कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने अयोध्या मंदिर में चढ़ावे की चोरी के आरोप पत्र में लीपापोती का आरोप लगाया, विश्व हिंदू परिषद ने कहा कि जांच पूरी हो चुकी है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश और विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में दायर चार्जशीट पर अलग-अलग बयान दिए हैं।
जयराम रमेश ने इस मामले में गंभीर सवाल उठाते हुए जांच को दबाने का आरोप लगाया है, जबकि आलोक कुमार ने जांच को पूरा और स्पष्ट बताया है।
जानिए दोनों पक्षों का रुख
जयराम रमेश ने दावा करा है, मामले में बड़े स्तर पर अनियमितताएं हो सकती हैं। उन्होंने मामले की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा वर्तमान जांच रिपोर्ट के जरिए असली मुद्दों और संभावित बड़ी गड़बड़ियों को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।
इसके साथ ही जयराम रमेश ने दावा किया है। कांग्रेस नेता ने मंदिर ट्रस्ट के कामकाज और चढ़ावे के प्रबंधन में पूर्ण पारदर्शिता बरतने पर जोर दिया है।
क्या बोले आलोक
राम मंदिर चंदा चोरी मामले में विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने पुलिस और संबंधित एजेंसियों की जांच पूरी होने का दावा किया है। उनका कहना है कि, जांच में केवल चढ़ावा चोरी की बात सामने आई है। इसके अलावा किसी तरह की गड़बड़ी या घोटाला नहीं देखा गया। आलोक ने राजनीतिक पार्टियों के आरोपों को खारिज कर रहा कि मामले को बेवजह तूल दिया जा रहा है।
जयराम रमेश ने ट्वीट में क्या लिखा?
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने अपने सोशल मीडिया अकॉउंट एक्स पर राम मंदिर चंदा चोरी मामले की जांच को फिर से घेरे में ला दिया। उन्होंने ट्वीट में लिखा- हमने पहले दिन ही कहा था कि भगवान श्रीराम के अयोध्या मंदिर में चढ़ावा चोरी की जांच के लिए बनाई SIT पर देश की जनता को विश्वास नहीं है। चार्जशीट में सामने आए तथ्यों ने जांच पर और सरकारी लीपापोती को लेकर सवाल खड़े कर दिए।
चार्जशीट में 4 जून को ₹2.25 लाख की रकम बाथरूम में मिलने का वीडियो चंपत राय को भेजा गया। 5 जून को उन्हें CCTV फुटेज भी दिखाया। इसके बाद FIR 25 जून को हुई। जब CCTV, बरामदगी और संदिग्ध कर्मचारियों की पहचान हो चुकी थी, तो आपराधिक कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हुई?
इन 21 दिनों में आखिर किसे बचाने और क्या छिपाने का मौका मिला? चार्जशीट के अनुसार CCTV में चढ़ावे की रकम हटाने की 105 घटनाएं सामने आई हैं। एक आरोपी 85 बार रकम हटाते दिखा और अन्य आरोपियों की भी बार-बार भूमिका सामने आई।
एसआईटी को पता था कि सब कुछ पता चलने के तीन दिन बाद भी चंपत राय ने चढ़ावा चोरी होने से इंकार किया। फिर भी चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव को आरोपी क्यों नहीं बनाया गया, वे गवाह क्यों हैं? वे जनता का भरोसा खोने के बावजूद ट्रस्ट में क्यों बने हुए हैं?
क्या जिन लोगों पर व्यवस्था की निगरानी और प्रबंधन की जिम्मेदारी थी, उनकी भूमिका की जांच किए बिना चढ़ावा चोरी की पूरी सच्चाई सामने आ सकती है?
70 से 105 घटनाएं सामने आईं, हजारों डिजिटल संदेशों की जांच हुई, बैंक खातों और संपत्तियों की पड़ताल की बात की गई। फिर भी जांच की पहुंच आठ आरोपियों तक ही क्यों सीमित रही?
क्या SIT ने पूरे सिस्टम की जवाबदेही तय की या सिर्फ छोटे किरदारों तक मामला सीमित कर दिया? और सबसे बड़ा सवाल: क्या इस पूरे मामले के तार भाजपा-आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचते हैं?
भगवान श्री राम के नाम पर आए चढ़ावे की चोरी में असली जिम्मेदारी तय होने तक यह मामला खत्म नहीं माना जा सकता। यह रामभक्तों के विश्वास से जुड़ा गंभीर मामला है।
इसकी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होनी चाहिए। प्रधानमंत्री जी चुप्पी तोड़ो, नहीं तो इसका मतलब है कि चोरों को आपका संरक्षण प्राप्त है।