नई दिल्ली, - जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष हज़रत मौलाना महमूद असद मदनी ने कहा कि जो व्यक्ति स्वयं का आत्म-सुधार नहीं कर सकता, वह समाज का नेतृत्व करने का अधिकारी नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिन्द अब ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां पहचान केवल नाम के आधार पर नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और कार्यकुशलता के आधार पर बनेगी। उन्होंने कार्यकर्ताओं का आह्वान किया कि हर समस्या के समाधान के लिए केंद्रीय कार्यालय पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय स्तर पर मजबूत, प्रशिक्षित और सक्षम टीमें तैयार की जाएं, ताकि गांवों और मोहल्लों में ही समाज की समस्याओं का प्रभावी समाधान हो सके।
मौलाना मदनी नई दिल्ली स्थित जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के केंद्रीय कार्यालय के मदनी हॉल में दिल्ली एवं संयुक्त मेवात के आदर्श जिलों के पदाधिकारियों के लिए आयोजित दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। 26 और 27 जून को आयोजित इस कार्यशाला में दिल्ली और संयुक्त मेवात के प्रांतीय पदाधिकारियों, आदर्श जिलों के प्रतिनिधियों तथा बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। कार्यक्रम के आयोजन की जिम्मेदारी जमीयत उलेमा दिल्ली के अध्यक्ष मौलाना मुहम्मद कासिम नूरी कासमी ने निभाई, जबकि विभिन्न सत्रों की अध्यक्षता मौलाना मुहम्मद यहया करीमी, नाज़िम आला जमीयत उलेमा हरियाणा, पंजाब एवं हिमाचल प्रदेश सहित अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों ने की।
अपने संबोधन में मौलाना महमूद असद मदनी ने कहा कि एक मजबूत संगठन केवल संविधान या कार्यालयों से नहीं बनता, बल्कि चरित्र निर्माण, सामूहिकता, आत्ममंथन और प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं से खड़ा होता है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा, "एक और एक दो नहीं, बल्कि ग्यारह बनें।" उन्होंने नए लोगों को आगे लाने, उन्हें जिम्मेदारियां सौंपने और स्थानीय नेतृत्व को मजबूत करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आलोचना से घबराने के बजाय उसे आत्म-सुधार का माध्यम बनाना चाहिए, क्योंकि अपनी कमियों को स्वीकार करना ही प्रगति की पहली सीढ़ी है।
मौलाना मदनी ने पारिवारिक जीवन को भी एक सफल सामाजिक कार्यकर्ता की बुनियादी आवश्यकता बताया। उन्होंने कहा कि महिलाओं का सम्मान, पारस्परिक सद्भाव और गलती होने पर क्षमा मांगने का साहस व्यक्ति के व्यक्तित्व को और अधिक गरिमामय बनाता है। उन्होंने कार्यकर्ताओं को प्रतिदिन संक्षिप्त डायरी लिखने, अपने लक्ष्य निर्धारित करने तथा संगठनात्मक गतिविधियों का नियमित लेखा-जोखा रखने की सलाह दी। साथ ही प्रत्येक कार्य में अल्लाह से दुआ और मार्गदर्शन प्राप्त करने पर भी जोर दिया।
कार्यशाला का उद्घाटन जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के महासचिव मौलाना हकीमुद्दीन कासमी ने किया। उन्होंने कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिन्द की सबसे बड़ी शक्ति उसके प्रशिक्षित, निष्ठावान और चरित्रवान कार्यकर्ता हैं। इसलिए संगठनात्मक प्रशिक्षण को मजबूत बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने प्रतिभागियों से प्रशिक्षण में प्राप्त अनुभवों को अपने-अपने जिलों तक पहुंचाकर संगठन के शैक्षिक, सामाजिक, कल्याणकारी और सुधारात्मक कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी बनाने का आह्वान किया।
दारुल उलूम देवबंद के शिक्षक मुफ़्ती इमरानुल्लाह ने जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के इतिहास, उसकी सेवाओं तथा संगठन से जुड़ने के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। इसके बाद मौलाना मुहम्मद उमर कासमी ने "आदर्श मस्जिद" विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि मस्जिदों को केवल इबादत का केंद्र न मानकर धार्मिक, शैक्षिक और सामाजिक गतिविधियों का भी केंद्र बनाया जाना चाहिए। उन्होंने आदर्श मस्जिद की मूलभूत, मानक और वैकल्पिक आवश्यकताओं की भी जानकारी दी।
दो दिवसीय कार्यशाला के दौरान जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के विभिन्न विभागों एवं योजनाओं पर विस्तृत प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए गए। इनमें मॉडल विलेज, सद्भावना मंच, दीनी तालीमी बोर्ड, समाज सुधार, प्री-मैरिज एवं निकाह काउंसिलिंग, विभाग-ए-खैर, दर्स-ए-कुरआन, विभाग-ए-जेम, संगठन परिचय, सुन्नत के अनुसार निकाह, आदर्श मस्जिद तथा विभाग-ए-रफीक़ सहित अनेक विषयों पर विशेषज्ञों ने प्रशिक्षण दिया। प्रत्येक सत्र के बाद प्रतिभागियों के प्रश्नों के उत्तर दिए गए और व्यवहारिक मार्गदर्शन भी प्रदान किया गया।
कार्यशाला के विभिन्न सत्रों की अध्यक्षता मौलाना मुहम्मद यहया करीमी, मास्टर मुहम्मद कासिम, कारी अब्दुल गफ्फार तथा मौलाना मुहम्मद अखलाक कासमी ने की। कुरआन की तिलावत मौलाना किफायतुल्लाह नदवी, मुफ़्ती साक़िब और कारी मुहम्मद मुश्ताक लडमाकी ने की, जबकि नातिया कलाम कारी मुहम्मद असलम बडीडवी, कारी मुहम्मद मुश्ताक लडमाकी और मुफ़्ती शफीक़ ने प्रस्तुत किया
Written by-एम अतहर उद्दीन मुन्ने भारती