नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों पर चुनावी टिकट बेचने के आरोपों से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्वाचन आयोग के पास अपनी शिकायत रखने की सलाह दी है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला उत्तर प्रदेश के कुछ गैर-मान्यता प्राप्त और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों पर चुनावी टिकट के बदले पैसे लेने के आरोपों से जुड़ा है। याचिकाकर्ता संगठन स्वराज वाहिनी एसोसिएशन ने सोशल मीडिया पर सामने आए कुछ स्टिंग ऑपरेशन का हवाला देते हुए मामले की जांच कराने की मांग की थी।
संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर इस पूरे मामले की CBI या किसी अन्य जांच एजेंसी से जांच कराने की अपील की थी। याचिका में निर्वाचन आयोग, केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश के कुछ राजनीतिक दलों को भी पक्षकार बनाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्वाचन आयोग के सामने अपनी लंबित शिकायत और रिमाइंडर को आगे बढ़ाने की छूट दी।
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि उसे इस बात पर संदेह करने का कोई कारण नहीं दिखता कि निर्वाचन आयोग शिकायतों के समाधान के लिए प्रयास नहीं करेगा। यानी अदालत ने सीधे CBI जांच का आदेश देने के बजाय मामले को निर्वाचन आयोग के समक्ष उठाने का रास्ता सुझाया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट भी खारिज कर चुका है याचिका
इससे पहले 7 सितंबर 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी इसी मामले में जनहित याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि जनहित के नाम पर सोशल मीडिया पर सामने आने वाले हर स्टिंग ऑपरेशन या रिपोर्ट की जांच का आदेश अदालत से नहीं मांगा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा रुख के बाद अब याचिकाकर्ता निर्वाचन आयोग के समक्ष अपनी शिकायत को आगे बढ़ा सकता है। हालांकि, चुनावी टिकट बेचने के आरोपों को लेकर इस मामले में किसी तरह की गड़बड़ी साबित होने का निष्कर्ष अदालत ने नहीं दिया है।
यह भी पढ़ें: JNU मामले में कांग्रेस सांसद बिमोल अकोइजाम पर कार्रवाई की मांग, NCW प्रमुख से मिलेगा BJP महिला मोर्चा