना सीखा था।
भारतीय जरूरतों को समझकर कारोबार का विस्तार
1930 के दशक में लाला श्री राम ने अपने कारोबारी हितों का विस्तार कई नए क्षेत्रों में किया। चीनी, वनस्पति, इलेक्ट्रिक मोटर और कैपेसिटर जैसे उद्योगों में प्रवेश करते हुए उन्होंने ऐसे उत्पादों पर जोर दिया, जिनके लिए भारत को बड़े पैमाने पर विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था, उनकी सोच केवल पैसा कमाने तक सीमित नहीं थी। वे यह समझने की कोशिश करते थे कि भारत में किन चीजों की जरूरत है और किन उत्पादों का देश में निर्माण संभव बनाया जा सकता है। इसी सोच की एक मिसाल ऊषा सिलाई मशीन थी। विदेशी मशीनों की नकल भर करने के बजाय उनके इंजीनियरों को उन्हें खोलकर उनकी तकनीक समझने और फिर भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप दोबारा विकसित करने की दिशा में काम करना पड़ा। लक्ष्य था ऐसी मशीन तैयार करना, जो भारत की धूल, नमी और स्थानीय परिस्थितियों में भी भरोसेमंद तरीके से चल सके।
कर्मचारियों को माना कारोबार की असली ताकत
लाला श्री राम की सोच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उनके कर्मचारी भी थे, उन्होंने उस दौर में कर्मचारी कल्याण को लेकर ऐसे कदम उठाए, जो अपने समय से आगे माने जा सकते हैं। 1920 में उन्होंने अपने कर्मचारियों के लिए प्रोविडेंट फंड की व्यवस्था शुरू की। इसके बाद 1931 में मुनाफे में हिस्सेदारी से जुड़े बोनस की शुरुआत की गई। उनका मानना था कि किसी भी फैक्ट्री की मजबूती सिर्फ मशीनों, तकनीक या पूंजी पर निर्भर नहीं करती। उसे चलाने वाले लोग जितने सक्षम और भरोसेमंद होंगे, संस्थान भी उतना ही मजबूत बनेगा।
शिक्षा और रिसर्च के क्षेत्र में छोड़ी गहरी छाप
लाला श्री राम की विरासत सिर्फ उद्योग तक सीमित नहीं रही। शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में उनके योगदान ने भी आने वाली पीढ़ियों पर गहरा प्रभाव डाला। 1920 में कमर्शियल एजुकेशन ट्रस्ट की स्थापना के जरिए उन्होंने व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में कदम उठाया। इसी पहल से आगे चलकर वह संस्थान विकसित हुआ, जिसे आज श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स यानी SRCC के नाम से जाना जाता है। 1947 में उन्होंने श्रीराम इंस्टीट्यूट फॉर इंडस्ट्रियल रिसर्च की स्थापना की। इसे देश के शुरुआती स्वतंत्र और गैर-लाभकारी औद्योगिक अनुसंधान संस्थानों में गिना जाता है। इसका उद्देश्य उद्योगों को वैज्ञानिक और तकनीकी शोध से जोड़ना था। इसके अलावा 1956 में उन्होंने अपनी पत्नी फूलन देवी की स्मृति में लेडी श्री राम कॉलेज फॉर विमेन (LSR) की स्थापना की। यह संस्थान आगे चलकर महिला शिक्षा के क्षेत्र में देश के प्रतिष्ठित कॉलेजों में शामिल हुआ।
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उनकी सबसे बड़ी विरासत क्या थी?
जनवरी 1963 में लाला श्री राम का निधन हुआ। उनके पीछे एक बड़ा औद्योगिक कारोबार ही नहीं, बल्कि शिक्षा, कर्मचारी कल्याण और औद्योगिक अनुसंधान की ऐसी विरासत भी थी, जिसका प्रभाव दशकों बाद तक दिखाई देता रहा। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि सफलता हमेशा किसी एक बड़े फैसले का परिणाम नहीं होती। कई बार लगातार सीखने, असफलताओं से उबरने, बाजार को करीब से समझने और लंबे समय तक धैर्य के साथ काम करने से ही स्थायी सफलता की नींव तैयार होती है। लाला श्री राम की सोच का सार उनके एक विचार में दिखाई देता है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में वास्तविक और टिकाऊ सफलता तभी हासिल की जा सकती है, जब इंसान पूरी क्षमता से प्रयास करे और अपने काम को सेवा की भावना से करे। यही सोच उनके कारोबारी सफर से लेकर शिक्षा और उद्योग के लिए छोड़ी गई उनकी विरासत तक, हर जगह नजर आती है।