नई दिल्ली: टाटा ट्रस्ट्स के भीतर टाटा संस के भविष्य को लेकर चल रहा विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा समेत चार ट्रस्टियों ने ट्रस्ट के उपाध्यक्ष वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह के रुख पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
नोएल टाटा, दारियस खंबाटा, नेविल एन. टाटा और भास्कर भट्ट की ओर से भेजे गए एक पत्र में दोनों ट्रस्टियों पर सामूहिक फैसलों से अलग रुख अपनाने, मीडिया में अपने व्यक्तिगत विचार रखने और कथित तौर पर अपने न्यासी दायित्वों का पालन नहीं करने के आरोप लगाए गए हैं।
टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने को लेकर विवाद
विवाद का मुख्य मुद्दा टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने का है। चारों ट्रस्टियों का कहना है कि वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह पहले टाटा संस को सूचीबद्ध न करने के सामूहिक फैसलों का हिस्सा रहे, लेकिन अप्रैल 2026 के बाद उन्होंने सूचीबद्ध करने के पक्ष में अपना रुख बदल लिया।
पत्र में उनके बदले हुए रुख को व्यंग्यात्मक अंदाज में “अचानक हुआ आत्मज्ञान” बताया गया है। ट्रस्टियों का आरोप है कि अप्रैल के बाद दोनों ने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट की तीन बैठकों में अपने बदले हुए विचार को औपचारिक रूप से चर्चा के लिए नहीं रखा।
चारों ट्रस्टियों ने सवाल उठाया कि अगर दोनों को टाटा संस को सूचीबद्ध करने का समर्थन करना था तो इस मुद्दे को ट्रस्ट के सामने दोबारा विचार के लिए क्यों नहीं रखा गया।
पहले टाटा संस को सूचीबद्ध न रखने पर बनी थी सहमति
पत्र में टाटा संस से जुड़े पिछले फैसलों का भी हवाला दिया गया है। मार्च 2024 में टाटा संस के निदेशक मंडल ने, जिसमें वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह टाटा ट्रस्ट द्वारा नामित निदेशकों के तौर पर शामिल थे, टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध न रखने का फैसला सर्वसम्मति से लिया था।
इसके बाद टाटा संस ने करीब 20,000 करोड़ रुपये के कर्ज और वरीयता शेयरों का भुगतान और मोचन किया तथा भारतीय रिजर्व बैंक से अपना पंजीकरण वापस लेने के लिए आवेदन किया।
28 मई 2025 को सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट ने दोनों ट्रस्टियों की मौजूदगी में टाटा संस को सूचीबद्ध न रखने की स्थिति बनाए रखने के लिए उपलब्ध सभी विकल्पों पर विचार करने की मंजूरी दी थी।
28 जुलाई को दोनों ट्रस्टों ने फिर सर्वसम्मति से टाटा संस को सूचीबद्ध न रखने और इस उद्देश्य के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के साथ बातचीत जारी रखने का फैसला किया।
अब नोएल टाटा समेत चार ट्रस्टियों ने सवाल उठाया है कि इन फैसलों में ऐसा क्या बदलाव आया कि बाद में टाटा संस को सूचीबद्ध करने के पक्ष में रुख सामने आया।
Charity Commissioner की शिकायत पर भी सवाल
चारों ट्रस्टियों ने वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह की ओर से परोपकार आयुक्त के सामने दायर शिकायतों को लेकर भी सवाल उठाए हैं।
उनके मुताबिक, दोनों ने 25 सितंबर को शिकायतें दाखिल कर सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट की बैठकें आयोजित करने और लिखित प्रस्तावों के जरिए निर्णय लेने पर रोक समेत कई तरह के निर्देश मांगे थे।
ट्रस्टियों ने इसे विरोधाभासी स्थिति बताया। उनका तर्क है कि एक तरफ दोनों सामूहिक विचार-विमर्श की जरूरत की बात कर रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ उन्होंने ऐसी शिकायतें दायर कीं जिनमें ट्रस्ट की बैठकें होने से रोकने की मांग की गई। पत्र में उम्मीद जताई गई कि दोनों अपनी शिकायतें वापस ले लेंगे।
वेणु श्रीनिवासन के टाटा संस निदेशक के तौर पर मतदान पर भी विवाद
पत्र में वेणु श्रीनिवासन की टाटा संस के निदेशक के तौर पर भूमिका पर भी सवाल उठाया गया है। ट्रस्टियों के मुताबिक, 16 सितंबर को सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने एक लिखित प्रस्ताव के जरिए श्रीनिवासन से टाटा संस को सूचीबद्ध करने से जुड़े किसी भी मामले में हिस्सा लेने या मतदान करने से बचने को कहा था।
हालांकि, श्रीनिवासन ने इस निर्देश को स्वीकार नहीं किया। उनका कहना था कि ट्रस्ट उनके निदेशक के रूप में स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकार को तय नहीं कर सकता।
इसके अलावा ट्रस्ट ने 13 अगस्त को टाटा संस के नए अध्यक्ष के चयन के लिए चयन समिति गठित करने की प्रक्रिया शुरू करने का फैसला किया था।
इसके बावजूद 17 सितंबर की निदेशक मंडल की बैठक में श्रीनिवासन ने एन. चंद्रशेखरन की दोबारा अध्यक्ष नियुक्ति के पक्ष में मतदान किया। चार ट्रस्टियों का कहना है कि उस समय चयन समिति की कोई सिफारिश मौजूद नहीं थी और यह मतदान ट्रस्ट अध्यक्ष के मत से अलग था।
भारतीय रिजर्व बैंक के फैसले के बाद सूचीबद्धता को लेकर असली पेच
टाटा संस की सूचीबद्धता को लेकर विवाद की एक अहम कड़ी भारतीय रिजर्व बैंक का फैसला है।
टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि 28 सितंबर को भेजा गया प्रस्ताव टाटा संस के निदेशक मंडल के फैसले को पलटने की कोशिश नहीं था। ट्रस्ट्स के अनुसार, यह प्रस्ताव टाटा संस के निदेशक मंडल की ओर से भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पंजीकरण वापस लेने के आवेदन को खारिज किए जाने के बाद मांगे गए समाधान के संदर्भ में था।
ट्रस्ट्स का तर्क है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने पंजीकरण वापस लेने के आवेदन को खारिज किया है, लेकिन टाटा संस को अनिवार्य रूप से शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने का निर्देश नहीं दिया है।
इसी आधार पर ट्रस्ट्स का कहना है कि टाटा संस को सूचीबद्ध न रखने के लिए किसी दूसरे वैध विकल्प की तलाश की जानी चाहिए।
टाटा संस ट्रस्ट्स के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि टाटा संस उनकी ट्रस्ट संपत्तियों में सबसे महत्वपूर्ण संपत्तियों में से एक है और इससे होने वाली आय का इस्तेमाल परोपकारी उद्देश्यों को पूरा करने में किया जाता है।
इसीलिए ट्रस्ट्स का तर्क है कि टाटा संस में अपनी हिस्सेदारी और उससे जुड़ी संपत्ति को सुरक्षित रखना उनकी जिम्मेदारी है।
पत्र में कहा गया कि इस संपत्ति की सुरक्षा करना ट्रस्ट संपत्ति की देखरेख है, न कि कोई व्यावसायिक गतिविधि चलाना।
नोएल टाटा समेत चार ट्रस्टियों की खुली चुनौती
पत्र के अंत में नोएल टाटा और तीन अन्य ट्रस्टियों ने श्रीनिवासन और सिंह से कहा कि अगर उनके पास टाटा संस को सूचीबद्ध होने से बचाने के लिए कोई बेहतर विकल्प है तो वे उसे सामने रखें।
इससे स्पष्ट है कि टाटा ट्रस्ट्स के भीतर विवाद अब सिर्फ टाटा संस की सूचीबद्धता के सवाल तक सीमित नहीं रह गया है। मामला ट्रस्ट के संचालन, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया, न्यासी दायित्व और टाटा संस के भविष्य से जुड़े अधिकारों तक पहुंच गया है।
अब आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि ट्रस्ट के भीतर दोनों पक्ष अपने रुख को किस तरह आगे रखते हैं और टाटा संस को सूचीबद्ध न रखने के मुद्दे पर भारतीय रिजर्व बैंक तथा अन्य संबंधित प्रक्रियाओं में क्या दिशा सामने आती है।