विदेश
इबोला के नए ‘बुंडीबुग्यो’ स्ट्रेन ने बढ़ाई चिंता, WHO ने जारी की बड़ी चेतावनी
मध्य अफ्रीका, खासकर डीआर कांगो में इबोला का नया 'बुंडीबुग्यो' स्ट्रेन तेजी से फैल रहा है, जिसके लिए मौजूदा वैक्सीन प्रभावी नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, नई वैक्सीन आने में 6-9 महीने लग सकते हैं।
मध्य अफ्रीका, खासकर डीआर कांगो (Democratic Republic of the Congo) में एक बार फिर इबोला वायरस का खतरा तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। इस संक्रमण ने पहले भी हजारों लोगों की जान ली है और अब इसका नया स्ट्रेन वैज्ञानिकों तथा स्वास्थ्य एजेंसियों के लिए चिंता का कारण बन गया है। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इस बार सामने आया वायरस का नया रूप मौजूदा वैक्सीन से पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो पा रहा है। इसी वजह से World Health Organization (WHO) ने चेतावनी दी है कि नई वैक्सीन तैयार होने में अभी 6 से 9 महीने तक का समय लग सकता है।
1976 में हुई थी इबोला वायरस की पहली बार पहचान
इबोला वायरस की पहचान पहली बार 1976 में हुई थी। यह बीमारी मुख्य रूप से संक्रमित जानवरों, खासकर चमगादड़ों और बंदरों से इंसानों में फैलती है। बाद में यह संक्रमित व्यक्ति के खून, पसीने, लार या अन्य शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क से दूसरे लोगों तक पहुंचती है। साल 2014 में पश्चिम अफ्रीका में फैले इसके “जैरे स्ट्रेन” ने भारी तबाही मचाई थी और लगभग 11 हजार लोगों की मौत हुई थी। उस समय वैज्ञानिकों ने तेजी से काम करते हुए “एर्वेबो” नाम की वैक्सीन विकसित की थी, जिसने जैरे स्ट्रेन को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाई।
इस बार स्थिति है अलग
लेकिन इस बार स्थिति अलग है। वर्तमान संक्रमण “बुंडीबुग्यो स्ट्रेन” से जुड़ा हुआ है। यह इबोला वायरस का एक दुर्लभ प्रकार माना जाता है, जिसके मामले पहले केवल 2007 और 2012 में सामने आए थे। विशेषज्ञों की चिंता इसलिए बढ़ी हुई है क्योंकि अभी तक यह साबित नहीं हुआ है कि जैरे स्ट्रेन के लिए बनी पुरानी वैक्सीन इस नए स्ट्रेन पर असरदार होगी या नहीं।
वैक्सीन तैयार करने में देरी की ये है वजह
नई वैक्सीन तैयार करने में देरी की सबसे बड़ी वजह यही है कि वैज्ञानिकों को पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि वैक्सीन सुरक्षित होने के साथ-साथ इस नए वायरस पर प्रभावी भी हो। फिलहाल दो अलग-अलग वैक्सीन पर काम चल रहा है। पहली वैक्सीन पुरानी rVSV तकनीक पर आधारित है, लेकिन इसका इंसानों पर परीक्षण अभी शुरू नहीं हुआ है। दूसरी वैक्सीन Serum Institute of India और University of Oxford द्वारा मिलकर विकसित की जा रही है, जो कोविड-19 वैक्सीन जैसी तकनीक पर आधारित है। हालांकि इसका पशुओं पर परीक्षण भी अभी बाकी है। यही कारण है कि विशेषज्ञों का मानना है कि नई वैक्सीन आम लोगों तक पहुंचने में कई महीने लग सकते हैं।
कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी बनने की आशंका कम
हालांकि इबोला बेहद खतरनाक बीमारी है, लेकिन फिलहाल इसे कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी बनने की आशंका कम मानी जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इबोला हवा के जरिए नहीं फैलता। संक्रमण केवल संक्रमित व्यक्ति के सीधे संपर्क में आने से फैलता है। इसलिए सावधानी और जागरूकता के जरिए इसके प्रसार को काफी हद तक रोका जा सकता है।
WHO ने इसे पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी किया घोषित
फिलहाल World Health Organization ने इसे “पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी” घोषित किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक नई वैक्सीन तैयार नहीं हो जाती, तब तक सतर्कता, संक्रमित मरीजों को अलग रखना और स्वच्छता संबंधी नियमों का पालन ही सबसे बड़ा बचाव है।
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