धर्मशाला: तिब्बत की निर्वासित सरकार ने दुनिया भर के तिब्बतियों और बौद्ध समुदायों से दलाई लामा के उत्तराधिकार की प्रक्रिया के लिए अभी से तैयार रहने की अपील की है। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (CTA) ने विदेशी सरकारों से चीन द्वारा संचालित पुनर्जन्म प्रक्रिया को मान्यता नहीं देने का भी आग्रह किया है। हालांकि, चीन के साथ बातचीत की संभावनाओं को लेकर अनिश्चितता के बावजूद प्रशासन ने तिब्बत के लिए अपनी ‘मिडिल वे पॉलिसी’ यानी मध्य मार्ग नीति पर कायम रहने की बात दोहराई है।

धर्मशाला में मीडिया से बातचीत के दौरान केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के मंत्रियों ने उत्तराधिकार विवाद, चीन की नई नीति, तिब्बती पहचान, निर्वासन में रह रहे तिब्बतियों के कल्याण और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जैसे मुद्दों पर अपनी प्राथमिकताएं रखीं।

दलाई लामा के उत्तराधिकारी को लेकर विवाद

दलाई लामा 2026 में 91 वर्ष के हो गए हैं। उनके उत्तराधिकारी की पहचान और मान्यता का सवाल चीन और निर्वासित तिब्बती नेतृत्व के बीच एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है।

केंद्रीय तिब्बती प्रशासन का कहना है कि चीन ने दलाई लामा के पुनर्जन्म को लेकर तीन शर्तें निर्धारित की हैं। इसके विपरीत, CTA का दावा है कि विभिन्न सरकारों और तिब्बती बौद्ध संगठनों ने लगभग 150 प्रस्तावों और बयानों के माध्यम से इस प्रक्रिया में चीनी हस्तक्षेप का विरोध किया है। प्रशासन के अनुसार, 38 से अधिक देश उसके रुख का समर्थन करते हैं।

CTA ने चीन द्वारा मान्यता प्राप्त पंचेन लामा ग्यालत्सेन नोरबू को चीनी सरकार के समर्थन से आगे बढ़ाया गया प्रतिनिधि बताया है। प्रशासन ने गेधुन चोएक्यी न्यिमा की रिहाई की मांग भी दोहराई, जिन्हें दलाई लामा ने 11वें पंचेन लामा के रूप में मान्यता दी थी। 1995 में उन्हें चीनी हिरासत में ले लिया गया था। CTA ने अन्य तिब्बती राजनीतिक बंदियों की रिहाई की भी मांग की है।

‘मिडिल वे पॉलिसी’ पर कायम रहेगा प्रशासन

निर्वासित तिब्बती प्रशासन की मध्य मार्ग नीति का उद्देश्य चीन के भीतर तिब्बत के लिए वास्तविक स्वायत्तता हासिल करना है, न कि पूर्ण स्वतंत्रता। इस नीति की शुरुआत 1973 में दलाई लामा के उस दृष्टिकोण से जुड़ी है, जिसमें तिब्बती पहचान की रक्षा और सार्थक स्वायत्तता को प्राथमिकता दी गई थी।

धर्म एवं संस्कृति विभाग की मंत्री त्सेग्याल चुक्या ड्रान्यी ने NDTV से कहा कि 2002 से 2010 के बीच CTA के प्रतिनिधियों और चीनी सरकार के बीच नौ दौर की बातचीत हुई थी। हालांकि, 2008 के बीजिंग ओलंपिक के बाद यह प्रक्रिया ठहर गई।

अब CTA बातचीत को दोबारा गति देने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए विदेशी सरकारों से चीन को बिना किसी पूर्व शर्त के वार्ता की मेज पर लौटने के लिए प्रेरित करने की अपील की गई है।

प्रशासन ने अमेरिका के 2024 के ‘प्रमोटिंग अ रिजॉल्यूशन टू द तिब्बत-चाइना डिस्प्यूट एक्ट’ का भी उल्लेख किया। CTA के अनुसार, यह कानून तिब्बत-चीन विवाद को अनसुलझा मानने के उसके दृष्टिकोण को समर्थन देता है। प्रशासन चाहता है कि अन्य लोकतांत्रिक देश भी इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय भूमिका निभाएं।

चीन के नए कानून पर तिब्बती प्रशासन की चिंता

CTA के मंत्रियों के साथ बातचीत में चीन के ‘लॉ ऑन प्रमोटिंग एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस’ पर भी चर्चा हुई। यह कानून मार्च में पेश किया गया था और 1 जुलाई से लागू हुआ।

केंद्रीय तिब्बती प्रशासन का आरोप है कि यह कानून तिब्बती सांस्कृतिक पहचान को कमजोर कर सकता है। उसके अनुसार, इसके जरिए चीन तिब्बती समाज में समावेशन की प्रक्रिया तेज करने, निगरानी बढ़ाने और धार्मिक संस्थानों पर नियंत्रण मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

CTA ने कानून के संभावित प्रभावों को लेकर कई चिंताएं जताई हैं:

  • भाषा और शिक्षा: प्रशासन का दावा है कि इस कानून से पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के स्तर से ही मंदारिन चीनी भाषा को अनिवार्य बनाने का दबाव बढ़ सकता है।

  • परंपराओं पर असर: पारंपरिक विवाह और अंतिम संस्कार जैसी सांस्कृतिक प्रथाओं को बदलने की कोशिश किए जाने की आशंका जताई गई है।

  • धार्मिक संस्थान: CTA को आशंका है कि मठों और धार्मिक संस्थानों पर चीनी सांस्कृतिक प्रभाव के अनुरूप काम करने का दबाव बढ़ सकता है।

  • निगरानी: प्रशासन ने चेहरे की पहचान, GPS ट्रैकिंग, DNA प्रोफाइलिंग और आंखों की पुतली की स्कैनिंग जैसी तकनीकों के इस्तेमाल पर भी चिंता जताई है।

CTA ने आवास, प्रवासन और विभिन्न जातीय समुदायों के बीच विवाह से संबंधित प्रावधानों पर भी सवाल उठाए हैं। उसका कहना है कि इनका प्रभाव तिब्बतियों की अपनी मातृभूमि में सामाजिक स्थिति पर पड़ सकता है।

प्रशासन के अनुसार, कानून के कुछ प्रावधान चीन के बाहर रहने वाले उन व्यक्तियों और संगठनों को भी प्रभावित कर सकते हैं, जो कानून का विरोध करते हैं या तिब्बती समुदाय का समर्थन करते हैं।

हालांकि, चीन इन आरोपों को खारिज करता है कि उसकी नीतियों का उद्देश्य तिब्बती पहचान को मिटाना है। बीजिंग का कहना है कि उसकी नीतियां विकास, जातीय एकता और स्थिरता को बढ़ावा देती हैं। चीन तिब्बती क्षेत्रों को अपने देश का अभिन्न हिस्सा मानता है।

CTA ने यह भी दावा किया है कि लगभग 10 लाख तिब्बती बच्चे सरकारी बोर्डिंग स्कूलों में रह रहे हैं। उपलब्ध विवरण में इस आंकड़े की स्वतंत्र पुष्टि करने वाले साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए हैं।

निर्वासन में रह रहे तिब्बतियों के लिए कल्याणकारी योजनाएं

केंद्रीय तिब्बती प्रशासन ने भारत, नेपाल और भूटान में रह रहे तिब्बती समुदायों के कल्याण को भी अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया है। प्रशासन इन क्षेत्रों में सामुदायिक सेवाएं और कल्याणकारी कार्यक्रम संचालित करता है।

CTA के काशाग यानी मंत्रिमंडल ने नियमित वित्तीय रिपोर्टिंग, अत्यंत गरीबी में रह रहे लोगों की सूची की समीक्षा और बुजुर्गों तथा विशेष जरूरतों वाले लोगों के लिए आवास बढ़ाने का वादा किया है।

त्सेग्याल चुक्या ड्रान्यी ने कहा कि महिलाओं और बच्चों से जुड़े यौन उत्पीड़न तथा दुर्व्यवहार के मामलों में ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई जाएगी। इसके तहत तिब्बती बस्तियों, स्कूलों और कार्यस्थलों में आंतरिक शिकायत समितियों की समीक्षा भी की जाएगी।

प्रशासन के अनुसार, बिना घर या जमीन वाले 1,855 पंजीकृत परिवारों को दूसरी जगह बसाने की दिशा में काम शुरू हो चुका है। युवाओं के लिए सहायता योजनाएं, सामुदायिक रिवॉल्विंग फंड और पर्यटन गतिविधियां भी स्थानीय बस्तियों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से शुरू की जा रही हैं।

शिक्षा और तकनीक पर भी जोर

शिक्षा के क्षेत्र में CTA भारत स्थित तिब्बती स्कूलों को चरणबद्ध तरीके से एकीकृत करने की योजना बना रहा है। प्रशासन के अनुसार, इस प्रक्रिया में जन्म दर और विद्यार्थियों के नामांकन से जुड़े आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि संसाधनों का दोहराव रोका जा सके।

इसके साथ ही तिब्बती भाषा की शिक्षा का विस्तार करने और तिब्बती भाषा में सॉफ्टवेयर तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित उपकरण विकसित करने की योजना है।

प्रशासन एक केंद्रीय डेटा प्रबंधन प्रणाली, AI की सहायता से संचालित डेटाबेस और औपचारिक IT नीति तैयार करने पर भी काम कर रहा है। इसके अलावा, सरकारी कर्मचारियों को AI से संबंधित प्रशिक्षण देने की योजना बनाई गई है।

निर्वासित तिब्बती समुदाय में विभाजन की आशंका

CTA ने आशंका जताई है कि चीन निर्वासित तिब्बती समुदाय के भीतर क्षेत्रीय, धार्मिक और राजनीतिक मतभेदों का फायदा उठाने की कोशिश कर सकता है। प्रशासन ने डोलग्याल या शुगदेन से जुड़े कुछ अनुयायियों को लेकर भी आरोप लगाए हैं कि चीन उनके माध्यम से समुदाय में मतभेद बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

दलाई लामा ने शुगदेन की धार्मिक परंपरा को अपनाने से हतोत्साहित किया है। हालांकि, इस परंपरा के अनुयायियों को लेकर लगाए गए आरोप विवादित हैं और उनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

तिब्बत मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन की अपील

केंद्रीय तिब्बती प्रशासन चाहता है कि विभिन्न देशों की सरकारें, संसदें, थिंक टैंक और मीडिया तिब्बत-चीन विवाद को केवल चीन का आंतरिक मामला मानने के बजाय एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दे के रूप में देखें।

CTA ने विदेशी सरकारों और दानदाताओं से तिब्बती समुदाय को समर्थन जारी रखने की अपील भी की है। प्रशासन का कहना है कि तिब्बतियों को केवल नीतियों से प्रभावित पीड़ित समुदाय के रूप में नहीं, बल्कि चीन में बदलाव की प्रक्रिया में भागीदार के रूप में देखा जाना चाहिए।

हालांकि, इन प्रयासों का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि विदेशी सरकारें बीजिंग के सामने तिब्बत का मुद्दा उठाने के लिए कितनी तत्पर होती हैं। CTA ने भी स्वीकार किया है कि चीन के साथ औपचारिक बातचीत दोबारा शुरू होने की संभावनाएं अभी अनिश्चित हैं।

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