देश में बढ़ते वायु प्रदूषण और पेट्रोल-डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों के बीच सरकार वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा दे रही है। इसी दिशा में एथेनॉल आधारित ईंधन का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। अब देश के कई हिस्सों में एथेनॉल मिश्रित ईंधन उपलब्ध है और ऑटोमोबाइल कंपनियां भी फ्लेक्स फ्यूल तकनीक वाले वाहन बाजार में उतार रही हैं। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि फ्लेक्स फ्यूल क्या है, यह कैसे काम करता है और क्या यह CNG से भी कम प्रदूषण फैलाता है।

कैसे काम करती है फ्लेक्स फ्यूल टेक्नोलॉजी?

फ्लेक्स फ्यूल का अर्थ है ऐसा ईंधन, जिसमें पेट्रोल और एथेनॉल को अलग-अलग अनुपात में मिलाकर इस्तेमाल किया जा सकता है। फ्लेक्स फ्यूल इंजन इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि वे E20, E85 या उससे अधिक एथेनॉल मिश्रण पर भी आसानी से चल सकें। इन वाहनों में एक विशेष एथेनॉल सेंसर लगाया जाता है, जो टैंक में मौजूद ईंधन में एथेनॉल की मात्रा का तुरंत पता लगा लेता है। इसके बाद वाहन का इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट (ECU) इंजन की फ्यूल सप्लाई और इग्निशन टाइमिंग को अपने आप समायोजित कर देता है। यही वजह है कि अलग-अलग मिश्रण होने के बावजूद इंजन की परफॉर्मेंस और ड्राइविंग अनुभव सामान्य बना रहता है।

क्या CNG से कम प्रदूषण फैलाता है फ्लेक्स फ्यूल?

पर्यावरण के लिहाज से फ्लेक्स फ्यूल को बेहतर विकल्प माना जाता है। CNG प्राकृतिक गैस है, जो जीवाश्म ईंधन की श्रेणी में आती है और इसके उपयोग से भी कार्बन उत्सर्जन होता है। दूसरी ओर, एथेनॉल गन्ने, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। इसलिए इसे नवीकरणीय (Renewable) ईंधन माना जाता है। यदि वाहन E85 या शुद्ध एथेनॉल पर चलता है, तो हानिकारक गैसों और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन पारंपरिक ईंधनों की तुलना में काफी कम हो सकता है। इससे वायु प्रदूषण कम करने में मदद मिलती है।

परफॉर्मेंस और माइलेज में कौन बेहतर?

यदि इंजन की ताकत और पिकअप की बात करें, तो फ्लेक्स फ्यूल वाहन सामान्य पेट्रोल कारों जैसी परफॉर्मेंस देने में सक्षम होते हैं। वहीं CNG किट लगी कई गाड़ियों में पिकअप और एक्सेलेरेशन थोड़ा कम महसूस हो सकता है। हालांकि माइलेज के मामले में CNG अभी भी आगे मानी जाती है। एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल की तुलना में कम होती है, इसलिए फ्लेक्स फ्यूल मोड में वाहन का माइलेज लगभग 15 से 20 प्रतिशत तक घट सकता है। इसके बावजूद यदि एथेनॉल की कीमत कम हो, तो ईंधन खर्च में होने वाली बचत इस कमी की काफी हद तक भरपाई कर सकती है।

 

 

 

Written By Toshi Shah