नई दिल्ली: दवा खरीदते समय पैकेट पर लिखी कीमत देखकर ज्यादातर लोग उसे ही दवा की असली कीमत मान लेते हैं। लेकिन किसी दवा की कीमत तय होने के पीछे कई स्तरों की प्रक्रिया होती है। दवा बनाने वाली कंपनी से लेकर थोक विक्रेता, मेडिकल स्टोर और सरकार की मूल्य नियंत्रण व्यवस्था तक कई चीजें इसमें शामिल होती हैं। खासतौर पर जरूरी दवाओं की कीमत को नियंत्रित रखने के लिए सरकार ने अलग नियम बनाए हैं।

हाल ही में कैंसर की एक दवा के मामले में दवा की खरीद कीमत और पैकेट पर लिखी अधिकतम खुदरा कीमत के बीच करीब 10 गुना का अंतर सामने आया। अदालत में बताया गया कि दवा की कीमत करीब 2,700 रुपये थी, जबकि उसकी अधिकतम खुदरा कीमत 27,000 रुपये थी। इसके बाद दवाओं की कीमत तय करने की मौजूदा व्यवस्था एक बार फिर चर्चा में आ गई।

MRP और PTR का मतलब समझिए

दवा के पैकेट पर लिखी MRP यानी Maximum Retail Price वह अधिकतम कीमत होती है, जिस पर ग्राहक को दवा बेची जा सकती है। इसमें लागू कर भी शामिल होते हैं। दूसरी ओर PTR यानी Price to Retailer वह कीमत होती है, जिस पर दवा मेडिकल स्टोर तक पहुंचती है। कंपनी से दवा मेडिकल स्टोर तक पहुंचने के बीच वितरक और थोक विक्रेता जैसे कई स्तर हो सकते हैं। इसी वजह से PTR और MRP हमेशा एक जैसी नहीं होती।

हालांकि दोनों कीमतों के बीच कितना अंतर होगा, यह दवा और उस पर लागू नियमों पर निर्भर करता है। जरूरी दवाओं के लिए सरकार ने कीमत नियंत्रित करने की व्यवस्था बनाई है।

हर दवा की कीमत सरकार तय नहीं करती

भारत में सभी दवाओं की कीमत सरकार सीधे तय नहीं करती। कुछ जरूरी दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में रखा गया है।

इसके लिए Drugs (Prices Control) Order, 2013 यानी DPCO लागू है। इसके तहत National List of Essential Medicines यानी NLEM में शामिल दवाओं की कीमत पर नियंत्रण रखा जाता है। मौजूदा NLEM 2022 में 388 दवाएं शामिल हैं। इन दवाओं की अधिकतम कीमत तय करने में National Pharmaceutical Pricing Authority यानी NPPA की अहम भूमिका होती है। NPPA इन दवाओं के लिए अधिकतम सीमा यानी Ceiling Price तय करती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जरूरी दवाओं की कीमत तय सीमा से ऊपर न जाए और मरीजों पर इलाज का आर्थिक बोझ कम रहे।

Ceiling Price क्या होती है?

Ceiling Price का मतलब किसी दवा की वह अधिकतम निर्धारित कीमत है, जिसके ऊपर संबंधित दवा को नहीं बेचा जा सकता, अगर वह मूल्य नियंत्रण के दायरे में आती है। इस कीमत को तय करने के लिए बाजार में उपलब्ध संबंधित दवाओं की कीमतों को देखा जाता है। NPPA के अनुसार संबंधित दवा के उन ब्रांड और सामान्य दवा रूपों की खुदरा विक्रेता तक पहुंचने वाली कीमत को गणना में लिया जाता है, जिनकी बाजार में कम से कम एक प्रतिशत हिस्सेदारी होती है।

इन कीमतों का औसत निकाला जाता है और उसके बाद निर्धारित खुदरा विक्रेता लाभ जोड़ा जाता है। DPCO के तहत अनुसूचित दवाओं के लिए खुदरा विक्रेता लाभ 16 प्रतिशत रखा गया है। इसके बाद जहां जरूरी होता है, वहां लागू कर को ध्यान में रखते हुए अधिकतम खुदरा कीमत तय की जाती है।

दवा की कीमत तय करने में कई स्तर शामिल

किसी दवा के बाजार तक पहुंचने की प्रक्रिया में केवल दवा बनाने वाली कंपनी ही शामिल नहीं होती। कंपनी से निकलने के बाद दवा वितरक और थोक विक्रेता के माध्यम से मेडिकल स्टोर तक पहुंच सकती है। इस पूरी प्रक्रिया में अलग-अलग स्तरों पर कीमत और लाभ का हिस्सा जुड़ सकता है। हालांकि मूल्य नियंत्रण के दायरे वाली दवाओं के लिए सरकार ने कीमत तय करने की सीमा निर्धारित की है। इसीलिए पैकेट पर लिखी MRP और कंपनी से मेडिकल स्टोर तक पहुंचने वाली कीमत में अंतर को सीधे मेडिकल स्टोर का मुनाफा मानना सही नहीं है।

जो दवाएं मूल्य नियंत्रण में नहीं हैं, उनका क्या?

सभी दवाएं NLEM में शामिल नहीं होतीं। जो दवाएं निर्धारित मूल्य नियंत्रण व्यवस्था के तहत नहीं आतीं, उनकी कीमत तय करने की प्रक्रिया अलग होती है।ऐसी दवाओं के लिए निर्माता को अनुसूचित दवाओं की तरह NPPA से अधिकतम कीमत की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होती। हालांकि इन दवाओं की कीमतों पर भी सरकार की निगरानी रहती है। NPPA ऐसी दवाओं की कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी पर नजर रखती है और DPCO के तहत निर्धारित नियमों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।

यानी किसी दवा की कीमत ज्यादा होने का मतलब यह नहीं है कि वह अपने आप नियमों का उल्लंघन कर रही है। यह देखना जरूरी है कि वह दवा मूल्य नियंत्रण के किस दायरे में आती है और उस पर कौन से नियम लागू हैं।

NPPA की भूमिका क्या है?

दवाओं की कीमतों पर निगरानी रखने के लिए केंद्र सरकार ने National Pharmaceutical Pricing Authority यानी NPPA बनाई है। यह संस्था जरूरी दवाओं की अधिकतम कीमत तय करने के साथ-साथ बाजार में दवाओं की कीमतों की निगरानी भी करती है। NPPA की जानकारी के अनुसार जून 2026 तक 935 दवा संयोजनों के लिए अधिकतम कीमतें तय की जा चुकी थीं। इनमें अलग-अलग बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली जरूरी दवाएं शामिल हैं।

दवाओं की तय कीमतों में समय-समय पर बदलाव भी किया जाता है। इसके लिए थोक मूल्य सूचकांक यानी WPI में होने वाले बदलाव को ध्यान में रखा जाता है।

अधिकतम कीमत का मतलब यही कीमत होना जरूरी नहीं

यह समझना भी जरूरी है कि Ceiling Price दवा की न्यूनतम कीमत नहीं होती। यह अधिकतम सीमा होती है। अगर कोई कंपनी किसी मूल्य नियंत्रित दवा को तय अधिकतम कीमत से कम कीमत पर बेच रही है, तो वह कम कीमत पर दवा बेच सकती है। लेकिन तय अधिकतम सीमा से ज्यादा कीमत पर बेचने के लिए निर्धारित नियमों का पालन करना पड़ता है। इस व्यवस्था का मकसद दवा कंपनियों को कीमत तय करने की पूरी छूट देने के बजाय जरूरी दवाओं की कीमत पर एक सीमा बनाए रखना है।

कैंसर की दवाओं में कीमत का असर ज्यादा

कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में मरीजों को लंबे समय तक दवाओं की जरूरत पड़ सकती है। कई मामलों में एक दवा की कीमत ही इलाज के कुल खर्च का बड़ा हिस्सा बन जाती है। ऐसे में दवा की खरीद कीमत और ग्राहक से ली जाने वाली कीमत में बड़ा अंतर मरीज के परिवार पर सीधा आर्थिक असर डाल सकता है।

हालिया मामले में करीब 2,700 रुपये की कीमत वाली दवा पर 27,000 रुपये की अधिकतम खुदरा कीमत का अंतर सामने आने के बाद इसी मूल्य निर्धारण व्यवस्था पर ध्यान गया है। यह मामला यह भी दिखाता है कि दवा की कीमत को समझने के लिए सिर्फ पैकेट पर लिखी MRP देखना पर्याप्त नहीं है। यह देखना भी जरूरी है कि दवा मूल्य नियंत्रण के दायरे में आती है या नहीं और उसकी अधिकतम कीमत किस नियम के तहत तय हुई है।

आम ग्राहक को क्या पता होना चाहिए?

दवा खरीदते समय ग्राहक को पैकेट पर लिखी MRP, दवा का नाम, मात्रा, संरचना और समाप्ति तिथि जरूर देखनी चाहिए। जरूरी दवाओं की तय कीमतों से जुड़ी जानकारी NPPA की वेबसाइट पर भी उपलब्ध रहती है। अगर किसी दवा की कीमत असामान्य रूप से ज्यादा लगती है, तो यह जानकारी ली जा सकती है कि वह दवा मूल्य नियंत्रण की सूची में शामिल है या नहीं। दवाओं की कीमतों को लेकर शिकायत या जानकारी के लिए भी NPPA की ओर से संबंधित व्यवस्था उपलब्ध कराई गई है।

इस पूरे सिस्टम में PTR दवा की वह कीमत है जिस पर वह खुदरा विक्रेता तक पहुंचती है, MRP ग्राहक से ली जाने वाली अधिकतम खुदरा कीमत है और Ceiling Price मूल्य नियंत्रण वाली दवा की निर्धारित अधिकतम सीमा है।

यह भी पढ़ें: 27 की सत्ता: 2012 में SP, फिर BJP की दो जीत… 2027 में कुर्सी का चुनावी गणित कितना बदला? समझें पूरा समीकरण