शिमला: हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में तिब्बती इतिहास, संस्कृति, भाषा, परंपराओं और बौद्ध विरासत को समर्पित एक सप्ताह लंबी प्रदर्शनी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। डोरजी ड्रैक तिब्बती बौद्ध मठ, पंथाघाटी में आयोजित इस प्रदर्शनी में युवा तिब्बती भिक्षु, छात्र और हिमालयी बौद्ध समुदाय के लोग बड़ी संख्या में हिस्सा ले रहे हैं।
यह प्रदर्शनी तिब्बती पहचान संरक्षण और अवलोकन सप्ताह के तहत आयोजित की जा रही है। इसका आयोजन सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन के चीफ रिप्रेजेंटेटिव ऑफिस, शिमला, डोरजी ड्रैक मठ और संबोटा तिब्बती स्कूल, शिमला की ओर से संयुक्त रूप से किया गया है।
तीन पीढ़ियों तक पहचान बचाने पर जोर
सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन के चीफ रिप्रेजेंटेटिव ल्हाकपा त्सेरिंग ने कहा कि 1959 की घटनाओं के बाद 67 साल बीत चुके हैं और अब तिब्बती समुदाय अपनी पहचान और विरासत को तीन पीढ़ियों तक आगे बढ़ाने के दौर में है।
उन्होंने कहा कि तिब्बती भाषा, संस्कृति और परंपराओं को बचाए रखना बेहद जरूरी है, खासकर उन समुदायों के लिए जो बड़े तिब्बती बस्तियों से बाहर रहते हैं।
त्सेरिंग ने कहा कि हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर जैसे क्षेत्रों में स्थानीय भाषा, जीवनशैली और शिक्षा व्यवस्था के कारण पारंपरिक संस्कृति को बनाए रखने में चुनौतियां आती हैं।
45 तिब्बती बस्तियों में हो रहा आयोजन
ल्हाकपा त्सेरिंग के अनुसार, यह सप्ताह भारत, नेपाल और भूटान में मनाया जा रहा है और इसमें सभी 45 तिब्बती बस्तियां भाग ले रही हैं।
उन्होंने बताया कि शिमला में प्रदर्शनी को डोरजी ड्रैक मठ में इसलिए लगाया गया है ताकि यह केवल तिब्बती बस्ती तक सीमित न रहे, बल्कि हिमालयी बौद्ध समुदाय के लोगों तक भी पहुंच सके। उन्होंने कहा कि यह मठ निंगमा परंपरा से जुड़ा है और यहां हिमालयी क्षेत्र के करीब 300 भिक्षु रहते हैं।
युवा भिक्षुओं के लिए बना सीखने का मंच
प्रदर्शनी में युवा भिक्षु तिब्बती इतिहास, धर्म, प्रशासन और पारंपरिक जीवन शैली से जुड़ी जानकारी हासिल कर रहे हैं। संबोटा तिब्बती स्कूल के छात्र प्रदर्शनी में लगे विभिन्न स्टॉलों के बारे में आगंतुकों को जानकारी दे रहे हैं। यहां तिब्बती धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की पांच प्रमुख धाराओं-गेलुग, निंगमा, साक्य, काग्यू और बोन के बारे में भी जानकारी दी जा रही है।
तिब्बती प्रशासन और क्षेत्रों की दी जा रही जानकारी
प्रदर्शनी में सिक्योंग पेंपा शेरिंग के नेतृत्व वाले तिब्बती प्रशासन और उसकी लोकतांत्रिक संस्थाओं-कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका-के बारे में भी बताया गया है। इसके अलावा तिब्बत के तीन पारंपरिक क्षेत्रों यू-त्सांग, अमदो और खाम की संस्कृति, पहनावे, खानपान और जीवनशैली को भी प्रदर्शित किया गया है।
दलाई लामा के जीवन पर विशेष खंड
प्रदर्शनी में दलाई लामा के जीवन और योगदान को समर्पित एक विशेष खंड भी बनाया गया है। इसमें पहले से लेकर 14वें दलाई लामा तक की संक्षिप्त जानकारी दी गई है।
आयोजकों के अनुसार, दलाई लामा तिब्बती पहचान और सामूहिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उन्होंने दलाई लामा के लंबे जीवन और शांति, करुणा व सद्भाव के संदेश को लेकर उम्मीद जताई।
आगे भी कई जगह लगाई जाएगी प्रदर्शनी
आयोजकों ने बताया कि शिमला के बाद ऐसी प्रदर्शनी जोनांग मठ, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में भी आयोजित करने की योजना है।
इस पहल का उद्देश्य नई पीढ़ी को तिब्बती इतिहास, भाषा, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जोड़ना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझ सकें और संरक्षित कर सकें।
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