धर्मशाला: तिब्बती संसद-निर्वासित (Tibetan Parliament-in-Exile) के 18वें कार्यकाल का दूसरा सत्र बुधवार को धर्मशाला में शुरू हुआ। सत्र की शुरुआत स्पीकर डोल्मा छेरिंग के उद्घाटन भाषण के साथ हुई। इसके बाद नेपाल बाढ़ समेत विभिन्न घटनाओं में जान गंवाने वाले लोगों के प्रति संवेदना प्रस्ताव पारित किए गए।
उद्घाटन संबोधन के बाद एकजुटता प्रस्ताव पेश किए गए
तिब्बती संसद-निर्वासित के सदस्य गोम्पो धोंदुप ने मीडियी से बातचीत में बताया कि दूसरे सत्र के पहले दिन स्पीकर के उद्घाटन संबोधन के बाद कई एकजुटता प्रस्ताव पेश किए गए। उन्होंने कहा कि स्पीकर ने अपने संबोधन में “जातीय एकता कानून” को लेकर संसद के रुख का उल्लेख किया।
स्पीकर डोल्मा छेरिंग ने बताया कि सितंबर सत्र में मुख्य रूप से 1 अप्रैल 2025 से 31 मार्च 2026 तक केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (CTA) के विभिन्न विभागों की वार्षिक कार्य रिपोर्ट पर चर्चा की जाएगी। उन्होंने कहा कि संसद की स्थायी समिति के सदस्यों ने रिपोर्ट की समीक्षा कर विभागों से संबंधित सवाल तैयार किए हैं, जिन पर संबंधित मंत्री जवाब देंगे।
सत्र के पहले दिन पांच शोक प्रस्ताव रखे गए
सत्र के पहले दिन पांच शोक प्रस्ताव भी रखे गए। इनमें रंगज़ेन लोबगा को श्रद्धांजलि शामिल थी, जिनके बारे में स्पीकर ने कहा कि उन्होंने न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र के सामने आत्मदाह किया था। इसके अलावा पूर्व स्वास्थ्य मंत्री छेरिंग ला, तिब्बत समर्थक अमेरिकी शिक्षाविद और नालंदा बौद्ध परंपरा के संरक्षण में योगदान देने वाले व्यक्ति, पूर्व अमेरिकी सांसद बार्नी फ्रैंक और नेपाल-तिब्बत सीमा पर हालिया बाढ़ में मारे गए लोगों को भी श्रद्धांजलि दी गई।
जातीय एकता और प्रगति कानून पर आपत्ति जताई
“जातीय एकता और प्रगति कानून” को लेकर तिब्बती संसद-निर्वासित ने कड़ी आपत्ति जताई। स्पीकर डोल्मा छेरिंग ने आरोप लगाया कि यह नीति गैर-हान समुदायों की पहचान, धर्म, संस्कृति और जीवन शैली को प्रभावित कर सकती है।
उन्होंने कहा कि संसद ने इस कानून की “कड़े शब्दों में निंदा” की है। उनके अनुसार, इसके तहत धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं पर भी असर पड़ सकता है।
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