दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा से जुड़ी एक अहम पहल को मंजूरी मिल गई है। यूनिवर्सिटी की कार्यकारी परिषद ने Semester Away Programme को हरी झंडी दे दी है। इस योजना के तहत ग्रेजुएशन कर रहे छात्र अपनी पढ़ाई के दौरान एक सेमेस्टर किसी विदेशी उच्च शिक्षण संस्थान में जाकर पढ़ सकेंगे।
विदेश में हासिल किए गए अकादमिक क्रेडिट को उनकी DU डिग्री में शामिल किया जाएगा। यह फैसला अंडर ग्रेजुएट करिकुलम फ्रेमवर्क (UGCF)-2022 के तहत लिया गया है। इसके जरिए DU और विदेशी विश्वविद्यालयों के बीच शैक्षणिक सहयोग को बढ़ावा देने की कोशिश की जाएगी। छात्रों को विदेश में पढ़ाई का अनुभव मिलेगा और उनकी डिग्री में उस अध्ययन के क्रेडिट भी जोड़े जाएंगे, जिससे उनकी नियमित पढ़ाई प्रभावित नहीं होगी।
योजना पर उठे सवाल
हालांकि कार्यकारी परिषद के कुछ निर्वाचित सदस्यों ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति भी जताई है। उनका कहना है कि नए कार्यक्रम और पुराने प्रस्ताव के बीच हुए बदलावों को पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया गया है। कुछ सदस्यों ने आशंका जताई कि यह व्यवस्था पहले के ट्विनिंग प्रोग्राम जैसी हो सकती है, जिससे DU की डिग्री की गुणवत्ता और पहचान पर असर पड़ सकता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि इस तरह के कार्यक्रम भविष्य में उच्च शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा दे सकते हैं।
विदेश में पढ़ाई का खर्च बनी बड़ी चुनौती
Semester Away Programme को लेकर सबसे बड़ी चिंता आर्थिक पहलू को लेकर सामने आई है। सदस्यों का कहना है कि छात्रों को DU की फीस के साथ-साथ विदेशी संस्थान की फीस, यात्रा, रहने और अन्य खर्च भी उठाने पड़ सकते हैं।
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इससे यह अवसर सीमित आर्थिक क्षमता वाले छात्रों के लिए मुश्किल हो सकता है। हालांकि योजना में छात्रों के लिए छात्रवृत्ति और मोबिलिटी ग्रांट जैसी सुविधाओं के लिए आवेदन करने का विकल्प रखा गया है। इसके अलावा DU या संबंधित कॉलेज उपलब्ध संसाधनों के आधार पर जरूरतमंद और योग्य छात्रों को आर्थिक सहायता भी दे सकते हैं।
4 साल की ग्रेजुएशन के बाद सीधे PhD का मौका
कार्यकारी परिषद ने 4 वर्षीय ग्रेजुएशन प्रोग्राम पूरा करने वाले छात्रों के लिए PhD में सीधे प्रवेश से जुड़े नियमों में बदलाव को भी मंजूरी दी है। नए नियमों के अनुसार, चार साल की UG डिग्री पूरी करने वाले छात्र सीधे PhD के लिए आवेदन कर सकेंगे।
इसके लिए छात्र के पास चार वर्षीय ग्रेजुएशन में कम से कम 7.5 CGPA होना जरूरी होगा। साथ ही उसके नाम से Scopus-indexed जर्नल में कम से कम एक रिसर्च पेपर प्रकाशित होना चाहिए। यह बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के प्रावधानों के अनुरूप किया गया है।
सीधे PhD प्रवेश पर भी बनी असहमति
कुछ परिषद सदस्यों ने सीधे PhD प्रवेश के फैसले पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि केवल ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद हर छात्र रिसर्च के लिए तैयार नहीं होता। PhD के लिए विषय की गहरी समझ और शोध का अनुभव जरूरी होता है। सदस्यों ने यह भी चिंता जताई कि नए नियमों में प्रवेश प्रक्रिया के दौरान विभागीय स्तर पर परीक्षा या इंटरव्यू की भूमिका स्पष्ट नहीं है।
ऐसे में छात्र की शोध क्षमता और प्रस्तावित रिसर्च की गुणवत्ता का मूल्यांकन किस तरह होगा, यह बड़ा सवाल बना हुआ है। कुल मिलाकर DU के ये दोनों फैसले छात्रों को नए अवसर देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं, लेकिन इनके क्रियान्वयन, खर्च और गुणवत्ता को लेकर शैक्षणिक समुदाय में बहस जारी है।
Written by Rozi Sinha