नई दिल्ली: दिल्ली-NCR में मौसम बदलने के साथ एक बार फिर हवा की गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ने लगती है। सितंबर का महीना खत्म होने वाला है और आने वाले दिनों में तापमान में बदलाव के साथ हवा में प्रदूषक कणों के जमा होने की स्थिति भी बदल सकती है। ऐसे में AQI यानी Air Quality Index पर नजर रखना जरूरी हो जाता है। लेकिन आखिर AQI खराब होने का मतलब क्या है? हवा में मौजूद कौन-से प्रदूषक शरीर के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदायक हैं और खराब हवा का असर सिर्फ सांस लेने तक सीमित रहता है या शरीर के दूसरे अंग भी इसकी चपेट में आते हैं?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, वायु प्रदूषण से सांस की बीमारियों के अलावा हृदय रोग, स्ट्रोक और फेफड़ों के कैंसर समेत कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। खासतौर पर बहुत छोटे कण स्वास्थ्य के लिए चिंता का बड़ा कारण हैं। 

AQI क्या है

AQI यानी Air Quality Index एक ऐसा पैमाना है जिससे किसी जगह की हवा की गुणवत्ता को एक संख्या और श्रेणी के जरिए समझाया जाता है। इसमें हवा में मौजूद अलग-अलग प्रदूषकों के स्तर को ध्यान में रखा जाता है। आसान भाषा में कहें तो AQI जितना खराब होता जाता है, हवा में मौजूद प्रदूषकों के कारण स्वास्थ्य पर जोखिम उतना बढ़ सकता है। लेकिन सिर्फ AQI की संख्या देखना ही काफी नहीं है। यह भी महत्वपूर्ण है कि हवा में कौन-सा प्रदूषक ज्यादा है। 

इतने खतरनाक क्यों है?

बेहद छोटे particulate matter यानी कण होते हैं। इनका आकार इतना छोटा होता है कि ये सांस के साथ फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं। WHO के अनुसार PM2.5 फेफड़ों की गहराई तक जाकर रक्तप्रवाह में प्रवेश कर सकता है। इसी वजह से इसका प्रभाव सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं रहता और हृदय तथा शरीर के दूसरे हिस्सों पर भी असर पड़ सकता है। 

यही वजह है कि प्रदूषण बढ़ने पर सिर्फ खांसी या सांस लेने में परेशानी की बात नहीं होती। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने का असर शरीर पर व्यापक हो सकता है।

AQI खराब होते ही सबसे पहले शरीर में क्या होता है?

खराब हवा के संपर्क में आने पर सबसे पहले असर अक्सर श्वसन तंत्र पर दिखाई देता है। प्रदूषित हवा सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करती है। इससे नाक और गले में जलन, खांसी, गले में खराश और सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

जिन लोगों को पहले से अस्थमा या दूसरी सांस संबंधी समस्या है, उनमें लक्षण और ज्यादा बढ़ सकते हैं। WHO के मुताबिक उच्च स्तर के particulate matter के अल्पकालिक संपर्क से फेफड़ों की कार्यक्षमता कम हो सकती है, respiratory infections का खतरा बढ़ सकता है और asthma aggravated हो सकता है। 

आंखों में जलन और पानी क्यों आने लगता है?

प्रदूषित हवा का असर सिर्फ फेफड़ों पर नहीं होता। हवा में मौजूद प्रदूषक आंखों की सतह को भी irritate कर सकते हैं। इसी वजह से प्रदूषण बढ़ने पर कई लोगों को आंखों में जलन, लालिमा, पानी आना या आंखों में कुछ चुभने जैसा महसूस हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक प्रदूषित वातावरण में रहता है तो बार-बार होने वाली irritation परेशानी बढ़ा सकती है।

गले और नाक पर भी पड़ता है असर

खराब हवा में मौजूद धूल और दूसरे प्रदूषक कण सांस लेते समय नाक और गले से होकर गुजरते हैं। इससे गले में खराश, सूखापन, खांसी और नाक में irritation महसूस हो सकती है। कुछ लोगों को बार-बार छींक या सांस लेने में असहजता भी महसूस हो सकती है।

यानी प्रदूषण का असर शरीर में प्रवेश करते ही शुरू हो सकता है, हालांकि हर व्यक्ति में लक्षणों की तीव्रता अलग-अलग हो सकती है।

फेफड़ों पर क्या असर पड़ता है?

फेफड़े प्रदूषण के सीधे संपर्क में आने वाले सबसे महत्वपूर्ण अंगों में हैं। जैसे बड़े कण श्वसन तंत्र में जमा हो सकते हैं, जबकि PM2.5 जैसे छोटे कण फेफड़ों के ज्यादा अंदर तक पहुंच सकते हैं। WHO के अनुसार particulate matter फेफड़ों में सूजन और irritation पैदा कर सकता है तथा लंबे समय तक exposure से respiratory और cardiovascular diseases का जोखिम बढ़ सकता है।  इसका असर खास तौर पर बच्चों, बुजुर्गों और पहले से respiratory disease वाले लोगों में ज्यादा गंभीर हो सकता है। 

क्या प्रदूषण दिल को भी नुकसान पहुंचाता है?

हां। यही वजह है कि air pollution को सिर्फ फेफड़ों की समस्या मानना सही नहीं है। बहुत छोटे प्रदूषक कण फेफड़ों के जरिए रक्तप्रवाह तक पहुंच सकते हैं। WHO के अनुसार particulate matter का exposure cardiovascular diseases और stroke के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा है। 

लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से हृदय और रक्त वाहिकाओं पर असर पड़ सकता है। जिन लोगों को पहले से cardiovascular disease है, उनके लिए खराब हवा ज्यादा चिंता का विषय हो सकती है।

क्या दिमाग पर भी असर पड़ सकता है?

शोध में वायु प्रदूषण और neurological तथा cerebrovascular health के बीच संबंधों पर भी लगातार अध्ययन हुआ है। WHO के अनुसार air pollution के प्रभावों में cerebrovascular और neurological outcomes से जुड़े evidence भी मौजूद हैं।

इसका मतलब यह नहीं कि प्रदूषित हवा में सांस लेने से हर व्यक्ति को तुरंत neurological बीमारी हो जाएगी। लेकिन लंबे समय तक exposure को लेकर स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं सिर्फ respiratory system तक सीमित नहीं हैं।

बच्चों और बुजुर्गों के लिए ज्यादा चिंता क्यों?

बच्चों के फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते हैं और वे अपने शरीर के आकार के हिसाब से ज्यादा हवा सांस के जरिए अंदर ले सकते हैं। वहीं बुजुर्गों में उम्र और पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं के कारण प्रदूषण का असर ज्यादा हो सकता है। WHO बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को air pollution से होने वाले स्वास्थ्य प्रभावों के प्रति अधिक susceptible समूहों में रखता है। इसी तरह asthma, COPD या cardiovascular disease जैसी पहले से मौजूद समस्याओं वाले लोगों को भी ज्यादा सावधानी की जरूरत होती है।

सिर्फ सर्दियों में ही प्रदूषण खतरनाक होता है?

नहीं। प्रदूषण सालभर स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय हो सकता है। हालांकि दिल्ली-NCR में सर्दियों के दौरान हवा की गुणवत्ता अक्सर ज्यादा चर्चा में रहती है। इसकी वजहों में मौसम संबंधी परिस्थितियां, हवा की गति, तापमान, स्थानीय emissions और आसपास के क्षेत्रों से आने वाला pollution शामिल हो सकते हैं। जब हवा की गति कम होती है और प्रदूषक वातावरण में ज्यादा देर तक टिकते हैं, तो pollution levels बढ़ सकते हैं।

दिल्ली-NCR में प्रदूषण के बड़े स्रोत क्या हैं?

वायु प्रदूषण किसी एक स्रोत से नहीं बनता। WHO के अनुसार outdoor air pollution में transportation, industry, power generation, agriculture और waste burning जैसे कई स्रोत योगदान कर सकते हैं। 

दिल्ली-NCR जैसे बड़े urban region में वाहनों का धुआं, सड़क और निर्माण से उठने वाली धूल, industrial emissions, कचरा जलाना और मौसम संबंधी परिस्थितियां मिलकर हवा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं।

खराब AQI में बाहर निकलना कितना नुकसानदायक?

जोखिम व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य, exposure की अवधि और हवा में मौजूद pollutants के स्तर पर निर्भर करता है। खराब air quality में लंबे समय तक outdoor physical activity करने से शरीर ज्यादा हवा अंदर लेता है, जिससे प्रदूषकों का exposure भी बढ़ सकता है। WHO की सलाह के अनुसार गंभीर प्रदूषण की स्थिति में लंबे समय तक या बहुत ज्यादा outdoor activity से बचना exposure कम करने में मदद कर सकता है।

प्रदूषण से बचने के लिए क्या करें?

जब AQI खराब हो, तो कुछ सामान्य सावधानियां exposure कम करने में मदद कर सकती हैं—

* AQI बहुत खराब होने पर लंबे समय तक खुले में रहने से बचें।
* बहुत ज्यादा pollution के समय outdoor exercise को सीमित करें।
* घर के अंदर धुआं पैदा करने वाली गतिविधियों से बचें।
* बाहर निकलना जरूरी हो तो उपयुक्त, अच्छी तरह फिट होने वाला mask इस्तेमाल करें।
* बच्चों, बुजुर्गों और respiratory या heart disease वाले लोगों को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए।
* अगर सांस लेने में लगातार परेशानी, सीने में दर्द या गंभीर लक्षण हों तो medical help लें।

क्या बारिश से प्रदूषण खत्म हो जाता है?

बारिश हवा में मौजूद कुछ particulate matter को नीचे लाने में मदद कर सकती है, इसलिए बारिश के बाद कुछ समय के लिए हवा साफ महसूस हो सकती है।

लेकिन इसे स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। बारिश रुकने के बाद अगर pollution sources जारी रहते हैं और मौसम की परिस्थितियां प्रदूषकों के dispersion के लिए अनुकूल नहीं हैं, तो air quality दोबारा खराब हो सकती है। इसलिए सिर्फ बारिश के भरोसे pollution की समस्या खत्म होने की उम्मीद करना सही नहीं है।

AQI खराब होने का मतलब सिर्फ ‘गंदी हवा’ नहीं

दिल्ली-NCR में AQI बढ़ना केवल आंखों में जलन या कुछ दिनों की खांसी तक सीमित मुद्दा नहीं है। प्रदूषित हवा का short-term exposure सांस संबंधी परेशानियां बढ़ा सकता है, जबकि लंबे समय तक exposure का संबंध respiratory और cardiovascular diseases सहित कई गंभीर स्वास्थ्य प्रभावों से जुड़ा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रदूषण का असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता। स्वस्थ व्यक्ति को शुरुआत में कोई बड़ा लक्षण महसूस न हो, फिर भी लंबे समय तक exposure स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।

इसलिए दिल्ली-NCR में जैसे-जैसे प्रदूषण का स्तर बढ़ता है, AQI को सिर्फ एक नंबर समझने के बजाय यह समझना जरूरी है कि उस नंबर के पीछे मौजूद pollutants हमारे शरीर में क्या कर सकते हैं।

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