मिथिलांचल की समृद्ध लोक परंपराओं में सुहाग और दांपत्य प्रेम से जुड़ा एक खास पर्व मधुश्रावणी व्रत इस वर्ष श्रावण मास में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। नवविवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखने वाला यह अनुष्ठान श्रावण कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि से शुरू होकर पूरे 14 दिनों तक चलता है।

इस दौरान महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, सुखी वैवाहिक जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए भगवान भोलेनाथ और माता गौरी की विधि-विधान से पूजा करती हैं। मधुश्रावणी व्रत की शुरुआत तीन अगस्त से होगी और इसका समापन 15 अगस्त को किया जाएगा। इस पूरे अनुष्ठान के दौरान नवविवाहिताएं कई कठिन नियमों का पालन करती हैं और श्रद्धा के साथ पूजा-पाठ में शामिल होती हैं।

बिना नमक के भोजन का करती हैं सेवन
मधुश्रावणी व्रत की सबसे खास परंपराओं में से एक है कि व्रत रखने वाली महिलाएं पूरे 14 दिनों तक बिना नमक वाला सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। यह व्रत संयम, श्रद्धा और पति-पत्नी के बीच प्रेम और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। इस पर्व की एक अनोखी विशेषता यह भी है कि पूजा की कई महत्वपूर्ण विधियों को महिलाएं ही संपन्न कराती हैं। यहां पुरोहित की भूमिका भी महिलाओं द्वारा निभाई जाती है। पर्व के पहले और अंतिम दिन विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है।

टेमी दागने की अनोखी परंपरा
मधुश्रावणी व्रत के अंतिम दिन एक विशेष परंपरा निभाई जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में 'टेमी दागना' कहा जाता है। इस रस्म में पति अपनी पत्नी की आंखों को पान के पत्ते से ढकता है। इसके बाद दीपक की जलती हुई बाती से नवविवाहिता के घुटने को स्पर्श कराया जाता है।

यह भी पढ़ें: सावन का पहला सोमवार 2026: बेलपत्र से लेकर शिव चालीसा पाठ तक, जानें पूजा की शुभ विधि और मुहूर्त

लोक मान्यता के अनुसार, इस परंपरा को पति-पत्नी के बीच प्रेम और समर्पण की परीक्षा के रूप में देखा जाता है। मान्यता है कि टेमी दागने के बाद बनने वाला निशान दांपत्य प्रेम की गहराई का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, यह एक प्राचीन लोक परंपरा है, जिसे मिथिलांचल की महिलाएं श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाती आ रही हैं।

मायके में मनाने की परंपरा
मधुश्रावणी व्रत को लेकर एक खास परंपरा यह भी है कि नवविवाहिताएं यह पर्व अपने मायके में रहकर ही पूरा करती हैं। पूजा स्थल को मैनी और बांस के पत्तों से सजाया जाता है, जिससे पूरे वातावरण में धार्मिक और सांस्कृतिक रंग दिखाई देता है। इस दौरान मिट्टी से नाग-नागिन और हाथी जैसी आकृतियां बनाई जाती हैं और उनकी पूजा की जाती है।

व्रत समाप्त होने के बाद इन मिट्टी की प्रतिमाओं को जल में विसर्जित कर दिया जाता है। मधुश्रावणी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मिथिलांचल की लोकसंस्कृति, परंपराओं और वैवाहिक जीवन के प्रति आस्था का प्रतीक है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी नवविवाहिताओं के लिए प्रेम, विश्वास और सौभाग्य का संदेश देती है।

written by Rozi Sinha