नेपाल में लगातार हो रही भारी बारिश के बीच काली गंडकी नदी में पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा गिरने की घटना ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते प्राकृतिक खतरों की चिंता फिर बढ़ा दी है। यह घटना ऐसे समय हुई है जब नेपाल के कई हिस्से बाढ़ और भूस्खलन से जूझ रहे हैं। हालिया आपदाओं में कम से कम 24 लोगों की मौत और 14 लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है।
सबसे अहम सवाल यह है कि आखिर पहाड़ अचानक क्यों टूट रहे हैं? क्या इसका असर सिर्फ नेपाल तक सीमित रहेगा? और क्या भारत, खासकर बिहार के मैदानी इलाकों को भी इससे खतरा है?
लेटे में आखिर क्या हुआ?
नेपाल के मुस्तांग जिले में लेटे के पास रविवार, 27 सितंबर की शाम करीब 5:30 बजे भारी बारिश के दौरान पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा अचानक ढह गया। चट्टान, मिट्टी, पेड़ और मलबे का विशाल हिस्सा सीधे काली गंडकी नदी में जा गिरा।
घटना के वीडियो स्थानीय लोगों और यात्रियों ने बनाए। कुछ ही पलों में पहाड़ से गिरा मलबा नदी के रास्ते में जमा हो गया और कुछ समय के लिए नदी का प्रवाह बाधित हो गया।
इस तरह की स्थिति को बेहद गंभीर माना जाता है, क्योंकि मलबे से बना अस्थायी बांध अगर अचानक टूट जाए तो उसके पीछे जमा पानी और मलबा तेज रफ्तार से नीचे की ओर बह सकता है। इससे अचानक बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।
हालांकि, इस मामले में बढ़ते पानी के दबाव से मलबे का हिस्सा टूट गया और नदी का बहाव दोबारा शुरू हो गया। इससे तत्काल बड़े पैमाने पर नदी फटने का खतरा कम हुआ।
सिर्फ एक जगह नहीं, कई इलाकों में संकट
नेपाल में उसी मौसम प्रणाली के दौरान अन्य घटनाएं भी सामने आईं। मनांग जिले के चामे में चट्टान गिरने की घटना हुई, जबकि माउंट हिमलुंग के बेस कैंप में हिमस्खलन ने राहत और बचाव अभियान को चुनौती दी।
हिमलुंग हिमाल करीब 7,126 मीटर ऊंचा पर्वत है। इसके बेस कैंप में एक टेंट हिमस्खलन की चपेट में आया। इसमें पर्वतारोहियों और सपोर्ट स्टाफ के सदस्य मौजूद थे।
12 नेपाली मजदूरों और गाइडों के लापता होने की सूचना के बाद 14 सदस्यीय बचाव दल को तलाश अभियान के लिए भेजा गया। अभियान का नेतृत्व अंतरराष्ट्रीय माउंटेन गाइड मिंगमा जी शेरपा की अगुवाई में किया गया।
भारी बारिश क्यों बन रही है इतनी बड़ी समस्या?
भारी बारिश अपने आप में भूस्खलन का एक कारण हो सकती है, लेकिन ऊंचे हिमालय में समस्या इससे कहीं अधिक जटिल है, लगातार बारिश से पहाड़ी ढलानों की मिट्टी और चट्टानों में पानी की मात्रा बढ़ जाती है। इससे मिट्टी की पकड़ कमजोर हो सकती है और पहले से अस्थिर ढलान अचानक खिसक सकती है।
इसके साथ ही वैज्ञानिक लंबे समय से हिमालय में बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पीछे हटने और पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने को लेकर चिंता जताते रहे हैं। पर्माफ्रॉस्ट यानी ऐसी जमीन या चट्टानी सतह जो लंबे समय तक जमी रहती है। ऊंचे पहाड़ी इलाकों में यह कई जगह चट्टानों और ढलानों को स्थिर रखने में मदद करती है। इसके पिघलने से कुछ क्षेत्रों में चट्टानी ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
इसलिए समस्या को सिर्फ 'भारी बारिश' तक सीमित करके देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। मौसम, भूगर्भीय संरचना, बर्फ और ग्लेशियरों में बदलाव तथा मानवीय गतिविधियां ये सभी मिलकर जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं।
बाढ़ और भूस्खलन से नेपाल में कितना नुकसान?
हालिया बाढ़ और भूस्खलन में नेपाल में कम से कम 24 लोगों की मौत और 14 लोगों के लापता होने की जानकारी दी गई है।
गंडकी प्रांत में 747 से अधिक परिवार प्रभावित हुए हैं और करीब 1,500 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाना पड़ा। कई घर नष्ट हुए, पुलों को नुकसान पहुंचा और प्रमुख सड़क मार्ग बाधित हुए।
स्थानीय जलविद्युत परियोजनाएं भी प्रभावित हुई हैं। नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक, लगभग 3,000 लोगों को उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों से निकालकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। जाजरकोट, म्याग्दी और संखुवासभा जैसे पहाड़ी जिलों में फंसे लोगों को हेलीकॉप्टरों के जरिए निकालने की कोशिश की गई।
खतरा घटना के बाद भी खत्म नहीं होता
भूस्खलन रुक जाने का मतलब यह नहीं कि खतरा समाप्त हो गया। सबसे बड़ा जोखिम उन जगहों पर होता है जहां मलबा नदी के रास्ते में जमा होकर प्राकृतिक बांध बना देता है। अगर ऐसा बांध कमजोर हुआ और अचानक टूट गया, तो नीचे की ओर तेज बहाव के साथ पानी, पत्थर और कीचड़ पहुंच सकते हैं।
दूसरा खतरा आसपास की ढलानों का है। एक बड़े भूस्खलन से पहले से कमजोर क्षेत्र में दूसरी चट्टानें भी अस्थिर हो सकती हैं। तीसरी चुनौती मौसम है। अगर बारिश जारी रहती है तो मिट्टी में पानी की मात्रा बढ़ने से नए भूस्खलन का जोखिम बना रह सकता है। यही वजह है कि ऐसी घटनाओं के बाद नदी घाटियों और निचले इलाकों में लगातार निगरानी जरूरी हो जाती है।
क्या इसका असर भारत तक पहुंच सकता है?
हां, क्योंकि काली गंडकी नदी का जल तंत्र आगे चलकर भारत में प्रवेश करता है और गंडक नदी प्रणाली से जुड़ता है। इसी वजह से नेपाल के पहाड़ी इलाकों में अत्यधिक बारिश और मलबे का असर भारत के सीमावर्ती तथा निचले क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है।
भारत-नेपाल सीमा पर वाल्मीकिनगर बैराज में भारी जलप्रवाह दर्ज किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, जल बहाव 5.44 लाख क्यूसेक तक पहुंच गया, जिसे इस वर्ष का अब तक का सबसे अधिक प्रवाह बताया गया।
बिहार के उत्तर-पश्चिमी और उत्तरी हिस्सों में इसके चलते बाढ़ का खतरा बढ़ा। राज्य सरकार ने 17 जिलों को हाई अलर्ट पर रखा और तटबंधों तथा स्लुइस गेट्स की लगातार निगरानी के निर्देश दिए।
नेपाल की पहाड़ी आपदा, बिहार की मैदानी चुनौती
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। नेपाल में शुरू होने वाली समस्या और बिहार में दिखाई देने वाला उसका असर एक ही तरह की आपदा नहीं है। पहाड़ों में भारी बारिश भूस्खलन और मलबे का कारण बन सकती है, जबकि वही अतिरिक्त पानी और मलबा नीचे की ओर नदी के बहाव को प्रभावित करके मैदानी इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ा सकता है।
इसलिए हिमालयी नदियों को सिर्फ किसी एक देश की सीमा के भीतर की समस्या मानना मुश्किल है। उनका पूरा नदी बेसिन कई क्षेत्रों और देशों को जोड़ता है।
क्या यह जलवायु परिवर्तन का संकेत है?
वैज्ञानिकों ने हिमालय में बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पीछे हटने और पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने को लेकर लगातार चिंता जताई है। हालांकि किसी एक भूस्खलन को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करना वैज्ञानिक रूप से सावधानी मांगता है। किसी खास घटना में स्थानीय भूगर्भीय स्थिति, बारिश की तीव्रता, ढलान की संरचना और अन्य कारकों की भी भूमिका होती है, लेकिन व्यापक स्तर पर तापमान बढ़ने और हिमालयी बर्फ तथा ग्लेशियरों में बदलाव से पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ने की चिंता जरूर जताई जाती रही है।
भारत के लिए बड़ा सबक क्या है?
नेपाल की घटनाएं भारत के हिमालयी राज्यों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। उत्तराखंड की चमोली आपदा और सिक्किम में 2023 में साउथ ल्होनक झील से जुड़ी बाढ़ ने दिखाया है कि ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में पानी, बर्फ, चट्टान और मलबे का संयोजन कितनी तेजी से बड़े संकट में बदल सकता है।
हिमालय में सड़क, सुरंग, जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य बुनियादी ढांचे का विस्तार भी हो रहा है। ऐसे में संवेदनशील घाटियों में किसी बड़े भूस्खलन, हिमस्खलन या ग्लेशियल झील से जुड़ी घटना का असर मानव बस्तियों और बुनियादी ढांचे पर तेजी से पड़ सकता है।
इसका मतलब यह नहीं कि हर भूस्खलन बड़े पैमाने की आपदा में बदलेगा। लेकिन जोखिम वाले क्षेत्रों में बेहतर निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, सुरक्षित निर्माण और नदी घाटियों की समग्र योजना की जरूरत जरूर बढ़ जाती है।
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फिलहाल सबसे बड़ा खतरा क्या है?
अभी तीन चीजों पर सबसे ज्यादा नजर रखने की जरूरत है:
- लगातार होने वाली भारी बारिश और उसके कारण नए भूस्खलन।
- नदियों में बने अस्थायी मलबा-बांध और उनके अचानक टूटने की आशंका।
- पहाड़ी इलाकों से आने वाले अतिरिक्त पानी और मलबे के कारण भारत के निचले इलाकों में बढ़ता बाढ़ जोखिम।
नेपाल की मौजूदा घटनाएं इसलिए सिर्फ एक पहाड़ के गिरने की कहानी नहीं हैं। वे यह दिखाती हैं कि हिमालय में मौसम, भूगोल, बर्फ और नदी प्रणालियां एक-दूसरे से कितनी गहराई से जुड़ी हुई हैं और जब पहाड़ों में कोई बड़ी घटना होती है, तो उसका असर सीमा पार मैदानों तक पहुंचने में बहुत ज्यादा समय नहीं लगता।