Science News : नेपाल में आए अचानक जलजले ने सबसे ज्यादा तबाही मचाई। 400 से ज्यादा लोगों की मौत, 1,400 से ज्यादा लोग लापता... लेकिन इस भयानक तबाही की असली वजह नदियों का पानी या पहाड़ का टूटना नहीं, बल्कि असली कारण ग्लेशियर था। विज्ञान के शोधकर्ताओं ने जानकारी निकाली है, उसमें यही पता लगा है कि ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर गिरा। जिससे तेज पानी के साथ बर्फ, पत्थर और मलबे ने सड़कें, पुल, घर और इमारतों को ताश के पत्तों की बनी इमारत की तरह ढहा दिया।
नदी में पहुंचा था ग्लेशियर और मलबा
शुरुआती जांच में जो तथ्य निकलकर आए वह बेहद चौंकाने वाले थे। ग्लेशियर से पहाड़ को नुकसान हुआ।चट्टान का बड़ा हिस्सा टूट गया। जिससे नेपाल के लांगटांग लिरुंग इलाके में बर्फ और पत्थरों के साथ मलबा नदी में बह गया। नदीका रास्ता कुछ पल थम गया। लेकिन पानी ज्यादा जमा होते ही अचानक बाहर निकला और बाढ़ आ गई।
ग्लेशियर ही नहीं, पहाड़ भी टूटा
वैज्ञानिकों की माने तो महज़ ग्लेशियर का हिस्सा ही नहीं पहाड़ टूट कर चट्टान भी खिसक गई थी। जिसकी वजह से 5,100 मीटर की ऊंचाई से मलवा नीचे 3,000 मीटर आया। सही मलवा नदी में गया और पानी का रास्ता रूका। जमा पानी का दबाव बढ़ा तो रुकावट टूटी और पानी, बर्फ, पत्थर और मिट्टी एक साथ नीचे आ गया।
100 कि.मी दूर दिखा असर
पहाड़ के आस-पास में बाढ़ और मलबे का असर 100 किलोमीटर दूर दिखा। कई जगह सड़कें, पुल टूटे, बस्तियों में पानी और मलबा भरा गया। कुछ लोगों को लगा की यह सब भूकंप की वजह से हुआ। पहाड़ से हुआ लैंडस्लाइड घटना का मुख्य कारण माना गया। फिलहाल वैज्ञानिक इसकी जांच कर रहे हैं।
क्या क्लाइमेट चेंज जिम्मेदार है?
वैज्ञानिक इस घटना को क्लाइमेट चेंज का असर मान रहे है। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ती गर्मी हिमालय के कारण ग्लेशियर और पहाड़ कमजोर पड़ रहे हैं। साल 2023 की संयुक्त राष्ट्र की पेश की गई रिपोर्ट के मुताबिक, बीते 30 साल में नेपाल के एक-तिहाई ग्लेशियर और बर्फीले पहाड़ पिघल चुके हैं। हिंदू कुश हिमालय में 65 प्रतिशत ग्लेशियर पिघल चुके हैं।
आगे भी खतरे की घंटी
वैज्ञानिकों का कहना है कि, अभी कई इलाकों में पानी भरा है। तो कहीं-कहीं ग्लेशियर के टुकड़े भी हैं। ऐसे में लैंडस्लाइड और अचानक बाढ़ आने के खतरे की घंटी कभी भी बज सकती है। इसके साथ ही हिमालय क्षेत्रों में बढ़ती गर्मी से भी ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं। ग्लेशियर पिघलने से पहाड़ भी कमजोर हो रहे हैं। होने से नीचे रहने वाले लोगों के लिए भी खतरा बढ़ सकता है।