IIT Guwahati Research: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक्स की दुनिया में भारतीय वैज्ञानिकों ने एक अहम उपलब्धि हासिल की है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) गुवाहाटी और IIT खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी प्रकाश-संवेदनशील डिवाइस विकसित की है, जो इंसानी दिमाग की तरह दृश्य जानकारी को पहचानने, उसे याद रखने और प्रोसेस करने में सक्षम है। इसकी खासियत यह है कि यह बेहद कम ऊर्जा खर्च करके कई काम एक ही प्लेटफॉर्म पर कर सकती है। प्रयोगशाला परीक्षणों में इस डिवाइस ने चेहरे की पहचान में 90 प्रतिशत और ट्रैफिक दृश्यों के वर्गीकरण में 85 प्रतिशत सटीकता हासिल की है।

कैमरा, मेमोरी और प्रोसेसर का काम एक साथ करेगी डिवाइस
आमतौर पर किसी इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में तस्वीर खींचने, उसे स्टोर करने और उसका विश्लेषण करने के लिए अलग-अलग उपकरणों की जरूरत होती है। कैमरा तस्वीर कैप्चर करता है, मेमोरी उसे सुरक्षित रखती है और प्रोसेसर तस्वीर के अलग-अलग हिस्सों का विश्लेषण करके पहचान करता है। इस प्रक्रिया में उपकरणों के बीच बड़ी मात्रा में डेटा ट्रांसफर होता है, जिससे ऊर्जा की खपत बढ़ती है।

इसके विपरीत, इंसानी दिमाग किसी परिचित वस्तु को देखते ही पहचान सकता है। इसके लिए उसे हर बार पूरी तस्वीर का नए सिरे से विश्लेषण नहीं करना पड़ता, क्योंकि वह पहले से सीखी गई जानकारी का इस्तेमाल करता है। IIT गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने इसी प्राकृतिक प्रक्रिया से प्रेरणा लेकर एक ऐसी डिवाइस विकसित की है, जिसमें दृश्य जानकारी को महसूस करने, याद रखने और प्रोसेस करने की क्षमताओं को एक साथ लाने की कोशिश की गई है।

कैसे काम करती है इंसानी दिमाग जैसी यह तकनीक?
इस शोध का नेतृत्व IIT गुवाहाटी के भौतिकी विभाग के प्रोफेसर पी.के. गिरि ने किया। शोधकर्ताओं ने एक बेहद पतली कृत्रिम सिनैप्स डिवाइस विकसित की है, जो प्रकाश पड़ने पर प्रतिक्रिया देती है और प्रकाश बंद होने के बाद भी उस प्रतिक्रिया से जुड़ी जानकारी को कुछ समय तक बनाए रख सकती है।

इसे बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने दो विशेष पदार्थों का इस्तेमाल किया है।
MXene nanosheets: बिजली का संचालन करने वाला बेहद पतला द्वि-आयामी पदार्थ।
P3HT: एक ऑर्गेनिक सेमीकंडक्टर, जो प्रकाश के संपर्क में आने पर विद्युत आवेश उत्पन्न कर सकता है।

जब ये दोनों पदार्थ एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं, तो प्रकाश से उत्पन्न विद्युत आवेश उनके बीच अलग हो जाते हैं और लंबे समय तक अलग-अलग बने रह सकते हैं। इससे डिवाइस में मेमोरी जैसा प्रभाव पैदा होता है। यानी प्रकाश बंद होने के बाद भी डिवाइस की प्रतिक्रिया बनी रह सकती है। यही विशेषता इसे पारंपरिक इमेज प्रोसेसिंग सिस्टम से अलग बनाती है।

बार-बार संकेत मिलने पर और मजबूत होती है प्रतिक्रिया
इस डिवाइस की एक और खासियत यह है कि बार-बार प्रकाश संकेत मिलने पर इसकी प्रतिक्रिया मजबूत हो सकती है। शोधकर्ताओं के प्रयोगों में दूसरे प्रकाश संकेत पर प्रतिक्रिया पहले संकेत की तुलना में 180 प्रतिशत अधिक दर्ज की गई। यह प्रक्रिया इंसानी दिमाग में सीखने की क्षमता से मिलती-जुलती है, जहां न्यूरॉन्स के बीच बार-बार होने वाली सक्रियता उनके कनेक्शन को मजबूत कर सकती है।

प्रोफेसर पी.के. गिरि के मुताबिक, यह तकनीक एक ही प्लेटफॉर्म पर प्रकाश को महसूस करने, जानकारी को याद रखने और उसे प्रोसेस करने की क्षमता को जोड़ती है। इस तरह के सिस्टम को न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग कहा जाता है, जिसमें कंप्यूटर की कार्यप्रणाली को इंसानी दिमाग से प्रेरित होकर विकसित किया जाता है।

पारंपरिक डिवाइस से 500 गुना कम ऊर्जा खपत का दावा
शोधकर्ताओं के प्रयोगशाला परीक्षणों में विकसित डिवाइस ने पारंपरिक MXene-आधारित डिवाइस की तुलना में 500 गुना कम ऊर्जा खर्च की। यह अंतर भविष्य में उन तकनीकों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, जिनमें लगातार तस्वीरों और वीडियो का विश्लेषण करना पड़ता है। कम ऊर्जा खपत से स्मार्ट उपकरणों और रोबोटिक सिस्टम को अधिक कुशल बनाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। हालांकि, यह परिणाम प्रयोगशाला परीक्षणों पर आधारित है। वास्तविक परिस्थितियों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए इसकी क्षमता और प्रदर्शन का आगे परीक्षण जरूरी होगा।

चेहरे की पहचान में 90%, ट्रैफिक विश्लेषण में 85% सटीकता
चेहरे की पहचान: प्रयोगों में 90 प्रतिशत सटीकता दर्ज की गई।
ट्रैफिक सीन सेगमेंटेशन: सड़क और यातायात से जुड़े दृश्यों को अलग-अलग हिस्सों में पहचानने के परीक्षण में 85 प्रतिशत सटीकता मिली।

भविष्य में इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल स्मार्ट निगरानी प्रणालियों, रोबोटिक विजन, चेहरे की पहचान और स्मार्ट कंप्यूटिंग में किया जा सकता है। हालांकि, इन संभावित इस्तेमालों के लिए वास्तविक दुनिया में इसकी विश्वसनीयता और डेटा सुरक्षा का मूल्यांकन भी जरूरी होगा।

प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित हुआ शोध
इस शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल Carbon में प्रकाशित हुए हैं। इसमें IIT गुवाहाटी और IIT खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने योगदान दिया। इस उपलब्धि से न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग के क्षेत्र में कम ऊर्जा खपत वाले ऐसे सिस्टम विकसित करने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं, जो देखने, सीखने और जानकारी याद रखने की कुछ प्रक्रियाओं की नकल कर सकें। 

और पढ़ें: 

दिल्ली से करनाल का सफर होगा आसान! नमो भारत कॉरिडोर की तैयारी तेज, 136 KM के रूट पर दौड़ेगी रफ्तार; जानें कहां बनेंगे स्टेशन