नई दिल्ली: हिमाचल प्रदेश की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की विरासत को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उनकी पत्नी और पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह ने चुनाव आयोग का रुख करते हुए उनके नाम और राजनीतिक विरासत का इस्तेमाल कर प्रस्तावित नए राजनीतिक दलों के गठन पर आपत्ति जताई है।
प्रतिभा सिंह ने 7 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर उन रिपोर्टों पर आपत्ति दर्ज कराई, जिनमें 'राष्ट्रवादी वीरभद्र कांग्रेस' और 'वीर कांग्रेस' जैसे नामों से नए राजनीतिक संगठन बनाए जाने की चर्चा है। उन्होंने 'राजा', 'बुशहर' और 'राजा बुशहर' जैसे नामों के इस्तेमाल पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि ये नाम वीरभद्र सिंह और उनकी राजनीतिक पहचान से गहराई से जुड़े हुए हैं।
वीरभद्र सिंह के नाम पर नई पार्टी की तैयारी
यह पूरा विवाद मंडी से जुड़े वरिष्ठ कांग्रेस नेता युधवीर सिंह बैंस की ओर से वीरभद्र सिंह के नाम पर नया राजनीतिक मंच खड़ा करने की कोशिशों के बीच सामने आया है। बैंस हिमाचल प्रदेश की मौजूदा कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व को लेकर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने राज्य कांग्रेस सरकार के कामकाज को लेकर कई मांगें भी उठाई हैं।
ऐसे में वीरभद्र सिंह के नाम पर प्रस्तावित राजनीतिक मंच को लेकर हिमाचल की सियासत में चर्चा तेज हो गई है। माना जा रहा है कि नया संगठन पूर्व मुख्यमंत्री की लोकप्रियता, नीतियों और राजनीतिक विरासत को आधार बनाकर 2027 के विधानसभा चुनाव में उतरने की कोशिश कर सकता है।
प्रतिभा सिंह ने क्या कहा?
प्रतिभा सिंह ने स्पष्ट किया है कि उन्हें किसी भी व्यक्ति या समूह के राजनीतिक दल बनाने के अधिकार पर आपत्ति नहीं है। उनकी आपत्ति वीरभद्र सिंह के नाम और उनकी राजनीतिक विरासत का परिवार की अनुमति के बिना इस्तेमाल करने को लेकर है।
उन्होंने चुनाव आयोग को बताया है कि न तो उन्होंने और न ही वीरभद्र सिंह के परिवार के किसी सदस्य ने उनके नाम पर राजनीतिक संगठन बनाने के लिए कोई अनुमति या सहमति दी है।
प्रतिभा सिंह ने चुनाव आयोग से यह भी अनुरोध किया है कि इस तरह के किसी आवेदन पर फैसला लेने से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए।
नाम से आगे बढ़ा मामला, विरासत की सियासत पर सवाल
यह विवाद सिर्फ किसी राजनीतिक दल के नाम को लेकर नहीं है। इसके जरिए हिमाचल प्रदेश की राजनीति में वीरभद्र सिंह की विरासत पर अधिकार और उसे आगे ले जाने की दावेदारी भी सामने आ गई है।
छह बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह की राज्य की राजनीति में मजबूत पकड़ रही है। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उनके नाम और राजनीतिक विरासत को लेकर होने वाली हर गतिविधि का सीधा असर राज्य की सियासत पर पड़ सकता है।
वहीं, हिमाचल कांग्रेस के भीतर भी अलग-अलग गुटों के बीच मतभेद और मौजूदा नेतृत्व को लेकर उठते सवाल इस पूरे घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना रहे हैं।
2027 चुनाव से पहले बढ़ेगी सियासी हलचल?
अब निगाहें चुनाव आयोग के अगले कदम पर टिकी हैं। प्रतिभा सिंह की आपत्ति पर आयोग क्या फैसला लेता है और वीरभद्र सिंह के नाम से प्रस्तावित राजनीतिक संगठन को लेकर क्या रुख अपनाता है, यह आने वाले दिनों में अहम होगा।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हिमाचल प्रदेश में यह विवाद इस सवाल को भी हवा दे रहा है कि वीरभद्र सिंह की राजनीतिक विरासत का असली वारिस कौन है और उनके नाम पर राजनीति करने का अधिकार किसे हासिल होगा?
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