Nepal Flood Warning: नेपाल में आई भीषण बाढ़ के बाद वहां की सरकार एक्शन मोड़ में नजर आ रही है। जानकारी के मुताबिक मौसम के पूर्वानुमान को बेहतर और किसी भी आपदा से निपटने के लिए नेपाल सरकार ने बाढ़ चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने और हिमनद झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ के जोखिम को कम करने की योजनाएं तैयार की हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक 6 नदियों को चिह्नित किया गया है। बालेन सरकार के इस फैसले से लाखों जिंदगियां बच सकती है। चलिए आपको बताते है इससे जुड़ी सभी महत्वपूर्ण जानकारी।

नेपाल में बाढ़ से पहले बजेगा खतरे का सायरन

नेपाली सरकार के शुरुआती 'रैपिड डैमेज एंड नीड्स असेसमेंट' (RDNA) के अनुसार, हाल ही में आई बाढ़ में लगभग 1,500 लोगों की जान चली गई, जबकि 5,000 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं। इसके अलावा, 1.81 अरब डॉलर की भौतिक संपत्ति को भी नुकसान पहुंचा है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी घाटियों में आई बाढ़ से जलविद्युत परियोजनाओं, सौर ऊर्जा सुविधाओं, बिजली ट्रांसमिशन बुनियादी ढांचे और परिवहन नेटवर्क को भारी नुकसान पहुंचा है। इनमें ऊर्जा क्षेत्र, विशेष रूप से जलविद्युत परियोजनाएं, सबसे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।

सरकारी श्वेत पत्र के अनुसार, 'प्रायोरिटी रिवर बेसिन फ्लड रिस्क मैनेजमेंट प्रोजेक्ट' (जो 2022 से 2028 तक चलेगा) के तहत, केंद्र सरकार 7.54 मिलियन डॉलर के निवेश से छह नदी घाटियों में बाढ़ की पूर्व चेतावनी प्रणाली (फ्लड अर्ली वार्निंग सिस्टम) स्थापित करेगी। इस परियोजना के अंतर्गत आने वाली छह नदी घाटियां हैं। मावा-रातुवा, बकराहा, लखंडेही, पूर्वी राप्ती, पश्चिमी राप्ती और मोहना खुतिया शामिल है।

तबाही से पहले बचाएगा अर्ली वार्निंग सिस्टम?

नेपाल का भौगोलिक परिदृश्य देखे तो कई इलाकों में लगातार आसमानी आफत का खतरा बना रहता है, जैसे बाढ़, भूस्खलन हिमपात समेत कई प्राकृतिक आपदा शामिल है। लगभग हर साल देश के नेपाल के लोगों को आपदा से दो चार होना पड़ता है। हाल ही में आई बाढ़ से 1500 से अधिक जिंदगियां खत्म हो गई थी। अभी भी हजारों की संख्या में लोग लापता है। सरकार द्वारा जारी श्वेत पत्र के अनुसार, यह केंद्र मई के मध्य से अक्टूबर के मध्य तक - यानी देश के मुख्य मानसून सीज़न के दौरान - चौबीसों घंटे बाढ़ का पूर्वानुमान और पूर्व चेतावनी सेवाएं प्रदान करेगा।

हाल के वर्षों में, बढ़ते तापमान के कारण हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने की गति तेज़ हो गई है। इससे ग्लेशियर झीलों के अस्थिर होने, हिमस्खलन (एवलांच) आने और निचले इलाकों में विनाशकारी बाढ़ आने का खतरा बढ़ गया है। अगर यह प्रोजेक्ट काम कर जाता है तो नेपाल में लाखों जान बच सकती है।