झारखंड: ट्रेन का समय से न खुलने का मतलब सिर्फ कुछ मिनट या घंटों का इंतजार करना नहीं होता। इसके कारण यात्रियों को घंटों स्टेशन पर इनतजार करना पड़ता है और जरूरी काम छूट जाते हैं एवं आगे की पूरी योजना बिगड़ जाती है। ऐसा ही एक मामले में झारखंड के उपभोक्ता आयोग ने ट्रेन 8 घंटे 48 मिनट लेट होने पर दक्षिण पूर्व रेलवे को 35,000 रुपये का मुआवजा और मुकदमे का खर्च यात्री को देने का आदेश दिया है।

528 मिनट यानी करीब 9 घंटे की देरी से पहुंची ट्रेन

दरअसल, यह मामला 23 सितंबर 2024 का है। इस दिन संजय कुमार ने टाटानगर से संबलपुर जाने के लिए '12871 इस्पात एक्सप्रेस' में दो स्लीपर टिकट बुक किए थे। ट्रेन को सुबह 10:18 बजे टाटानगर से रवाना होना था और इसी दिन इस ट्रेन को शाम 3:50 बजे संबलपुर पहुंचना था। लेकिन ट्रेन 528 मिनट यानी करीब 9 घंटे की देरी से अपने गंतव्य स्थान पर पहुंची। इसके बाद यात्री ने रेलवे के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का रास्ता अपनाया।

यात्री ने रेलवे से 4.50 लाख मुआवजे की मांग की

इसके बाद यात्री ने 8 अक्टूबर 2024 को साउथ ईस्टर्न रेलवे के सीनियर डिविजनल ऑपरेशंस मैनेजर को कानूनी नोटिस भेजा और कंज्यूमर कमीशन में केस दायर करते हुए ₹4.50 लाख मुआवजे की मांग कर दी। इसके लिए सबूत के तौर पर उन्होंने ट्रेन टिकट, कानूनी नोटिस आदि दस्तावेज दिए। इस संदर्भ में यात्री संजय कुमार का कहना था कि ट्रेन की इतनी ज्यादा देरी होने की वजह से उन्हें शारीरिक, मानसिक और वित्तीय परेशानियों का सामना करना पड़ा है।

रेलवे ने यात्री के दावे का किया विरोध 

इस मामले में साउथ ईस्टर्न रेलवे एवं ईस्ट कोस्ट रेलवे ने लिखित जवाब में यात्री के दावे का विरोध किया। रेलवे ने कहा कि इस तरह के मामले की सुनवाई कंज्यूमर कमीशन के बजाय रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल में होनी चाहिए। रेलवे ने आपत्ति जताते हुए कहा कि टिकट आईआरसीटीसी से बुक किया गया था, लेकिन आईआरसीटीसी को मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया।

रेलवे ने कहा सिर्फ ट्रेन के देर पहुंचने से वित्तीय नुकसान साबित नहीं होता

इसके अलावा यह ट्रेन खड़गपुर डिविजन होकर गुजरती है, लेकिन फिर भी संबंधित डिविजन को केस में शामिल नहीं किया गया। इसके साथ ही रेलवे ने सरकारी संस्था के खिलाफ मुकदमा करने से पहले 60 दिन का नोटिस देने की प्रक्रिया का भी हवाला दिया। इसके साथ ही रेलवे ने कहा कि यात्री ने वित्तीय नुकसान साबित करने के लिए कोई दस्तावेज या दूसरी सामग्री पेश नहीं की। इसलिए रेलवे के अनुसार सिर्फ ट्रेन के देरी से पहुंचने से वित्तीय नुकसान साबित नहीं होता।

कंज्यूमर कमीशन ने रेलवे की आपत्तियों को किया खारिज

हालांकि इस मामले में रेलवे की ओर से उठाई गई आपत्तियों को खारिज करते हुए झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिला कंज्यूमर कमीशन ने 2 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों की सुनवाई कंज्यूमर कमीशन कर सकता है और यात्रियों को सिर्फ रेलवे अधिकारियों की दया पर नहीं छोड़ा जा सकता।

30,000 मुआवजा और ₹5,000 मुकदमे का खर्च देने का आदेश

इस केस में कमीशन ने जांच के बाद पाया कि रेलवे के पास ट्रेन की देरी होने की ऐसी कोई वजह नहीं है, जो उसके नियंत्रण से बाहर थी। इस मामले में खास बात यह है कि कमीशन ने अलग से वित्तीय नुकसान का दस्तावेज नहीं होने के बावजूद यात्री को हुई परेशानी को नजरअंदाज नहीं किया और ट्रेन में लंबी देरी की वजह से यात्री को हुई उत्पीड़न और परेशानी को सही ठहराया। कंज्यूमर कमीशन ने साउथ ईस्टर्न रेलवे एवं ईस्ट कोस्ट रेलवे को 45 दिनों के भीतर यात्री को ₹30,000 मुआवजा और ₹5,000 मुकदमे का खर्च देने का आदेश दिया। इसके अलावा अगर रेलवे 45 दिनों के भीतर यह रकम नहीं चुकाता करता है तो दिए गए आदेश की तारीख से भुगतान होने तक रेलवे को इस रकम पर 12 फीसदी सालाना ब्याज देना होगा।

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