उत्तर प्रदेश: सुप्रीम कोर्ट की तरफ से मुल्ला अफरोज को बड़ी राहत दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2024 संभल हिंसा मामले में पकड़े गए मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत को रद्द कर दिया है। पुलिस कस्टडी में लिए गए बयान के आधार पर की गई कार्रवाई को अवैध बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार पर 10 लाख का जुर्माना लगाया है। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA), 1980 के तहत अफरोज की हिरासत को रद्द करा है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के बाद मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

साल 2024 में संभल में भड़की हिंसा की आग ने कई लोगों की जान ले ली थी। इस हिंसा के बाद पुलिस ने कई नामजद लोगों को आरोपी बनाकर कोर्ट में पेश किया था। वहीं इस मामले में मुल्ला अफरोज ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपनी हिरासत को पुलिस व प्रशासन द्वारा गलत बताते हुए चुनौती दी थी। लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसकी याचिका को खारिज कर दिया।

इसके बाद मुल्ला अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जिसमें लगातार हो रही सुनवाई के बीच जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 8 सिंतबर को मामले में सुनवाई पूरी कर अपना फैसला सुरक्षित रखा था।

पुलिस हिरासत में दी गई स्टेटमेंट पर उठे सवाल

संभल हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कुछ सवाल किए गए। जिसमें पहला सवाल यह था कि उस दौरान पुलिस हिरासत में जिन लोगों की स्टेटमेंट ली गई थी उसके आधार पर नेशनल सिक्योरिटी एक्ट यानी NSA के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश दिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार से मामले में सुनवाई के दौरान इसी आधार पर सवाल किया था।

साल 2024 में संभल हिंसा के दौरान मुल्ला अफरोज को आरोपी बनाया गया था। यह हिंसा संभल की शाही जमा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई थी। इसमें 4 लोगों की मौके पर मौत हुई थी। इस मामले में हिरासत में चुनौती देकर स्टेटमेंट के मुद्दे को भी जोड़ा।

जानिए मामले से जुड़ी प्रमुख बातें

13 अक्तूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचा। जहां मुल्ला अफरोज ने बताया कि उसे NSA की धारा 3(2) के तहत हिरासत में लिया था। इसे लेकर मुल्ला अफरोज मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा। दरअसल हिंसा के बाद कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक शांति पर काफी ज्यादा असर देखा गया था। कोर्ट ने कहा कि मामले में मौजूद सबूतों को आधार बनाकर उन्हें भविष्य में इस तरह की गतिविधियों को रोकने के लिए प्रिवेंटिव डिटेंशन जरूरी था।

हाईकोर्ट ने जून 2026 में उनकी याचिका खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट में आदेश से जुड़े अधिकारी की सब्जेक्टिव सैटिस्फैक्शन और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर लिया गया था। लेकिन खुद को बचाने के लिए मुल्ला अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देखे रिकॉर्ड

8 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रखा था। कोर्ट ने मुल्ला अफरोज ने इस बात को प्रिवेंटिव डिटेंशन की वैधता पर तमाम सवाल किए थे। सुप्रीम कोर्ट में मुल्ला अफरोज की याचिका को स्पेशल लीव पिटीशन के तौर पर दाखिल किया गया था।

ऐसे में अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में रिकॉर्ड के मुताबिक यूपी सरकार और जिला मजिस्ट्रेट समेत अन्य अधिकारी को प्रतिवादी माना है। घटना के हिसाब से तकरीबन 54 दिन बाद पुलिस ने मुल्ला अफरोज को हिरासत में लिया और बयान को आधार में रखकर गिरफ्तारी की गई थी।


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