Om Prakash Rawat, Election: पूर्व चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत ने चुनाव आयोग के भीतर SIR यानी Special Intensive Revision से जुड़े फैसलों को लेकर मतभेद की रिपोर्ट पर चिंता जताई है। उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों को आपस में बैठकर इस मामले को जल्द सुलझाना चाहिए।

रावत का बयान ऐसे समय आया है जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के मुताबिक, ये आपत्तियां मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने, SIR से जुड़ी प्रक्रिया और चुनावी डेटा तक पहुंच जैसे मुद्दों से संबंधित थीं।

‘तीनों आयुक्त साथ बैठकर बात करें’

रावत ने कहा कि चुनाव आयोग की पहचान स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव कराने वाली संस्था के तौर पर रही है। इसलिए अगर आयोग के अंदर किसी तरह के मतभेद सामने आए हैं तो उन्हें बातचीत के जरिए दूर किया जाना चाहिए।उन्होंने सुझाव दिया कि तीनों चुनाव आयुक्त साथ बैठकर पूरे मामले पर स्थिति स्पष्ट करें। रावत के मुताबिक, अगर जरूरी हो तो आयोग को सार्वजनिक तौर पर भी तथ्यों को सामने रखना चाहिए, ताकि संस्था को लेकर पैदा हुए सवालों का जवाब मिल सके।

SIR की प्रक्रिया पर भी उठाए सवाल

पूर्व चुनाव आयुक्त ने SIR की प्रक्रिया को लेकर सामने आए सवालों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि शुरुआत से ही प्रक्रिया को लेकर कुछ दिक्कतें सामने आई थीं और इनका मामला अदालतों तक भी पहुंचा।रावत ने कहा कि चुनाव आयोग ने समय के साथ प्रक्रिया में सुधार किए हैं। उनके मुताबिक, अगर प्रक्रिया में किसी तरह की समस्या सामने आती है तो आयोग को उस पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए।

चुनाव आयोग ने मतभेद की रिपोर्ट को लेकर क्या कहा?

वहीं, चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने हिंदुस्तान टाइम्स से कहा कि SIR समेत आयोग के सभी फैसलों को तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी मिली है। आयोग की ओर से यह भी कहा गया कि चुनाव आयुक्तों की ओर से उठाए गए सवाल या सुझाव निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं।द टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, आयोग ने कहा कि ऑपरेशनल सवाल और सुझाव प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए उठाए गए थे और अंतिम फैसले से पहले ऐसी राय देना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

रिपोर्ट में 14 आपत्तियों का दावा

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। इनमें Form 6 में बदलाव, चुनावी डेटा के प्रबंधन और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े मामलों समेत कई मुद्दे शामिल बताए गए हैं।रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने कुछ मामलों में इस बात पर भी सवाल उठाए कि मतदाता सूची से जुड़े सिस्टम और डेटा तक किस स्तर पर पहुंच होनी चाहिए।

‘राजनीतिक दलों का विरोध अलग, आयोग की प्रक्रिया अलग’

रावत ने कहा कि राजनीतिक दलों का किसी फैसले पर सवाल उठाना या विरोध करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन चुनाव आयोग की अपनी प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ रहनी चाहिए।उन्होंने जोर दिया कि चुनावी प्रक्रिया में किसी के साथ अन्याय न हो और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों में पर्याप्त पारदर्शिता बनी रहे।