राज्य
सत्ता से नाराज़गी या नए चेहरे की तलाश? तमिलनाडु में विजय की एंट्री से बदला राजनीतिक खेल
जहां तक एमजी रामचंद्रन और विजय की तुलना का सवाल है, वह ज्यादा सार्थक नहीं लगती। एमजीआर राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे थे और संगठनात्मक अनुभव रखते थे। जबकि विजय ने बहुत कम समय में राजनीतिक पहचान बना ली।
तमिलनाडु के चुनावी नतीजे यह संकेत देते हैं कि राज्य की राजनीतिक दिशा दो प्रमुख भावनाओं से प्रभावित हुई है। पहली, लंबे समय से चली आ रही पारंपरिक नेतृत्व शैली से हटकर एक नए चेहरे की तलाश और दूसरी, मौजूदा सत्ताधारी ढांचे के प्रति बढ़ती असंतुष्टि, जिसे आलोचक अब सीमित, परिवार-केन्द्रित और कहीं-कहीं आत्मसंतुष्ट मानने लगे हैं।
करीब छह दशकों के बाद बदलाव
करीब छह दशकों में पहली बार राज्य में एक ऐसी नई राजनीतिक ताकत उभरती दिख रही है, जो न तो किसी पुराने दल का टूटकर बना हिस्सा है और न ही स्थापित द्रविड़ राजनीति का कोई नया संस्करण। यह उभार उस मौजूदा व्यवस्था को जड़ से बदलने की क्षमता रखता है। पिछली बार ऐसा बड़ा बदलाव तब देखा गया था जब एमजी रामचंद्रन ने द्रमुक से अलग होकर अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई थी। उन्होंने अपने फिल्मी प्रभाव को जनसमर्थन में बदल दिया था, लेकिन वह भी एक पहले से तैयार वैचारिक और सांस्कृतिक ढांचे के भीतर हुआ था।
विजय ने जनता के बीच अपनी पहचान बनाई
सीएन अन्नादुरई और एम करुणानिधि ने दशकों तक सिनेमा और थिएटर को राजनीतिक संदेश पहुंचाने का माध्यम बनाया। उसी नींव पर आगे की राजनीति खड़ी हुई। अब विजय का उभार इसी परंपरा से अलग नजर आता है। वे इस प्रणाली के भीतर विकसित नहीं हुए, बल्कि सीधे जनता के बीच अपनी पहचान के बल पर आए हैं। यही उनकी सबसे अलग विशेषता है।
तमिलगा वेत्री कड़गम ने लोगों से जुड़ा
यह बदलाव पारंपरिक सत्ता-विरोधी लहर जैसा नहीं है, बल्कि मतदाताओं की भावनात्मक निष्ठाओं में एक गहरे बदलाव का संकेत देता है। तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) ने इस भावना को प्रभावी ढंग से साधा है और इसका असर सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं, बल्कि शहरी इलाकों जैसे चेन्नई तक दिखाई देता है।
तमिलनाडु में फिल्मी सितारों का राजनीति में आना तय
तमिलनाडु में फिल्मी सितारों का राजनीति में आना नया नहीं है, लेकिन एक खास पैटर्न रहा है। पहले नेताओं ने सिनेमा का उपयोग विचारधारा गढ़ने के लिए किया, फिर उसी आधार पर राजनीतिक दल बने। जयललिता जैसी हस्तियों ने उसी ढांचे को आगे बढ़ाया। लेकिन विजय का रास्ता अलग है—उनकी राजनीति किसी वैचारिक प्रशिक्षण से नहीं, बल्कि उनके प्रशंसकों के साथ सीधे भावनात्मक जुड़ाव से बनती है। यह पारंपरिक संगठनात्मक राजनीति नहीं, बल्कि व्यक्तित्व-आधारित समर्थन है।
DMK परिवार आधारित नेतृत्व रहा है
दूसरी ओर, स्थापित दलों के प्रति थकान भी एक अहम कारण है। द्रमुक को लेकर आलोचनाएं अक्सर सत्ता के केंद्रीकरण और परिवार-आधारित नेतृत्व पर केंद्रित रही हैं। उदयनिधि स्टालिन के उभार ने भी बहस को जन्म दिया है। कुछ लोग उनकी तैयारी और अनुभव पर सवाल उठाते हैं, तो कुछ उनके बयानों को लेकर विवादों की ओर इशारा करते हैं। हालांकि, इनमें से कोई एक मुद्दा निर्णायक नहीं है, लेकिन इन सभी कारकों का संयुक्त प्रभाव ऐसा माहौल बना रहा है जिसमें मतदाता पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से बाहर विकल्प तलाशने लगे हैं।
रामचंद्रन और विजय में क्या अंतर
जहां तक एमजी रामचंद्रन और विजय की तुलना का सवाल है, वह ज्यादा सार्थक नहीं लगती। एमजीआर राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे थे और संगठनात्मक अनुभव रखते थे, जबकि विजय ने बहुत कम समय में राजनीतिक पहचान बना ली। यही अंतर इस नए दौर को और भी विशिष्ट बनाता है।
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