देश की सड़कों पर सुबह और शाम को रेंगता ट्रैफिक आम दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। लोग भरे ही कितना भी समय से निकल जांए लेकिन सड़कों पर लगी लंबी कतारे और घंटो के जाम से लोगों को दो चार होना ही पड़ता है।

जाम के भार को कम करने के लिए फ्लाईओवर, सड़कों का चौड़िकरण और एकस्प्रेसवे भी बन चुके हैं। तो कुछ एक्सप्रेस वे का काम जल्द ही शुरु हो जाएगा।

लेकिन सबसे बड़ी समस्या अभी भी यही है कि देश के छोटे शहरों में सड़कों पर जाम के दबाब को आखिर खत्म कैसे किया जाए?


नेशनल हाउसहोल्ड ट्रैवल सर्वे ने देश में पहली ट्रैफ्रिक का पूरा आंकड़ा जारी किया। इन आंकड़ों के माध्यम से रोजाना ट्रैफिक से जूझने वाले लोगों की कहानी को बया कर दिया।

साल 2025 के जुलाई से जून 2026 के बीच देश में नेशनल हाउसहोल्ड ट्रैवल सर्वे ने सड़कों पर उतरकर आंकड़ा जुटाना शुरु किया था। इस सर्वे में देश के 14,274 गांव, 10,377 शहर व ब्लॉक्स के 492023 परिवारों और 20,34,371 लोगों से बातचीत कर स्थिति का आकलन किया गया।

इन आंकड़ों ने जो हकीकत दिखाई वह काफी चौंकाने वाली थी। सर्वे के हिसाब से देश में केवल 15 प्रतिशत लोग बस, ट्रेन, मेट्रो, ऑटो जैसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट को अपने सफर के लिए इस्तेमाल करते हैं।

इसमें ऑटो और ई-रिक्शा को अगर साइड कर दिया जाए तो पब्लिक ट्रांसपोर्ट यानी बस, ट्रेन और मेट्रो का इस्तेमाल महज 9 प्रतिशत लोग ही कर रहे हैं। देश के राज्य दिल्ली, लखनऊ, कानपुर और अन्य कई जिलों में मेट्रों इस समय लोगों की पहली पसंद बन चुकी है।

बात की जाए अकेले दिल्ली की तो राजधानी दिल्ली में मेट्रों किसी लाइफ लाइन से कम नहीं है, लेकिन उसके बाद भी दिल्ली की सड़कों से ट्रैफिक छंटने का नाम नहीं लेता


आज देश खुद को विदेशों से तुलना करते हुए परिवहन क्षेत्र में लगातार बदलाव करता जा रहा है। बेहतरीन सड़कें, कम दूरी के फ्लाइओवर और एक्प्रेस वे के जरिए देश अब विदेशों से खुद की तुलना करता कई बार देखा गया है।

लेकिन भारत जैसी समस्या से साउथ कोरिया भी राजधानी सियोल को भी सामना करना पड़ रहा है। सियोल ने इस समस्या से निकलने के लिए एक ऐसा रास्ता चुन लिया है, जिससे भारत को भी सबक लेना चाहिए।

 

कुछ लोग मेट्रो, बसों या फिर अन्य सार्वजनिक वाहनों के बजाय बाइक और कार को ही बेहतरीन विकल्प मानते हैं।क्योंकि 20 मिनट की दूरी तय करने के लिए अगर कोई मेट्रो को चुनता है, तो उसे 15 किमी की दूरी तक ही मेट्रो पहुंचाती है। बाकी 5 किमी का सफर तय करने के लिए शख्स को इ-रिक्शा और ऑटो से सफर करना ही पड़ेगा।

मतलब साथ है कि एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में अधिक पैसा खर्च हो रहा है। ऐसे में आदमी बाइक ही निकालना अपनी पहली पसंद मानता हैा।

देश में सड़कें, फ्लाईओवर और एक्सप्रेसवे खुलने के बाद भी जाम कम नहीं हो रहा। ऐसे में मुख्य कारण क्या है इसके बारे में भी कई तथ्य सामने निकल कर आ रहे हैं।

सियोल की हालत कैसी?

साल 1990 के दशक में सियोल की आबादी तेजी से बढ़ी। लोगों में अपने संसाधनों को भी बढ़ाया। जिसमें कारें और बाइकों की संख्या में तेजी देखी गई है। साल 1990 से 1995 के बीच सियोल में कारों की संख्या 10 लाख से 20 लाख पहुंची, सीधे तौर पर देखा जाए तो 5 साल में सबसे कम नहीं हुआ।

साल 1996 से 2002 के बीच कारों के हिस्से में 25 प्रतिशत से बढ़कर 27 प्रतिशत हो गई। महज 30.1 प्रतिशत से 26.9 प्रतिशत तक पहुंच गई। जैसे जैसे दौर बढ़ता गया। वैसे-वैसे चीजे नई आती गईं।

मेट्रो का नेटवर्क बढ़ा लेकिन सड़कों पर ट्रैफिक की स्थिति अभी भी जस की तस बनी हुई है। सियोल की 103 कंपनियां बंद हो चुकी है। साल 2000 तक सियोल में सड़क पर ट्रैफिक का दबाब बीजिंग या शंघाई की तुलना में 3 से 4 गुना ज्यादा था, जिसके बाद भी जाम खत्म नहीं होता था।

1 जुलाई साल 2004 में सब कुछ बदला

सियोल में साल 2004 में 1 जुलाई से सब कुछ बदल गया। सियोल के मेयर ली म्युंग-बाक ने ऐलान करते हुए कहा कि यहां अब और सड़कें नहीं बनेंगी। बस व्यवस्था को एक बार फिर नए सिरे से शुरु किया गया।

2 साल की नई तैयारी का विशेष डेटा तैयार किया गया। इसमें लोगों के आने-जाने के तौर तरीकों का अध्यनन किया गया। 1 जुलाई साल 2004 को पूरी पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था में किए गए बदलाव ने लोगों का नजरिया भी बदलकर रख दिया।

अगर भारत भी ऐसी कुछ नया बदलाव करता है। तो ट्रैफिक की स्थिति में सुधार होना संभव है।

बसों के लिए नई लेन की गई तैयार

सियोल ने अपनी बसों की लाइन को तैयार किया। इसके लिए सियोल में बीचों बीच एक अलग लेन पट्टी बनाई गई। जिन्हें एक्सक्लूसिव मीडियन बस लेन का नाम रखा गया। जिसमें केवल बसे ही चलती हैं।

अगर कोई कार, कोई ऑटो उसमें घुसा तो कार्रवाई होना तय है। जुलाई 2004 में दोबोंग-मिय-रो, सुसेक-सियोंगसान-रो और गंगनाम-डेरो पर यह पहली लेन बनीं। जिसे हर साल बढ़ाया गया। साल 2014 तक बस लेन 117.5 किमी मीडियन बस लेन तैयार थीं।

यहां पहले 11 किलोमीटर घंटा रफ्तार थी वह 20 किमी हो गई। यानी 81.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी। पीक आवर में औसत बस स्पीड में तकरीबन 30 प्रतिशत का सुधार।

भारत में इस तरह का बदलाव सड़कों पर होने वाली दुर्घनाओं में कमी ला सकता है। इसके साथ ही गांवों से मुख्य शहर में आवागमन आसान हो जाएगा।

बस रूट को फिर से बनाया

सियोल ने तकरीबन 400 से ज्यादा बस रूटों में बदलाव किया। ब्लू बसे लंबी दूरी के लिए रखी गई। ग्रीन बसें मेट्रो स्टेशनों तक फीडर का काम करने में लगी। लाल बसे एक्सप्रेस रूट्स का हिस्सा बनी,

जो उपनगरों से सीधे शहर के सीमित स्टॉप पर ले जाती थी। अगर यही बदलाव भारत भी अपनी बसों में कर दे तो शहरों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों की स्थित में पूरी तरह से बदलाव देखा जा सकता है।

क्योंकि दिल्ली में ट्रैफिक की स्थिति बेहद खराब है। ऐसे में अगर यिसोल का यह बदलाव दिल्ली व अन्य मेट्रों शहरों में किया जाता है, तो ट्रैफिक पर इसका सीधा असर देखा जाएगा।

एक टिकट में ही पूरा सफर तय

साल 2004 से पहले सियोल में बस, मेट्रो और टैक्सी का टिकट अलग था। लेकिन 1 जुलाई 2004 को व्यवस् बदली। इसमें एक ही टिकट से सारी यात्रा। चाहे बस हो या मेट्रो बस एक ही टिकट पर आप कहीं भी सफर कर सकते है।

सुबह 7 बजे से रात 9 बजे तक 30 मिनट में ही इस टिकट के जरिए फिर से सफर किया जा सकता है। यह टिकट रात 9 बजे से सुबह 7 बजे तक 1 घंटे तक का समय मिलता था। दिन में 4 बार ट्रांसफर पर छूट मिलती थी।

T-money नाम के स्मार्ट कार्ड के जरिए बस, मेट्रो, टैक्सी सब जगह प्रयोग इस्तेमाल में लाया जा सकता है। दिसंबर 2004 तक इसमे 88.9% तक इजाफा हुआ।

बात करें भारत की अगर ऐसी स्थिति भारत भी अगर इस तरह के टिकट प्रणाली को लागू करता है तो बदलाव होना तय है।


भारत के लिए सियोल से असली सबक क्या है?

भारत में दिल्ली, महाराष्ट्र जैसे शहरों में मेट्रो और लोकल ट्रेन का इस्तेमाल होता है। शहर में रहने वाले कामगारों में 20.7% तक है, लेकिन राष्ट्रीय औसत सिर्फ 5% है। कुल मिलाकर भारत के शहरों में सिर्फ 47,650 बसें हैं। 61% सिर्फ 9 बड़े महानगरों में हैं।

दिल्ली में BRT को 2008 में शुरू किया गया था, लेकिन फीडर सर्विस, पार्किंग और दूसरी नीतियों के बाद इसे लागू किया गया, इसलिए यह कामयाब नहीं हो पाया। सियोल ने जो किया वह महज लेन नहीं एक सिस्टम को डिजाइन करना था लेकिन भारत में इसे केवल डिजाइन के तौर पर ही बनाया गया।

सही ढंग से इसे लागू नहीं किया। मतलब बस की लेन में गाड़ियां प्रवेश कर रही थी और गाड़ियों की लाइन में बाइके। भारत के लिए सियोल से सबसे बड़ा सबक यही है कि सड़कें बढ़ाने से जाम कम नहीं होगा।

बल्कि सुविधाजनक और पब्लिक ट्रांसपोर्ट को ही हर मोहल्ले तक पहुंचाने के लिए व्यवस्था को बेहतरन बनाना है। जिससे की अगर कोई शख्स बाइक का इस्तेमाल कर रहा है तो एक टिकट में पूरा सफर के जरिए वह कम पैसों में अपने ऑफिस पहुंच जाए।