नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अदालत की कार्यवाही में हिंदी को आधिकारिक भाषा के तौर पर इस्तेमाल करने की मांग वाली याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक कार्यवाही की भाषा में बदलाव अदालती आदेश के जरिए नहीं, बल्कि संस्थागत सुधारों के तहत धीरे-धीरे किया जा सकता है।

यह मामला चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने आया। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। याचिका में केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट में हिंदी के इस्तेमाल को लेकर सिफारिशें देने के लिए एक आयोग गठित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

CJI ने बताया, हिंदी में पहले से हो रहा काम
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भाषा से जुड़े मामलों में पहले से ही क्रमिक तरीके से कदम उठा रहा है। उन्होंने बताया कि कोर्ट अपने फैसलों और रिपोर्टों का संक्षिप्त विवरण हिंदी में उपलब्ध करा रहा है और आगे अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को भी इसमें शामिल करने की योजना है। CJI ने कहा कि हिंदी के साथ-साथ देश की अन्य क्षेत्रीय भाषाओं और उनकी संस्कृति का भी सम्मान किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायिक व्यवस्था में इस तरह के बदलाव धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से संस्थागत सुधारों के जरिए किए जाते हैं।

कोर्ट के आदेश से नहीं हो सकते ऐसे बदलाव
याचिकाकर्ता की ओर से जब कम से कम आयोग के गठन का निर्देश देने का आग्रह किया गया, तो पीठ ने इस पर भी सहमति नहीं जताई। जस्टिस वी. मोहना ने टिप्पणी करते हुए पूछा कि यदि मांग का प्रभाव संविधान में बदलाव से जुड़ा है तो अदालत ऐसा आदेश कैसे दे सकती है। वकील ने स्पष्ट किया कि तत्काल मांग केवल आयोग गठित करने तक सीमित है, लेकिन पीठ ने राहत देने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी।

क्या कहता है संविधान का अनुच्छेद 348?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 348(1)(a) सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की कार्यवाही में अंग्रेजी के इस्तेमाल से संबंधित प्रावधान करता है। अन्य भाषाओं के इस्तेमाल को लेकर भी संविधान में एक निर्धारित व्यवस्था है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यह स्पष्ट किया कि न्यायिक कार्यवाही की भाषा में व्यापक बदलाव अदालती निर्देश के बजाय संवैधानिक और संस्थागत प्रक्रिया के तहत किया जाना होगा।