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बचपन का ट्रॉमा... क्यों सालों बाद भी शरीर और दिमाग पर दिखता है इसका असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय से शारीरिक या मानसिक समस्याएं हैं और उनका स्पष्ट कारण नहीं मिल रहा है।
बचपन में मिले दर्दनाक अनुभव केवल यादों का हिस्सा बनकर खत्म नहीं हो जाते। कई मामलों में उनका प्रभाव व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर वर्षों तक बना रहता है। यही कारण है कि कुछ लोग लंबे समय तक विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते रहते हैं, लेकिन उनकी असली वजह बचपन के कठिन अनुभव हो सकते हैं।
पुराना ट्रॉमा और स्वास्थ्य का संबंध
आज की मेडिकल रिसर्च यह संकेत देती है कि बचपन में हिंसा, उपेक्षा, लगातार डर या भावनात्मक असुरक्षा का सामना करने वाले बच्चों में आगे चलकर कई तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल मानसिक असर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शरीर के नर्वस सिस्टम, हार्मोनल संतुलन और प्रतिरक्षा प्रणाली को भी प्रभावित कर सकता है।
लंबे समय तक बनी रह सकती हैं स्वास्थ्य समस्याएं
कुछ लोग वर्षों तक माइग्रेन, पाचन संबंधी दिक्कतें, अनिद्रा, लगातार थकान, शरीर में दर्द या एंग्जायटी जैसी समस्याओं का इलाज कराते रहते हैं। कई बार सभी मेडिकल जांच सामान्य आती हैं, लेकिन उनकी जीवन यात्रा यह बताती है कि समस्या की जड़ बचपन के तनावपूर्ण अनुभव हो सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे कई मरीज सामने आते हैं जिनकी रिपोर्ट सामान्य होती है, फिर भी वे लगातार शारीरिक और मानसिक परेशानियों से गुजरते हैं। उदाहरण के तौर पर, एक 40 वर्षीय महिला लंबे समय से पीठ दर्द, पेट संबंधी समस्याओं और एंग्जायटी से परेशान थी। कई जांचों के बाद भी कोई स्पष्ट कारण नहीं मिला, लेकिन बाद में पता चला कि उसने बचपन में घरेलू हिंसा और भावनात्मक उपेक्षा का सामना किया था।
शरीर पर कैसे पड़ता है प्रभाव?
यदि कोई बच्चा लंबे समय तक भय या असुरक्षित माहौल में रहता है, तो उसका शरीर लगातार तनाव की स्थिति में बना रह सकता है। इस दौरान तनाव से जुड़े हार्मोन सामान्य से अधिक समय तक सक्रिय रहते हैं। लंबे समय तक ऐसा बने रहने से शरीर के कई अंग और प्रणालियां प्रभावित हो सकती हैं। यही वजह है कि भविष्य में कुछ लोगों में हाई ब्लड प्रेशर, डिप्रेशन, मोटापा, नींद संबंधी परेशानियां और ऑटोइम्यून बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है।
क्या कहती है रिसर्च?
इस विषय पर सबसे चर्चित अध्ययनों में अमेरिका की एसीई (Adverse Childhood Experiences) स्टडी शामिल है। इस शोध में 17,000 से अधिक लोगों के अनुभवों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों ने बचपन में हिंसा, उपेक्षा, पारिवारिक तनाव या नशे से जुड़े माहौल का सामना किया था, उनमें वयस्क होने पर गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की संभावना अधिक थी। इसके अलावा, जेएएमए पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में बचपन के ट्रॉमा और ऑटोइम्यून बीमारियों के बीच संबंध के संकेत मिले। इन शोधों के बाद चिकित्सा विशेषज्ञों का नजरिया भी बदला है। अब बचपन के ट्रॉमा को केवल मानसिक अनुभव नहीं, बल्कि शरीर में लंबे समय तक जैविक बदलाव पैदा करने वाला कारक भी माना जा रहा है।
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